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अनीता अग्रवाल की कविता में औरत

 Tahlka News |  2016-03-29 11:30:35.0

anita agra1अनीता अग्रवाल की भावना ही उनके शिल्प की सुन्दरता है | सचेत एहसास के साथ-साथ कहीं-कहीं व्यंग्य की पटुता भी उनके काव्य में है | इनमें सबसे ज्यादा है उनका प्रेम और उनमें निहित जीवमात्र के प्रति करुणा जो सृजनशील भाषा उत्पन्न करती है और एक को दूसरे से जोड़ती है | खुद अनीता के शब्दों में कहे तो “मैंने कभी कविता लिखी नहीं, कविता ने मुझे लिखा ,मुझे उकेरा मुझे दर्पण दिखाया ,रास्ता बनाया ,प्रेरित किया, मुझे मथा | 'शब्दों की अनबन' ने मुझसे मेरा समय चुराया |वो समय,जिसे मैंने कभी अपने लिए नहीं जिया,और न जीना चाहती हूँ |”




स्त्री हमारे आस पास

जिंदगी बदल गई है
बदल गया है बहुत कुछ
इन सबके साथ
हम स्त्रियाँ कितनी बदल गई हैं
यह दिखाई तो देता है
पर बहुत साफ नहीं
कुछ धुँधला-धुँधला
कभी परदर्शी कभी अभेद्य
जिंदगी जैसे कि
एक किताब है
जिसे पढ़ना चाहें
तो पहले नजर टकराती है
रंगीन कवर से

और भीतर छिपा रहता है
जिंदगी का रहस्य
जैसे कि छिपी होती है
आत्मा शरीर के भीतर
बदल गया है
उसे जिंदगी कहें कि
वक़्त कहें
औरत कहें कि
मर्द कहें
कभी कभी लगता है
सब बदल गया है
पर कभी
कुछ भी नहीं बदला
वैसा ही है
उतना ही क्रूर
उतना ही निर्मम

औरत

क्यों सहज लगता था
उसे रोज देखना
फटकते , पछारते , बीनते
मैले चीकट कपड़ों के साथ
लड़ते उठा पटक करते
कभी वह शिशु
जिसे इस भेद का पता न था
कि उसे भी
छोटे कद का होना पड़ेगा
उसकी मजबूरी है
उसकी चार फिट ऊँची झोंपड़ी
और टूटा दरवाजा
सिर्फ तीन फिट का
जिस पर पर्दे के नाम पर
फटी साड़ी का होना
संकेत भर है पर्दे का
नहला धुलाकर
आदमी की भीड़ में शामिल करने की
अदम्य कोशिश उसकी
माँ होने के फ़र्ज़ से भरी थी
न कि उसका दुस्साहस
आज मै विचलित हूँ
वहाँ बर्तन माँजती-धोती
गुदड़ी में सूई गाँथती
उलझे बालों की जटाजूट लिए
बालों में ढीलही ककही के सहारे
जूँओं को घर निकाला देती
गरीब महरी नहीं
साफ़ सुथरे कपड़ों में
कुर्सी पर
बैठकर
किताब पढ़ती
एक औरत भी है|

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