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आत्मचिंतन का समय गया है जनाब महेंद्र सिंह धौनी

  |  2015-10-12 16:25:46.0

पदमपति शर्मा


M S Dhoni


आत्मचिंतन का समय आ गया है जनाब महेंद्र सिंह धौनी। आंख बंद कर सोचिए कि क्या शरीर में वह पोटाश बची हुई है, जिसके जरिए आपकी साख बनी थी? क्या बल्लेबाजी की देसी शैली अपनी औकात पर नहीं आ चुकी है? क्या सहवाग की मानिंद आपके आंख, हाथ और पांव का संयोजन गड़बड़ा नहीं गया है? क्या शरीर के करीब फेंकी गई शार्ट गेंदों के सम्मुख आपकी कमजोरी जगजाहिर नहीं हो चुकी है?


धौनी सर, यह वे सवाल हैं जिन्हें आपको स्वयं से ही पूछना है और यदि जवाब हां में मिले तो समझ लीजिए कि बल्ला और दस्ताने खूंटी पर टांगने का समय आ गया है और जवाब यदि नहीं में मिले तो अपनों से पूछ कर देखिए, आपको जवाब मिल जाएगा। रविवार मैंने एक-एक गेंद देखी और इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि दो साल पहले चैंपियंस ट्राफी जीतने के पश्चात वेस्टइंडीज में त्रिकोणीय फाइनल के दौरान श्रीलंका के खिलाफ आपने आखिरी ओवर में दो छक्के उड़ाते हुए दुनिया के सर्वकालिक महानतम फिनिशर्स में एक की अपनी ख्याति के साथ अंतिम बार न्याय किया था। उसके बाद से आप मायूस ही करते रहे हैं।


ऐसा नहीं कि आपमें जिजीविषा नहीं है। वह तो बरकरार है और जब आप सिंगल्स लेते हैं या एक को दो रन में बदलते हैं तब आपकी सीना आगे फेंकते हुए चीते सरीखी दौड़ उसकी बेहतरीन सनद है भी, मगर डेथ ओवरों में काम चौके या छक्कों से ही बनता है टारगेट चेज करते समय। मगर वहां आपका बल्ला और शरीर दोनो ही साथ नहीं दे रहे। कानपुर वाले मैच की ही यदि हम बात करें तो बताइए कि डेल स्टेन पर एक जोखिम भरी रीवर्स स्वीप के अलावा आपने कितने चौके लगाए थे? कानपुर में नए प्रजन्म के खेल पत्रकारों में इसी बात को लेकर किचकिच हो रही है कि मैच के पहले धौनी और विराट कोहली के बीच गर्मागर्मी हुई थी? हंसी आ रहा है यह देख सुन कर। यह भी बहुत बड़ी बात थी क्या?


आप देखिए कि पूर्व संध्या पर कप्तान साफ-साफ कह रहा है कि रहाणे नहीं खेलेंगे, लेकिन मैच की सुबह रहाणे का नाम एकादश में था और इस मुंबईकर ने धीमे विकेट पर धौनी के दावे को भोथरा करते हुए 60 रनों की जबरदस्त पारी भी खेली और यही कारण था कि भारत एक विकेट पर ही 192 का स्कोर उकेर चुका था। दरअसल, रहाणे का खेलना टीम चयन समिति ने तय किया जिसमें कप्तान, नायब, कोच और एक सीनियर खिलाड़ी होता है। माही इस वास्तविकता को तो अच्छी तरह से समझ ही चुके हैं कि श्रीनिवासन युग का अवसान हो चुका है और अब उनके पेशाब से बोर्ड में चिराग नहीं जलता। टीम में भी अब वह अलग-थलग पड़ चुके हैं। जाहिर है कि उन्हें दबना पड़ा और रायडू जगह नहीं बना सके।


कोई पूछे उनसे कि रहाणे जैसे देश के श्रेष्ठतम बल्लेबाज के चयन पर तो आप तर्क के साथ सवाल खड़े करते हैं पर कभी यह स्पष्टीकरण भी सार्वजनिक रूप से दिया कि स्टुअर्ट बिन्नी में आखिर कौन सी ऐसी विशेषता है कि उन्हें टीम और एकादश में चुना जाता है? यही न कि स्टुअर्ट चयनकर्ता रोजर बिन्नी के सुपुत्र हैं। बेशर्मी की भी हद होती है।


दो राय नहीं कि कागज पर आप देश के सफलतम कप्तान हैं और यह टैग आपसे कोई नहीं छीन सकता, लेकिन यह भी आपको मानना होगा कि कालचक्र अब आपके लिए नहीं घूम रहा। आप स्वेच्छा से यदि खेल से हट जाते हैं तो यह आपकी गरिमापूर्ण विदाई होगी और आप इसके हकदार हैं भी। क्रिकेट प्रेमियों की यादों में आपका 2011 विश्वकप फाइनल में वह विजयदायी हेलीकाप्टर छक्का अनंत काल तक बना रहेगा, लेकिन यदि अड़े रहे तो - 'बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले' वाली मसल सामने आ सकती है। ऐसा मैंने न जाने कितनी बार पूर्व कप्तानों के साथ होते देखा है, उसमें आप अपना नाम तो मत जोड़िए.. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार, खेल समीक्षक हैं. ये इनके अपने विचार हैं.)

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