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सूखे से लड़ते बुंदेलखंड का अनोखा “रोटी बैंक”

  |  2016-02-05 07:31:15.0

उत्कर्ष सिन्हा

महोबा. बीते कई सालों से सूखा और अकाल जैसे हालत ही बुंदेलखंड की पहचान बन कर रह गए हैं. सरकारी योजनायें कागजो के दायरे से बाहर नहीं निकल पा रही है और सियासी जुमलेबाजी भी इस इलाके के लोगो का पेट भरने में नाकाम ही साबित होती रही है. इन सब मुश्किलों के बीच बुंदेलखंड के लोगों ने अपने नए रास्ते तलाशने शुरू कर दिए हैं. कही महिलाएं जल सहेलियाँ बन कर तालाबो को बचने में लगी हैं तो कहीं समाज खुद अपना बैंक चला रहा है . इस बैंक की खासियत यह है कि यहाँ पैसो की बजे रोटियों का लेनदेन होता है.

tara roti

कभी यूपी की राजधानी में एक तेज तर्रार पत्रकार के रूप में पहचाने जाने वाले तारा पाटकर अब अपनी  जन्मभूमि महोबा में समाज के लिए खुद को समर्पित कर चुके हैं. महोबा इलाके में उन्होंने कई अभिनव प्रयोग किए.


तारा पाटकर बताते हैं कि अपने आसपास कोई भूखा न रहे, भूखा न सोये- इस मूलमंत्र के साथ 15 अप्रैल, 2015 को बुंदेली समाज ने अकाल व भुखमरी की मार झेल रहे बुंदेलखंड के ह्रदयस्थल महोबा में जो रोटी बैंक चालू किया था, उससे प्रेरित होकर देश भर में रोटी बैंक की सौ से अधिक शाखाएं खुल चुकी हैं, महोबा नगर में रोटी बैंक की 18 शाखाएं चल रही हैं जिनमें सुबह 10 बजे से शाम 7 बजे तक लोग ताजी ताज़ी रोटी व थोड़ी सी शाकाहारी सब्जी या अचार अखबार में लपेट कर जमा करते रहते हैं, बाजार में घूमते भिखारियों को लोग पैसा नहीं देते बल्कि रोटी बैंक की निकटतम शाखा तक भेजकर भोजन मुहैया कराते हैं.

इस पूरे प्रयास की सफलता को तारा पाटकर एक शब्द में कह देते हैं “अब हमारे शहर में कोई भूखा नहीं सोता...” और इस छोटे से शब्द के साथ उनके चेहरे पर एक संतोष की मुस्कान खेल जाती है.

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