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अरुण जेटली को बड़ी राहत, हाईकोर्ट ने ख़ारिज किया मुक़दमा

  |  2015-11-05 09:07:34.0

तहलका न्यूज़ ब्यूरो 

लखनऊ. इलाहबाद हाई कोर्ट से वित्त मंत्री अरुण जेटली को बड़ी राहत मिली है । महोबा में वित्त मंत्री अरुण जेटली के खिलाफ दर्ज मुक़दमे को इलाहाबाद् हाई कोर्ट ने आज ख़ारिज कर arun jetlyदिया । जजों की नियुक्ति के मामले में दिए गए बयान के बाद महोबा की जिला न्यायलय ने स्वतः संज्ञान में लेकर मुकदमा दर्ज किया था जिसे इलाहबाद हाई कोर्ट के यशवंत वर्मा की कोर्ट ने ख़ारिज कर दिया।

जजों की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर वित्‍त मंत्री अरुण जेटली द्वारा दिए गए बयान पर एक सिविल जज ने संज्ञान लिया था और महोबा जिले के कुलपहाड़ के सिविल जज जूनियर डिवीजन अंकित गोयल ने अरुण जेटली के खिलाफ राष्ट्रद्रोह के मुकदमे का आदेश दिया था। उन्‍होंने यह आदेश जजों की नियुक्ति मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जेटली के बयान को संज्ञान में लेते हुए दिया था ।


बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों एक अहम फैसला देते हुए जजों की नियुक्ति के लिए कोलेजियम को ही सही ठहराया था। इसके बाद वित्‍त मंत्री ने एक बयान देते हुए कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले में देश की वृहद संवैधानिक व्‍यवस्‍था को नजरअंदाज किया गया है।

ये था पूरा मामला

केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) को असंवैधानिक ठहराने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाए थे । जेटली ने फेसबुक पोस्ट में इस फैसले को ‘कुतर्क’ पर आधारित बताया। जेटली ने कहा, ‘भारतीय लोकतंत्र गैरनिर्वाचित लोगों का निरंकुश तंत्र नहीं बन सकता। अगर चुने हुए लोगों को दरकिनार किया गया तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा।’ जस्टिस जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली संविधान बेंच ने शुक्रवार को इस कानून को संविधान की मूल भावना के खिलाफ बताते हुए खारिज कर दिया था। बेंच का कहना था कि कि यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बाधित करेगा।

विचारों को बताया निजी
जेटली ने फेसबुक पर ‘द एनजेएसी जजमेंट- ऐन ऑल्टरनेटिव व्यू’ शीर्षक से लेख लिखा। इसमें व्यक्त विचारों को उन्होंने निजी विचार बताया है। साथ ही लिखा है कि ऐसा कोई संवैधानिक सिद्धांत नहीं है, जिसमें लोकतंत्र और उसकी संस्थाओं को निर्वाचित प्रतिनिधियों से बचाने की बात कही गई है।

संवैधानिक ढांचे के बुनियादी स्तंभों की अनदेखी

जेटली के मुताबिक, फैसले में न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा के नाम पर संवैधानिक ढांचे के अन्य बुनियादी स्तंभों की अवहेलना की गई है। जबकि ये सब लोकतंत्र के अहम अंग हैं। ये हैं संसद, निर्वाचित सरकार, प्रधानमंत्री, विपक्ष का नेता और कानून मंत्री।

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