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क्या गुल खिलायेगा मायावती का यह दाँव !

 Tahlka News |  2016-08-10 10:20:28.0

क्या गुल खिलायेगा मायावती का यह दाँव !
उत्कर्ष सिन्हा

लखनऊ. यूपी की सियासत के समंदर में बीते कुछ दिनों से लगातार गोते लगा रही बसपा सुप्रीमो मायावती के नए दांव ने सूबे की के अल्पसंख्यक मतों का दावा करने वाली पार्टियों को बुधवार को बड़ा झटका देने की कोशिश की है.

बुधवार को कांग्रेस के तीन और समाजवादी पार्टी के एक विधायक ने बसपा का दामन थाम लिया. हांलाकि इन सभी विधायको ने बीते दिनों हुए राज्यसभा और विधान परिषद् के चुनावो में क्रास वोटिंग कर के अपनी पार्टियों को यह संकेत दे दिया था कि अब उनका रिश्ता और नहीं चलने वाला, मगर जिस तरह अचानक बसपा ने एक साथ 4 मुस्लिम विधायको को पार्टी में शामिल करने की घोषणा कर दी उससे कांग्रेस और समाजवादी पार्टी की मुस्लिम सियासत को झटका देने में वे कामयाब हो गयी है.


27 साल से सूबे में सत्ता का बनवास भोग रही कांग्रेस ने बीते दिनों खुद को एक नया रूप देने की कोशिश करनी शुरू कर दी थी. गुलाम नबी आजाद को प्रदेश का प्रभारी बना कर उसने मुस्लिमो में यह सन्देश देने की कोशिश की थी कि असल में अल्पसंख्यको की हितैषी पार्टी वही है, इसके साथ ही कांग्रेस ने ब्राहमण, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण पर काम करना भी शुरू कर दिया था. मगर एक साथ टीम कद्दावर मुस्लिम विधायको ने जब कांग्रेस का साथ छोड़ा है तो सूबे के मुस्लिम वोटो को सहेजने की कांग्रेस कि कोशिशो को धक्का तो जरूर लगेगा. इन तीन विधायको में डा. मोहम्मद मुस्लिम भी शामिल हैं जो न सिर्फ सोनिया गाँधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली के तिलोई विधान सभा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं बल्कि कुछ दिन पहले तक विधान सभा में कांग्रेस के मुख्य सचेतक भी थे. जाहिर है कि इनके कांग्रेस छोड़ने से कांग्रेस के गढ़ में जरूर असर पड़ेगा.

इसी तरह नबाब काजिम अली उर्फ़ नवेद मियां का कद भी रूहेलखंड के रामपुर इलाके में अच्छा खासा रहा है. वे एक बार पहले भी बसपा में रह चुके हैं. आजम खान के वर्चस्व वाले इस इलाके में वे आजम के खिलाफ एक बड़ा मुस्लिम चेहरा है.

समाजवादी पार्टी से बसपा में आने वाले नवाजिश अली पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बुढाना से विधायक है. मुजफ्फर नगर दंगो के बाद से ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश समाजवादी पार्टी के हाँथ से फिसलता गया है. दिलनवाज भी पशिचमी यूपी के बुलंदशहर के सयाना से  विधायक है. रूहेलखंड इलाके में अल्पसंख्यक मत कई सीटों पर निर्णायक होते हैं. एक के बाद एक घटने वाली सांप्रदायिक घटनाओं ने इलाके के मुसलमानों का समाजवादी पार्टी के प्रति विश्वास हिला दिया है. अब नवाजिश अली और दिलनवाज का सपा छोड़ना भी इस बात का संकेत दे रहा है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अल्पसंख्यक वोटर सपा से दूर भी जा सकते हैं.

मायावती की रणनीति भी अब दलित मुस्लिम गंठजोड़ के इर्द गिर्द घूम रही है. रोहित वेमुला से लेकर उना में दलितों की पिटाई और उसके बाद पूर्व भाजपा नेता दयाशंकर सिंह की मायावती पर अभद्र टिप्पणी ने मायावती को एक मौका दे दिया जिसके आधार पर वे अपने पारंपरिक दलित वोटो को फिर से एकजुट करने में लग गयी . साथ ही साथ मध्यप्रदेश के मंदसौर में मुस्लिम महिलाओं की गोमांस रखने के आरोप में हुयी पिटाई के बाद वे न सिर्फ मंदसौर गयीं बल्कि संसद में भी यह मुद्दा बहुत जोर शोर से उठाया. मायावती कि कोशिश है कि वे दलित और अल्पसंख्यको को अपने साथ दिखा कर खुद को सूबे की सियासत के केंद्र में एक बार फिर ला सके.

इसके अलावा भाजपा छोड़ कर बसपा में आने वाले पूर्व मंत्री और दो बार के विधायक अवधेश वर्मा का आना भी एक सन्देश है. अवधेश वर्मा भी पिछाड़ी जाति से आते हैं. यह मायावती को भाजपा का जवाब है जो स्वामी प्रसाद मौर्या के भाजपा जाने के बाद उन्होंने दिया है. हलाकि अवधेश वर्मा का कद स्वामी प्रसाद जितना तो नहीं है मगर मायावती ने यह सन्देश देने की कोशिश जरूर की है कि पिछड़े वर्ग के नेताओं का विशवास भी उन्हें हासिल है.

अब देखना दिलचस्प होगा कि एक साथ 4 मुस्लिम विधायको को रणनीतिक तौर पर एक साथ बसपा में शामिल होने से सूबे की राजनीती में क्या नया मोड़ आता है.

हाँलाकि जैसे जैसे चुनाव नजदीक आयेंगे वैसे वैसे यूपी की सियासत में ऐसे दावं और भी देखने को मिलेंगे.

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