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वायु प्रदूषण इस सदी की सबसे बड़ी चुनौती

 Tahlka News |  2017-01-08 09:18:39.0




डा. सीमा जावेद

( पर्यावरण विद एवं स्वतंत्र पत्रकार)

ज़हरीली हुई हवा इस सदी में विकासशील देशों के लिए एक सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आयी है। नया साल शुरू होते ही चीन की राजधानी बीजिंग पर जहरीली धुंध छाए रहने से चीन द्वारा भयावह वायु प्रदूषण की स्थिति में जारी किए गए ऑरेंज अलर्ट और वहीं दूसरी तरफ दिल्ली में घने स्माग और कोहरे के चलते लोगों का साँस लेना दुश्वार जैसी घटनाएँ इस चुनौती की महज़ बानगी हैं ।

बच्चों के लिए संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी यूनीसेफ के अनुसार उच्च वायु प्रदूषण दुनिया के लिए खतरे की घंटी है। यदि वायु प्रदूषण कम करने के लिए निर्णायक कदम नहीं उठाए गए तो दैनिक जीवन पर पड़ने वाला प्रतिकूल प्रभाव सामान्य बात बन जायेगी। इसमें बताया है कि लगभग 30 करोड़ बच्चे बाहरी वातावरण की इतनी ज्यादा विषैली हवा के संपर्क में आते हैं जिससे उन्हें गंभीर शारीरिक हानि हो सकती है और उनके विकसित होते मस्तिष्क पर भी इसका दुष्प्रभाव पड़ सकता है। दुनियाभर के सात बच्चों में से एक बच्चा ऐसी बाहरी हवा में सांस लेता है जो अंतरराष्ट्रीय मानकों से कम से कम छह गुना अधिक दूषित है। बच्चों में मृत्युदर का एक प्रमुख कारण वायु प्रदूषण है।


लगभग दो अरब बच्चे ऐसे इलाकों में रहते हैं जहां बाहरी वातावरण की हवा विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा तय किए गए न्यूनतम वायु गुणवत्ता के मानकों से कहीं अधिक खराब है। इसमें बताया गया है कि वाहनों से निकलने वाला धुंआ, जीवाश्म ईंधन जलाने , डीज़ल दहन आदि के वायुजनित प्रदूषक तत्वों के कारण हवा जहरीली होती है।

ऐसे प्रदूषित वातावरण में रहने को मजबूर सर्वाधिक बच्चे दक्षिण एशिया में रहते हैं। इनकी संख्या लगभग 62 करोड़ है। इसके बाद अफ्रीका में 52 करोड़ और पश्चिमी एशिया तथा प्रशांत क्षेत्र में प्रदूषित इलाकों में रहने वाले बच्चों की संख्या 45 करोड़ है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट के अनुसार 10 व्यक्तियों में से नौ खराब गुणवत्ता की हवा में सांस ले रहे हैं जबकि वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों में से 90 प्रतिशत मौतें निम्न एवं मध्यम आय वाले देशों में होती हैं। वहीं तीन मौतों में से दो मौतें भारत एवं पश्चिमी प्रशांत क्षेत्रों सहित दक्षिणपूर्वी एशिया में होती हैं। । वायु प्रदूषण स्वास्थ्य के लिए विश्व का सबसे बड़ा पर्यावरणीय खतरा है और इसका समाधान प्राथमिकता के आधार पर होना चाहिए क्योंकि इसका बढ़ना जारी है भारत में वर्ष 2012 के आंकड़ों के मुताबिक 621138 लोगों की मौत एक्यूट लोअर रेसपीरेटरी इंफेक्शनए क्रॉनिक आब्सट्रक्टिव पलमोनरी डिसार्डर, इस्केमिक हार्ट और फेफड़े के कैंसर से हुई।

अमेरिकन एसोसिएशन फॉर दि एडवांसमेंट ऑफ साइंस (एएएएस) में अपना अध्ययन में कहा है कि वायु प्रदूषण दुनियाभर में मौत का चौथा सबसे बड़ा खतरनाक कारक है और इस समय बीमारियों को पर्यावरण संबंधी सबसे बड़ा खतरा है। वायु प्रदूषण जनित बीमारियों के कारण 2013 में चीन में 16 लाख जबकि भारत में 14 लाख लोगों की मौत हुई।

