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1700 पार्टियाँ अब तक खपा चुकी हैं 1, 34,758 करोड़ का काला धन

 Sabahat Vijeta |  2016-11-24 14:38:35.0

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तहलका न्यूज़ ब्यूरो


लखनऊ. नोटबंदी से एक तरफ जहाँ आम आदमी की रसोई में सूनापन आ गया है वहीं नेताओं और पार्टियों की चांदी हो गयी है. उनके पास एडवांस में पैसा आने लगा है. इसकी असल वजह यह है कि राजनीतिक पार्टियों से यह पूछने का नियम नहीं है कि उनके पास जो पैसा है वह कहाँ से आया.


राजनीतिक पार्टियों के पास क्योंकि आय का स्रोत बताने की ज़रुरत नहीं है इसलिए 500 और 1000 के नोट बंद होने से उनकी तो चांदी हो गई है. बस जमा कर लो कालाधन, राजनीतिक दलों के पक्ष में बने इस नियम से अरबों का कालाधन कभी खत्म हो ही नहीं सकता. नोटबंदी के बाद काला धन कहाँ गया है इसे जांचना हो तो केवल 1700 पार्टियों को ही जांचना है.


21,000 crore deposit


नोटबंदी से दो फायदे बताये गए थे. कहा गया था कि नकली नोट समाप्त हो जायेंगे. कालाधन भी खत्म हो जाएगा. नकली नोट तो लगभग समाप्त हो गया परन्तु कालाधन तो 40 फ़ीसदी भी खत्म नहीं हो पायेगा. एक जानकारी के मुताबिक 60 फ़ीसदी कालाधन यानी पुराने नोट पार्टियों के बैंक खाते में जमा हो चुके हैं. अब तक 1700 पार्टियों के पास 1, 34, 758 करोड़ काला धन जमा हो चुका है. आगे भी जमा होगा. क्यूंकि पार्टियों को इनकम टैक्स 100 फीसदी छूट होने के कारण विभाग नहीं पूछ सकता. कहाँ से चंदा आया और कहाँ खर्च हुआ कोई नहीं पूछ सकता.


हो यह रहा है कि जिन नेताओं के पास कालाधन था वह पार्टी में जनता से इकठ्ठा चंदे के नाम पर जमा कर रहे हैं, बल्कि कुछ नेता तो व्यापारियों का भी पैसा खपा रहे हैं, आगे कुछ काटकर लौटा देंगे या जीतने के बाद काम कर देंगे, यानि नोटबंदी से पार्टियों की चांदी हो गयी यानि एडवांस पैसा आ गया.


Lawrence H.. Summers


देश को कालाधन से मुक्त कराने की राह में सबसे बड़ी बाधा खुद राजनीतिक पार्टियां बन रही हैं. सभी राजनीतिक पार्टियों के पास चंदे के रूप में बंद हो चुकी 500 और 1000 के नोट खाते में जमा हो रहे हैं. यह रकम अलग अलग कार्यकर्ताओं के द्वारा जमा कराई जा रही है.


कालाधन सबसे बड़ी मात्रा में नेताओं, अफसरों और बड़े बिजनेस मैन के पास है. यह लोग राजनीतिक दलों को चंदा देते रहे हैं. अब पुराने नोट बंद होने के बाद यह लोग बैकों में पुराने नोट जमा करा रहे हैं. यह लोग इस जमा पैसे के एवज में पार्टी से चुनावी खर्च के रूप में कुछ पैसा वापस भी पा जायेंगे. ऐसे में कालाधन पार्टियों में जमा होकर सफेद हो रहा है.


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‘नोट बंद होने के बाद केवल आम जनता ही परेशान दिख रही है बड़े लोग परेशान नहीं हैं. किसी बैंक की लाइन में नहीं है. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि ऐसे लोग राजनीतिक दलों के खातों में पैसा जमा करा रहे हैं. नोट बंद होने के बाद सभी दल एक दूसरे पर कालेधन को छिपाने और बचाने का आरोप लगा रहे हैं. माया, मुलायम, ममता और कांग्रेस पर आरोप लगाने वाली भाजपा भी इससे अलग नहीं है. यह बात सभी कर रहे है कि चुनाव में कालेधन का खर्च होता है. तब ऐसे इंतजाम क्यो नहीं किये गये कि राजनीतिक दल भी नोट बंद होने के बाद अपने खाते में जमा होने वाले चंदे का हिसाब दे. बात राजनीतिक दलों की है इसलिये हर दल चुप है.’


लोकतंत्र मुक्ति आन्दोलन के संयोजक प्रताप चन्द्रा कहते हैं कि राजनीतिक दल आयकर की सीमा से बाहर हैं. क्योंकि आयकर की सीमा में वह लोग आते हैं जो आय करते है. राजनीतिक दलों की कोई आय नहीं है इसलिये आयकर सीमा में नहीं आते. राजनीतिक दलों पर जनसूचना अधिकार कानून लागू नहीं है. ऐसे में वह यह बताने के लिये बाध्य नहीं है कि उनको कितना पैसा मिला है. राजनीतिक दल केवल चुनाव आयोग को अपनी सालाना बैलेंस शीट देते है जिसमें यह लिखा होता है कि कितना पैसा आया और कितना खर्च हुआ. ऐसे में यह पता ही नहीं चल पायेगा कि पैसा कहां से आया और कहां खर्च हो. यही वजह है कि कालाधान को पार्टी फंड में डाल कर सफेद धन बनाने का काम धड़ल्ले से किया जा रहा है.’


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अगर कालाधन रोकना है, चुनाव में कालाधन के प्रभाव को खत्म करना है तो राजनीतिक दलों को आयकर कानून और जनसूचना अधिकार कानून के तहत लाना होगा. जब तक यह सुधार नहीं होंगे तब तक कालाधन को खपाने में पार्टी फंड सबसे कारगर उपाय की तरह प्रयोग होता रहेगा. नेता ही नहीं अफसर भी अपने कालेधन को खपाने के लिये पार्टियों की शरण में जाते रहेंगे.


इस मुददे को लेकर आंदोलन करने की तैयारी में है. इसके साथ ही साथ वह भ्रष्टाचार की लड़ाई की अगुवाई करने वाले अन्ना हजारे से मिलकर आवाज को बुलंद करने जा रही है. प्रताप चन्द्रा कहते हैं कि जब तक चुनाव सुधार नहीं होगे समाज में बदलाव संभव नहीं है. राजनीतिक दल किसी पवित्र नदी की तरह गंदगी को साफ करने का जरीया बनते रहेंगे.

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