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विधायको के बगावत के बाद कांग्रेस में शुरू हुयी “सर्जरी”

 Tahlka News |  2016-06-12 14:46:08.0

gulam nabi
उत्कर्ष सिन्हा

लखनऊ. यूपी में विधान परिषद् और राज्य सभा के चुनावो में सबसे ज्यादा क्रास वोटिंग का शिकार होने के बाद यूपी कांग्रेस की सर्जरी शुरू हो गयी है. इसकी गाज सबसे पहले महासचिव और यूपी प्रभारी मधुसुदन मिस्त्री पर गिरी जिन्हें हटा कर गुलाम नबी आज़ाद को यूपी का प्रभार कांग्रेस आला कमान ने दे दिया.
उम्मीद है कि अगला निशाना प्रदेश अध्यक्ष निर्मल खत्री और विधान मंडल के नेता प्रदीप माथुर होंगे.

पार्टी के जमीनी नेता इन तीनो के रवैये से खुश नहीं थे. कार्यकर्ताओं का कहना है कि इन तीनो ने ही कार्यकर्ताओं के साथ सीधा संवाद बनाने में कभी रूचि नहीं दिखाई.


कांग्रेस को सबसे ज्यादा झटका राज्यसभा की वोटिंग में उसके मुस्लिम विधायको के टूटने से लगा. इनमे से एक तो खुद राहुल गाँधी के संसदीय क्षेत्र के विधायक हैं. तिलोई विधान सभा से विधायक मो. मुस्लिम विधान सभा में पार्टी के चीफ व्हिप भी थे.

शनिवार की क्रास वोटिंग के बाद पार्टी ने हालाकि उन्हें हटा दिया, मगर यह सवाल खड़ा हो गया कि आखिर किन परिस्थितियों में इन विधायको ने पार्टी को गच्चा दिया ?

कांग्रेस की हालत सूबे में बीते 28 सालों से ख़राब है. हलाकि 2012 के विधान सभा चुनावो में पार्टी को मिली 29 सीटों ने कुछ मनोबल बढाया था मगर आक्रामक राजनीती के आभाव में कार्यकर्ताओं का मनोबल लगातार टूटता रहा.

शीर्ष नेतृत्व की संवादहीनता ने इस संकट को और भी बढाया. यूपी में पार्टी की सेहत सुधारने का जिम्मे ले कर आये प्रशांत किशोर को मिले फीड बैक में भी इसकी लगातार पुष्टि होती रही. माना जा रहा है कि पार्टी आला कमान ने इस फेरबदल के लिए मन तो बना लिया था मगर विधान परिषद् और राज्यसभा के चुनावो तक इस फैसले को टाल कर रखा गया था.

इस मतदान में हुई क्रास वोटिंग ने पार्टी की सारी कलाई खोल कर रख दी. क्रास वोटिंग करने वाले विधायको का कहना है कि उन्हें कभी भी सूबाई नेतृत्व ने महत्त्व नहीं दिया. यहाँ तक कि इन चुनावो की रणनीतिया बनाने में भी सूबाई नेतृव ने कोई रूचि नहीं ली.

हालिया दिनों में कांग्रेस कई राज्यों में संकट में आई है. उत्तराखंड से ले कर मेघालय और अब यूपी तक पार्टी कार्यकर्ताओं, नेताओं और विधायको की शिकायत यही रही है कि प्रभारी महासचिवो ने या तो उनकी बात नहीं सुनी या फिर शीर्ष नेत्रित्व तक उन्हें पहुँचाने ही नहीं दिया.

इसी असंतोष का नतीजा इन सभी राज्यों में देखने को मिला. उत्तराक्षंद का संकट तो मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अपने निजी कौशल से सम्हाल लिया मगर अरुणांचल, त्रिपुरा और असम में कांग्रेस टूट गयी. यही खतरा मेघालय में भी है और अब यूपी में विधायको की बगावत ने पार्टी महासचिवो की भूमिका पर सवालिया निशान लगा दिए हैं.

इसी लिए आला कमान ने चुनावी राज्यों उत्तर प्रदेश और पंजाब के प्रभारी महासचिव बदल भी दिए हैं. हालाकि बदलाव होने शुरू तो हो गए हैं मगर अब सवाल यह भी है कि यूपी में बदलाव इतनी देर से हुए कि इसका कितना फायदा पार्टी को आने वाले चुनावो में होगा इस पर संदेह बरक़रार है.

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