दरअसल उद्योग वाहन बिजली आदि तेज़ी से हो रहे विकास या शहरीकरण के ऐसे अंग हैं जो वायु प्रदुषण को जन्म देते हैं भारत के लिये वायु प्रदूषण कोई नया मुद्दा नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ;डब्‍ल्‍यूएचओद्ध ने दो साल पहले अपनी एक रिपोर्ट में दिल्‍ली को दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बताया था। पिछले साल दिल्‍ली सरकार ने ऑड.ईवन योजना लागू कीए जिसे वायु प्रदूषण की समस्या से निपटने का सबसे उपयुक्‍त तरीके के तौर पर पेश किया गयाए लेकिन वक़्त ने इस दावे को गलत साबित कर दिया।

इस साल दीपावली के बाद एक हफ्ते से ज्‍यादा वक्‍त तक दिल्‍ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र ;एनसीआर खतरनाक धुंध की चादर में लिपटा रहा। इससे लोगों में खासी घबराहट रही। इस दौरान प्रदूषण का स्‍तर 999 पर 2.5 पीएम तक पहुंच गया। पहली बार हवा की गुणवत्‍ता को अखबारों में पहली सुर्खी मिली। एयर प्‍यूरीफायर और मास्‍क खरीदने के लिये लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। वायु प्रदूषण के खतरनाक स्‍तर को देखते हुए स्‍कूल बंद करने जैसे आपात कदम भी उठाये गये। दिल्‍ली के अनेक इलाकों में वायु प्रदूषण का स्‍तर डब्‍ल्‍यूएचओ द्वारा निर्धारित सुरक्षित मानकों से 40 गुना ज्‍यादा पाया गया।

पिछले साल दिल्‍ली में वाहनों को लेकर हुआ प्रयोगए प्रदूषण का दायरा बढ़ाने की वजह बना। इसमें पड़ोसी राज्‍यों पंजाब और‍ हरियाणा में कृषि सम्‍बन्‍धी कचरा जलाया जाना भी शामिल है। अब पड़ोसी राज्‍यों में फसलों के ठूंठ जलाये जाने पर उंगलियां उठायी जा रही हैं और सीपीसीबी या सेंट्रल पल्यूशन कंट्रोल बोर्ड ने एनसीआर क्षेत्र दिल्ली ए हरियाणाए यूपी और राजस्थान में निगरानी के लिए एक कंट्रोल रूम स्थापित किया हैं ।

वायु की गुणवत्ता को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन ;डब्ल्यूएचओद्ध की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों में से 10 भारत में हैं। इन 10 भारतीय शहरों में से चार प्रमुख और खासी आबादी वाले नगर उत्तर प्रदेश में हैं। उत्तर प्रदेश जनसंख्या के लिहाज से भारत का सबसे बड़ा राज्य है। गंगा के मैदानों में स्थित यह राज्य करीब 20 करोड़ लोगों का घर है और यहां देश का सबसे पवित्र आध्यात्मिक शहर वाराणसी भी स्थित है। दुनिया की सबसे खूबसूरत इमारतों में गिना जाने वाला ताजमहल भी इसी राज्य का गौरव है। इस ऐतिहासिक महत्ता के साथ.साथ यह राज्य अत्यन्त सघन औद्योगिक बनावट के लिये भी जाना जाता है।

राज्य के विभिन्न हिस्सों में उद्योगों के समूह फैले हुए हैं। ऊपरी दोआब से लेकर दक्षिण.पूर्व में पूर्वांचल तक मध्यम तथा भारी उद्योगों की पूरी श्रंखला इन क्षेत्रों के शहरी तथा ग्रामीण इलाकों में छितरी हुई है। यह ध्यान देने योग्य है कि दिल्ली से सटे गाजियाबाद शहर से लेकर मध्य प्रदेश की सीमा से लगे सोनभद्र तक राज्य के सम्बन्धित प्रमुख औद्योगिक केन्द्रों में भारत में उत्पादित तापीय बिजली के करीब 10 प्रतिशत हिस्से का उत्पादन होता है। ये सभी औद्योगिक केन्द्र गंगा के प्रमुख नदी बेसिन में स्थित हैं।

