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क्या योगी आदित्य नाथ को उपेक्षित कर रही है शाह-मोदी की जोड़ी

 Tahlka News |  2017-01-10 09:10:54.0



उत्कर्ष सिन्हा

लखनऊ. भाजपा में हिंदुत्व का चेहरा और फायरब्रांड नेता कहे जाने वाले 5 बार के सांसद योगी आदित्यनाथ के समर्थको में गहरी निराशा का आलम है. यह निराशा अब गुस्से में बदलती जा रही है समर्थको का गुस्सा इस बात पर है कि बीते लगभग एक साल से भाजपा का शीर्ष नेतृत्व हर महत्वपूर्ण मौके पर योगी को उपेक्षित करने का कोई मौका नहीं चूक रहा.

कभी यूपी में भाजपा के सीएम पद का चेहरा माने जाने वाले योगी आदित्यनाथ के लिए यह सहज नहीं है कि यूपी चुनावो के लिए बनी समिति से भी उन्हें बाहर रखा गया और दो दिन चली राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में भी उन्हें बोलने नहीं दिया गया.


राष्ट्रीय कार्यकारिणी में मौजूद पूर्वांचल के एक नेता का कहना है कि चुनावो के मद्देनजर योगी अपनी बात कहने का पूरा मूड बना कर आये थे, योगी अभी भी मुख्यमंत्री पद की रेस से खुद नहीं मान राझे हैं मगर मोदी जी के इशारे पर उन्हें बोलने का मौका ही नहीं मिल पाया.इस बाद से योगी आदित्यनाथ इतने नाराज हुए कि वे गुस्से में बैठक बीच में ही छोड़ कर निकल गए.

योगी के समर्थक बीते दिनों जगह जगह यह होर्डिंग भी लगते रहे हैं जिसमें लिखा होता है –“योगी नहीं तो वोट नहीं” . माना जा रहा है कि योगी समर्थको की यही आक्रामकता मोदी और शाह की जोड़ी को रास नहीं आती.
गोरखपुर इलाके में योगी का संगठन “हिन्दू युवा वाहिनी’ भी अपने उग्र तेवरों के लिए जाना जाता है. नरेन्द्र मोदी जब 2014 के लोकसभा चुनावो के पहले गोरखपुर आये थे तब भी उनके लिए लगाए होर्डिंग्स पर योगी को प्रमुखता न देना हिन्दू युवा वाहिनी को नागवार गुजरा था और कई होर्डिंगे फाड़ दी गयी थी. सूत्रों का कहना है कि इस बात को नरेन्द्र मोदी अभी तक भूल नहीं पाए हैं और इसलिए 5वी बार लोकसभा पहुंचे योगी आदित्यनाथ को मोदी मंत्रिमंडल में जगह भी नहीं मिल सकी.

इसके बाद लव जिहाद जैसे विवादित मुद्दों को योगी ने उठाया और विधानसभा उपचुनावों के लिए भाजपा ने योगी को आगे किया मगर इन उपचुनावों में पार्टी को मिली बुरी तरह पराजय ने योगी के जादू और उग्र हिंदुत्व की राजनीति की सफलता पर सवाल खड़े होने लगे.

फिर जब भाजपा की राष्ट्रीय कार्यसमिति की इलाहबाद में बैठक हुयी तब भी योगी समर्थको ने पूर्वांचल में होर्डिंग युद्ध छेड़ा. इस वक्त योगी को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने की मांग की गयी थी. इसे भी पार्टी ने अनुशासनहीनता की श्रेणी में रखा.

दरसल योगी दबंग शैली की राजनीति के लिए पहचाने जाते हैं और अमित शाह की राजनीति में भी यही पुट है. अमित शाह और नरेन्द्र मोदी के दिल्ली पर काबिज होने के बाद से ही किसी भी दबंग और बड़े जनाधार वाले भाजपा नेता को भाजपा शासित प्रदेश में कोई बड़ी भूमिका नहीं दी गयी है और यूपी में भी केशव प्रसाद मौर्या जैसे अनजान चेहरे को अचानक ही प्रदेश की कमान दे दी गयी. योगी समर्थको की नाराजगी और बढ़ गयी और उन्होंने पार्टी के इस कदम को भी योगी की उपेक्षा से जोड़ कर ही देखा.

अब सबकी निगाहे गोरखपुर बस्ती और देवीपाटन मंडलों में भाजपा के टिकट पर हैं. माना जा रहा है कि इस इलाके में खासा प्रभाव रहने वाले योगी को एक बार फिर झटका लग सकता है. और गोरखपुर संसदीय क्षेत्र के बाहर योगी ब्रिगेड के नेताओं को टिकट मुइलना मुश्किल होगा. सूत्र तो यहाँ तक कहते हैं कि गोरखपुर संसदीय क्षेत्र की 5 सीटो में से अधिकतम 2 जगहों पर ही योगी समर्थक टिकट पायेंगे और वो भी इसलिए क्योंकि उन नेताओं का अपना आधार भी है.
प्रदेश भाजपा के एक नेता का कहना है कि- “दरअसल योगी आदित्यनाथ विधानसभा टिकटों में भी अपनी संसदीय सीट के हिसाब से टिकट देने का दबाव बनाते हैं. ऐसे में उनके कई प्रत्याशी विधानसभा चुनाव हार जाते हैं मगर योगी की संसदीय सीट के लिए जातीय समीकरण फिट रहते हैं. पार्टी इस बार खुद से ही सारी सीटों पर प्रत्याशी चुन रही है हालाकि योगी जी कि राय भी ली जाएगी.” साफ़ है कि योगी की राय टिकट की कितनी गारंटी बनेगी इस पर संदेह है.

गोरखपुर सदर की सीट से 3 बार के विधायक डा. राधा मोहन दास अग्रवाल पहली बार योगी के ही उम्मीदवार थे जब वे हिन्दू महासभा के टिकट पर भाजपा के अधिकारिक उम्मीदवार शिवप्रताप शुक्ल को हरा कर आये थे. मगर इसके बाद योगी और राधामोहन के रिश्ते तल्ख़ हो गए. 2007 और 2012 में भी योगी के न चाहने के बावजूद डा. राधामोहन भाजपा का टिकट पा गए और चुनाव जीत कर आये.

हालाकि यह बात भी सही है कि अगर योगी आदित्यनाथ बागी हुए या फिर उनके समर्थक रणनितिकी रूप से काम कर गए तो गोरखपुर व उससे सटे पूर्वांचल के जिलों में भाजपा को चुनाव में नुकसान उठाना पड़ सकता है.

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