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बल्लेबाजों की असफलता ने गेंदबाजों की मेहनत पर फेरा पानी

  |  2015-10-19 11:10:38.0

M S Dhoniनई दिल्ली, 19 अक्टूबर | इंदौर में जिस अंदाज से महेंद्र सिंह धौनी ने बल्लेबाजी की थी उससे लगा था कि खोया मैजिक टच उन्हें वापस मिल गया है पर जो कुछ राजकोट में हुए तीसरे एकदिवसीय मैच में दिखा, उससे वह आस मृग मरीचिका ही साबित हुई. गेंदबाजों ने जितनी मेहनत करते हुए दक्षिण अफ्रीका को 270 रनों पर रोका था, उस पर बल्लेबाजों की नाकामी ने पूरी तरह पानी फेर दिया.


ठीक है कि सिक्के की उछाल में मात खाते ही मेजबान बैक फुट पर आ गए थे, ऐसे सूखे विकेट पर जहां शाम को धूल उड़ती दिखी, और जहां ओस का नामोनिशान नहीं था, टारगेट का पीछा करना कोई आसान काम नहीं था. लेकिन भारतीयों का यह अपना आंगन था और वे जानते थे कि देश के इस भाग में नमी नही के बराबर रहती है. ऐसे में शाम ढलने के बाद पिच को गेंदबाजों की चेरी बनना ही था. टीम प्रबंधन को इसके लिए विशेष रणनीति बनाने की जरूरत थी कि मध्य ओवरों के दौरान किन-किन गेंदबाजों को निशाना बना कर उन पर हमला करते हुए रनों की चाल को सात-साढ़े सात से आगे नहीं बढ़ने देना है. मगर जिन 30 और 40वें ओवरों के बीच यह किया जाना था, कोहली और धोनी की जोड़ी उस दौरान एकदम नकारा साबित हुई.


याद रखिए कि एक दिनी क्रिकेट के बदले नियमों के चलते, जिनमें गेंदबाजों को कुछ ताकत दी गई है, 250 रनों से ज्यादा का टारगेट पाने के लिए शीर्ष क्रम में किसी एक को अंत तक एक छोर संभाले रखना अपरिहार्य माना जाता है. अर्से बाद धीमी मगर अर्धशतकीय पारी खेले कोहली के वो तेवर कहीं नजर नहीं आए जो हम पूर्व में न जाने कितने अवसरों पर देख चुके हैं. धोनी के हेलीकाप्टर शाट्स की जो हल्की झलक इंदौर में मिली थी, वह यहां नदारत थी. कोढ़ में खाज यह कि दोनों एक के बाद एक पैवेलियन की डगर थाम बैठे. सुरेश रैना एक बार फिर बिना खाता खोले नशा उखाड़ साबित हुए. रहाणे को बल्लेबाजी क्रम में रैना के भी नीचे उतारना किसी हाराकिरी से कम नहीं था. रोहित ने भाग्यशाली अर्धशतक जरूर लगाया पर वह भी जरूरत के समय पतली गली थाम बैठे.


कभी स्पिन के सम्मुख लाजवाब भारतीय बल्लेबाजों की इस विधा में श्रेष्ठता भी किस कदर सवालों के घेरे में आ गई है, यह भी कम सोचनीय नहीं. हालिया दिनों में इंग्लैंड रहा हो या आस्ट्रलिया, उनके सामान्य से स्पिनर्स ने भी भारतीय बल्लेबाजों की बोलती बंद कर दी थी. श्रीलंकाई रंगना हेराथ के कहर की बाबत हर कोई जानता है. यहां भी कलाई के स्पिनर इमरान ताहिर हों या पार्ट टाइमर डुमिनी भारतीय बल्लेब्जों को कभी भी निरंकुश नहीं होने दे रहे. फिर, जब डेथ ओवरों के दौरान आप यदि हरभजन, पटेल और भुवनेश्वर से प्रति ओवर बारह रन ठोकते हुए जीत की उम्मीद बांधे तो यह मूर्खों के स्वर्ग में रहने के समान सोच ही कही जाएगी.


18 रन की इस नजदीकी हार ने भारतीय गेंदबाजों का जरूर दिल तोड़ा होगा. विशेषकर उनके स्पिनर्स का जिन्होंने अंतिम दस ओवरों में दक्षिण अफ्रीकियों को बांध कर रख दिया था और डि कॉक के शतक के बावजूद डीविलियर्स, मिलर और डुमिनी जैसों के होते टीम 270 पर सीमित होकर रह गई. यह कम बड़ी बात नहीं. धोनी का अमित को इंदौर में बैठाने के पाप का यहां परिमार्जन फला जरूर मगर अंत में सब बेकार बन कर रह गया.


टीम प्रबंधन को अगले मुकाबले के लिए नए सिरे से रणनीति बनानी होगी. अपन का तो यह मानना है कि रहाणे नंबर चार पर उतरें और धोनी उसी छठे क्रम पर खेलें जहां से उन्होंने न जाने कितनी बार जीत की गौरव गाथा अपने बल्ले से लिखी है और हां लगातार असफल रैना की जगह रायडू को अब भी क्या मौका नहीं मिलेगा? साथ ही भुवनेश्वर का यह दावा, कि वह अन्य किसी गेंदबाज की तुलना में गेंद को ज्यादा स्विंग करा सकते हैं, तब साबित हो सकेगा जब वह बल्लेबाज को छोड़ने वाली यानी आउट स्विंग गेंद स्थायित्व के साथ डाले. क्या वह ऐसा करने में कामयाब होंगे या चयनकर्ता अगले दो मैचों के लिए घोषित टीम से उनका पत्ता साफ कर देंगे, यह देखना दिलचस्प रहेगा. आईएएनएस

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