हालांकि डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट जहां दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों में से इलाहाबादए कानपुरए फिरोजाबाद और लखनऊ को शामिल करती हैए वहीं इसमें वाराणसी को छोड़ दिया गया हैए जिसे भारत के केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड बुलेटिन 2015 में देश का सबसे प्रदूषित शहर करार दिया गया था।

वर्ष 2009 में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने देश भर में चिंताजनक रूप से प्रदूषित हवा पानी और माटी की पहचान में मदद के लिये एक राष्ट्रव्यापी क्रम सूची जारी की थी द कमप्रीहेन्सिव एनवायरमेंटल पाल्यूशन इंडेक्स ;सीईपीआईद्धए इसमें चिन्हित 43 सबसे प्रदूषित जोन में से छह जोन सिंगरौलीए गाजियाबादए नोएडाए कानपुरए आगरा और वाराणसी उत्तर प्रदेश का हिस्सा हैं और इनमें पानी और हवा की गुणवत्ता पूरे देश में सबसे खराब है। कानपुर और वाराणसी में जल प्रदूषण का मुद्दा तो राष्ट्रीय स्तर पर मीडिया की सुर्खियों में आया लेकिन सिंगरौली को तवज्जो नहीं मिली।

प्रदेश के सामने समानान्तर रूप से एक और संकट सिर उठा रहा है। वह समस्या है जहरीली हवा कीए जो क्षेत्र के विभिन्न हिस्सों में वायु की गुणवत्ता को खराब कर रही है।वर्ष 2012 में आईआईटी दिल्ली ने वायु में घुलने वाले कणों को लेकर जारी अपनी रिपोर्ट में कहा था कि समूची गांगीय पट्टी पर नाइट्रोजन एवं सल्फर आॅक्साइड्स के स्तरों के उच्च स्तर पर पहुंचने का गहरा खतरा हैए जो वायु में पार्टिकुलेट मैटर के स्तरों में बढ़ोत्तरी के लिये जिम्मेदार है।

पार्टिकुलेट मैटर की वजह से वायु प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है और यह दमाए फेफड़ों की बीमारी और यहां तक कि दिल का दौरा पड़ने के लिये भी जिम्मेदार होता है। इसका असर आबादी के सबसे नाजुक वर्गाें यानी बच्चों और बुजुर्गों पर महसूस किया जाता है। वायु प्रदूषण को लेकर सबसे महत्वपूर्ण और ध्यान देने योग्य पहलू यह है कि ज्यादातर लोग कोयला आधारित बिजली संयंत्रों को वायु की गुणवत्ता को बदतर करने के लिये जिम्मेदार मानने से इनकार करते हुए दिखते हैं। उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र में कोयला आधारित बिजली संयंत्रों की संख्या करीब 7 हैए जिनमें करीब 12000 मेगावाट बिजली का उत्पादन होता है। दिल्ली के एक समूह ष्अरबन एमिशंसष् ने इस तथ्य को पहचाना है कि सर्दियों के मौसम में खासकर गांगीय क्षेत्र वायु के प्रवाह के रुख में बदलाव के कारण सैकड़ों किलोमीटर दूर स्थित बिजली संयंत्रों से प्रदूषणकारी तत्व उड़कर इस क्षेत्र में आ जाते हैं। इनके द्वारा तय की जाने वाली दूरी हवा के प्रवाह की तेजी पर निर्भर करती हैए जो क्षेत्र के प्रदूषण स्तरों में खासी बढ़ोत्तरी लाती हैं। दुनिया भर में कोयला आधारित बिजली संयंत्रों को भारी मात्रा में वायु तथा जल प्रदूषण के लिये जिम्मेदार कारक के रूप में चिह्नित किया गया है। यह प्रदूषण लाखों मौतों का कारण बनता है।

