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बिहार का चुनाव और इसके निहितार्थ

  |  2015-11-05 08:58:29.0

उत्कर्ष सिन्हा

bihar chunavबिहार विधान सभा के चुनावो के आज आखिरी दिन मतदान जोरो पर है. तीन दिन बाद इसके नतीजे भी आ जायेंगे. एनडीए और महागठबंधन दोनों के दावे है बहुमत पाने के ऐसे में इस बात का कयास लगाना अभी बहुत मुश्किल है कि असल में जीत किसकी होने जा रही है, मगर हाँ एक बात तो है कि इस चुनाव में प्रचार और जुबानी जंग का स्तर काफी गिरा हुआ नजर आया है.

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और महागठबंधन के नेता लालू यादव के अपनी अपनी जीत के दावे काफी आत्मविश्वास से किये जा रहे हैं मगर आरक्षण से ले कर गाय तक के मुद्दों के बीच बिहार के विकास की चर्चा गौण हो गयी .

बिहार की तस्वीर में बीते काफी बदलाव आया है और बेहतर होती सड़को , महिलाओं की बढती हुई भागीदारी और सुदूर गाँव में बिजली के ट्रांसफार्मरो ने नीतीश के वास्तविक विकास को मोदी के आभासी विकास पर बढ़त दिलाई और दूसरी और लालू यादव के जातीय कार्ड ने भी भाजपा को उनके ग्राउंड पर खेलने के लिए मजबूर करने में कामयाबी दिलाई है.


इन सबके बीच नरेन्द्र मोदी थोड़े भटके हुए नजर आये. हालाकि ताबड़तोड़ रैलियों के जरिये उन्होंने अपनी बात कहने की पूरी कोशिश की है मगर वे चुनावो को अपने अजेंडे पर ले जाने में नाकामयाब ही दिखाई दिए और लालू यादव के जाल में फंसते नजर आए.

जिस तरह से नितीश ने डीएनए का मुद्दा भुनाया और लालू ने पहले दिन से ही आरएसएस को अपने निशाने पर ले लिया उससे पूरा चुनाव ही उनके मुद्दे पर सेट हो गया. बाद के दिनों में भाजपा ने आरक्षण के मुद्दे को सांप्रदायिक आधार देने की कोशिश की मगर वह कितना कामयाब हुई है ये नतीजे आने के बाद ही पता चलेगा.
बिहार विधान सभा चुनाव की शुरुआत से ही माना जा रहा था कि भाजपा इसमें अपनी पूरी ताकत झोंकेगी . पार्टी को यह भी स्थापित करना था कि देश में मोदी की लहर अभी भी कायम है इसलिए इस चुनाव की बीजेपी की रणनीति में नरेंद्र मोदी की सभाओं की कारपेट बाम्बिंग की गयी. लालू यादव की दागी छवि के सहारे नितीश को घेरने की भी रणनीति बनायीं गयी मगर महागठबंधन के दोनों धुरंधरों ने अपनी अपनी भूमिकाए स्पष्ट रखी हुई थी.

नितीश कुमार ने पुरे चुनावो के बीच खुद को अपने द्वारा किये गए विकास पर केन्द्रित रखा तो वहीँ लालू यादव ने मंडल की राजनीति के साथ आरएसएस और मोदी पर अपने चिरपरिचित अंदाज में हमला बोला.

इन चुनावो के बीच ही देश में दादरी काण्ड भी हुआ और बीफ पर बवाल भी बढ़ा साथ ही असहिष्णुता का मुद्दा भी देश में छाया रहा. इन सभी मुद्दों को बिहार में भी आजमाने की कोशिश हुई. अब इनका कितना और कैसा असर बिहार के वोटरों पर पड़ा है इसका फैसला भी नतीजे आने के साथ ही साफ़ हो जायेगा.

इन चुनावो में भाजपा के रणनीतिकारो को कई बार असहज भी होना पड़ा है. दरअसल पार्टी ने बाहरी राज्यों से आने वाले लोगो को जिम्मेदारिया सौपी थी. वे लोग बिहार के परिवेश और संस्कृति से ज्यादा परिचित नहीं थे नतीजतन मोदी का “सेट” करने वाला बयान उल्टा पड़ा. उन्होंने जिस जुबान में लालू के बेटी को सेट करने की बात की उसका बुरा असर हुआ . बाहरी लोगों को “सेट” करने जैसे शब्द का इस इलाके में क्या मतलब निकला जाता है उसका अनुमान ही नहीं था. इसी तरह गोमांस का प्रश्न भी कितना कारगर हुआ यह इसमें भी संदेह है क्यूंकि बरसो सामंती चंगुल में फंसे रहे बिहार में पिछड़ी जातिया मरे हुए जानवरों को खाती आई हैं.
लालू यादव ने पहले ही दिन से इस चुनावो को अगडी बनाम पिछड़ी की लडाई बना दिया है. इस बीच गाय का मुद्दा भी यादव वोटरों ने अपने हिसाब से देखा. लालू यह बताने में लग गए कि मोदी यादवो को गाय विरोधी कह रहे हैं.इस तरह उन्होंने भाजपा के हाँथ से यह मुद्दा भी छीन लिया.

चुनाव के नतीजे कई बातों को साफ़ करेंगे. ये बताएँगे कि क्या वाकई बिहार में लालू की साख फिर से बढ़ी है या उनकी दागी छवि बिहारी वोटरों के बीच भी उतनी ही ख़राब हुई है जितनी विपक्ष दावे कर रहा है. ये नतीजे इस बात को भी साफ़ कर देंगे कि लोक सभा चुनावो के लगभग 18 महीनो बाद भी जनता नरेन्द्र मोदी की बातो पर भरोसा कर रही है या नहीं?

अब सबके दावों की पुष्टि का समय करीब आ रहा है. तीन दिन बाद नतीजे साफ़ हो जायेंगे और सवालो के जवाब भी मिल जायेंगे . मगर ये तो तय है कि बिहार के नतीजे देश की राजनीति को दिशा देंगे. अगर नरेन्द्र मोदी की जीत होती है तो यह मानना होगा कि देश में अभी भी उनकी स्वीकार्यता बनी हुई है मगर यदि हार हुई तो मोदी और अमित शाह की जोड़ी और पार्टी के अजेंडे पर सवाल और तेज हो जायेंगे. यह भी साफ़ हो जायेगा की दो दशक पहले से शुरू हुई मंडल बनाम कमंडल की राजनीति आज किस मुकाम पर है.

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