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भारतीय सड़को का व्याकरण बदल देगा आगरा लखनऊ एक्सप्रेसवे

 Girish Tiwari |  2016-09-21 08:52:30.0

भारतीय सड़को का व्याकरण बदल देगा आगरा लखनऊ एक्सप्रेसवे
तहलका न्यूज ब्यूरो

लखनऊ. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव आजकल अक्सर कहा करते हैं कि सड़को से ही विकास होता है . बीते दिनों पत्रकारों से बात करते हुए अखिलेश यादव ने एक उदहारण दिया था – “अमेरिका ने सड़के बनायीं और सड़को ने अमेरिका बना दिया”. और अखिलेश यादव जब विकास के अपने शो केश को दिखाते हैं तो उसमे पहला नाम आगरा लखनऊ एक्प्रेस वे का नाम लेना नहीं भूलते.

आइये जानते हैं कि आखिर क्या है ऐसा इस सड़क में जिसके वजह से यह कहा जा रहा है कि यह एक सड़क भारत में सड़क निर्माण का पूरा व्याकरण ही बदल देगी. शुरुआत में इस निर्माण प्रक्रिया को आश्चर्य से देख रहे NHAI ने भी अब इसके मानको को अपनाने की घोषणा कर दी है.


संभवतः भारत का यह पहला एक्प्रेस वे है जो न सिर्फ सड़क परिवहन के लिए शानदार अनुभव होगा बाकि फाईटर प्लेन के लिए यह एक माकूल रनवे भी होगा. इस सड़क पर फाईटर प्लेन से ले कर हेलीकाप्टर तक कभी भी आराम से उतर सकते हैं.

302 किलोमीटर की लम्बाई वाली यह सड़क देश की बसे लम्बी 6 लेन एक्सेस कंट्रोल ग्रीन-फील्ड एक्सप्रेस-वे है. खराब मौसम और बाढ़ जैसी कठिनाइयों के बावजूद देश की यह सबसे बड़ी ग्रीन-फील्ड परियोजना 22 महीनों के रिकॉर्ड समय में तैयार होने जा रही है.

यह थी बड़ी चुनौती

आगरा से लखनऊ को जोड़ने वाली इस परियोजना की चुनौतियाँ भी बड़ी थी. अपने पूरे रस्ते में 5 नदियों से होकर गुज़रने वाले इस सड़क में कुल 900 स्ट्रक्चर्स हैं जिनमें 13 बड़े पुल, 52 छोटे पुल, 4 रेल पुल, 132 फुट-ओवर पुल और 59 अंडर-पास शामिल हैं. 4 राष्ट्रीय राजमार्गों और 2 राज्यमार्गों को जोड़ने वाले इस विशाल प्रोजेक्ट की ज़िम्मेदारी यूपीडा के सीईओ नवनीत सहगल के हवाले है जिनकी लगातार मानिटरिंग के वजह से यह परियोजना न सिर्फ रिकार्ड समय में पूरी हो रही है बल्कि अनुमानित लगत में 10% की बचत का अनुमान भी लगाया जा रहा है.

हमेशा से माना जाता था कि एक बड़ी सड़क बनाने में लम्बा वक्त लगता है और खास तौर से यूपी के मामले में यह कहावत बहुत ही प्रसिद्द थी कि यहाँ सड़क निर्माण का कोई काम बिना तीन बार समय सीमा बढ़ाये पूरा ही नहीं हो सकता. सीएम अखिलेश भी इस बात से बखूबी परिचित थे कि अगर यह सड़क गुणवत्ता से ले कर समय सीमा तक के मानको पर खरी नहीं उतरी तो उनका विकास का शो केस आलोचना का शिकार हो सकता है . इसलिए इस एक्सप्रेस वे की कमान उन्होंने नवनीत सहगल जैसे कर्मठ आईएएस अफसर के हांथो में सौंप दी.

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दूसरी सबसे बड़ी चुनौती थी इस सड़क के लिए भूमि अधिग्रहण. भारत के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि किसानो ने बिना किसी विवाद के इतनी बड़ी जमीन सरकार को दे दी हो. इसके लिए मुआवजा राशि इतनी आकर्षक रखी गयी कि किसानो ने ख़ुशी ख़ुशी अपनी जमीन दे दी और त्वरित भुगतान ने प्रक्रिया को बाधा रहित कर दिया.

मायावती सरकार में बने यमुना एक्सप्रेस वे में उद्योगपतियों को जमीन देने के मामले ने बड़ा तूल पकड़ा था , मगर आगरा लखनऊ एक्सप्रेस वे में किसान अखिलेश सरकार की प्राथमिकता बन गए.इस सड़क के किनारे 4 जगहों पर मण्डियाँ बनायीं गयी है जो इलाके के किसानो के उपज को सीधे बड़े बाजार तक पहुचायेंगी.

अखिलेश यादव का पर्यावरण प्रेम यहाँ भी झलका नतीजतन सड़क के किनारे हरियाली और रेंन वाटर हार्वेस्टिंग की पूरी व्यवस्था भी की गयी.

लागत में फिट क्वालिटी में हिट

इस पूरी सड़क की लागत भी एक बड़ी कामयाबी है. आम तौर पर भारत में बनाने वाली सड़को की लागत को ले कर हमेशा ही सवालों के घेरे में रहती है. मगर दूसरी सड़क परियोजनाओं से तुलनात्मक रूप से इस एक्सप्रेस वे की लागत बहुत नियंत्रित रखी गयी है.
अखिलेश यादव के इस ड्रीम प्रोजेक्ट को समय समय पर विवादों के घेरे में लेने की भी कोशिशे हुयी और इसकी लागत पर भी सवाल उठाये गए मगर वे परवान नहीं चढ़ सके. लखनऊ में केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह की पहल पर बन रहे आउटर रिंग रोड की कुल लम्बाई 94 किलोमीटर की है और यह 4 लेन हाई-वे है जिसकी कुल कीमत 5214 करोड़ रुपए अनुमानित है. इस तरह प्रति किलोमीटर कीमत लगभग 55 करोड़ रुपए की लागत आ रही है.इसके बर अक्स 8 लेन तक बढ़ाए जा सकने वाले ‘आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे’ की कुल निर्माण लागत 9056 करोड़ रूपये है यानी इसे बनाने में लगभग 30 करोड़ रुपए प्रति किलोमीटर का ही खर्च आया.

इसके अलावा परियोजना के भू-अधिग्रहण पर 2548 करोड़ रूपरे खर्च किए गए हैं उसे भी लागत में जोड़ने पर 302 किलोमीटर लम्बे एक्सप्रेस-वे की प्रति किलोमीटर लागत 38 करोड़ रुपए ही होगी जो एनएचएआई के प्रति किलोमीटर 55 करोड़ की लागत से काफी कम है.

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किसानो के साथ साथ सड़क निर्माण से जुडी कंपनी को समय और गुणवत्ता को सुनिश्चित करने के लिए बोनस भी दिया जाने की व्यवस्था भी है और निर्माण के 5 साल तक इस सड़क का रख-रखाव भी वही कंपनियाँ करेंगी. इस परियोजना का ऑडिट भारत सरकार की संस्था RITES द्वारा किया जा रहा है.

सियासी आलोचनाओ से इतर देखें तो अखिलेश सरकार ने एक इसी सड़क बनाने में कामयाबी हासिल की है जो आने वाले वक्त में देश में सदल निर्माण का पूरा व्याकरण ही बदल देगी.

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