सेंटर फार एन्वायरमेंट एण्ड एनर्जी डेवलपमेंट ;सीईईडीद्धए इंडियास्पेंड तथा केयर फॉर एयर द्वारा जारी की गयी ष्लिफ्टिंग द स्माग रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि कि गांगीय पट्टी में भारी औद्योगिक गतिविधियों की वजह से सम्पूर्ण उत्तरीय भारतीय क्षेत्र में वायु की गुणवत्ता में तेजी से गिरावट आयी है। यह रिपोर्ट केन्द्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वर्ष 2015 के डेटा पर आधारित है।

इसमें यह निष्कर्ष निकाला गया है कि पिछले साल वाराणसी में वायु की गुणवत्ता एक भी दिन अच्छी नहीं रही। पिछले साल के 227 दिनों के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार इस दौरान वाराणसी के निवासी एक भी दिन अच्छी हवा में सांस नहीं ले सके। इसी तरह इलाहाबाद में भी प्रदूषण के स्तरों की 263 दिनों तक निगरानी की गयी लेकिन इस दौरान वहां भी हवा की गुणवत्ता एक भी दिन अच्छी नहीं रही।

वायु प्रदूषण के लिये औद्योगिक तथा बिजली संयंत्र ही जिम्मेदार नहीं हैं। दरअसलए कंडे और उपले जलाने ;मौसमी गतिविधिद्धए रसोई से निकलने वाले धुएं ;जैव ईंधनद्ध वाहनों से निकलने वाले धुएंए ईंट भट्ठों और बिजली के जनरेटर से निकलने वाले धुएं का भी गांगीय पट्टी में प्रदूषण का बड़ा योगदान है।

भारत के सबसे प्रदूषित शहरों में शुमार होने के बावजूद वाराणसी में दिल्ली के मुकाबले पर्याप्त संख्या में वायु गुणवत्ता निगरानी केन्द्रों की कमी है। रिपोर्ट के मुताबिक श्वाराणसी में केवल एक आनलाइन वायु गुणवत्ता निगरानी इकाई लगी है जो पीएम 2ण्5 और पीएम10 को मापने में सक्षम हैए जबकि एक्यूआई स्कोर उपलब्ध नहीं है। तुलना करें तो दिल्ली में 13 आनलाइन निगरानी केन्द्र हैं जो पीएम10 और पीएम 2ण्5 को मापने में सक्षम हैं। साथ ही एक्यूआई स्कोर हर दिन उपलब्ध रहता है। वाराणसी में वायु गुणवत्ता के मैनुअल केन्द्रों सम्बन्धी आरटीआई जानकारी से पता लगा है कि पीएम10 के मूल्यों में उल्लेखनीय अन्तर दर्ज किये जा रहे हैं।श्

दिल्ली की संस्था ष्अरबन एमिशंसष् द्वारा किये गये अध्ययनों में यह पाया गया है कि खासकर सर्दियों के मौसम में गांगीय क्षेत्र में चलने वाली हवा के रुख में बदलावों की वजह से सैकड़ों किलोमीटर दूर स्थित बिजली संयंत्रों से निकलने वाले प्रदूषणकारी तत्व उनके साथ उड़ आते हैं। इसकी वजह से क्षेत्र के प्रदूषण स्तरों में कई गुना वृद्धि होती है।

इनमें घनी औद्योगिक पट्टी वाली घनी आबादी में तापीय विद्युत संयंत्रों की केन्‍द्रीभूत स्थिति वायु की गुणवत्‍ता के उत्तर भारत की सम्‍पूर्ण गांगीय पट्टी की हवा की खराब गुणवत्‍ता के लिये जिम्‍मेदार हैं। आमराय की कमी और अलग.अलग मत होने की वजह से हर साल ठंड के मौसम में दिल्‍ली तथा अन्‍य उत्‍तर भारतीय शहर चोक हो जाते हैं। अब कार्रवाई में देर होने से हालात उस दौर में पहुंच जाएंगेए जहां जान का ही नुकसान होगा।

वायु की गुणवत्ता सुधारने के लिये शहरी तथा राज्य के प्रशासनों को मिलकर एक क्षेत्र आधारित कार्ययोजना तैयार करनी चाहिये।अगर पर्यावरण का संरक्षण ना किया जाए तो कोई भी राज्य अपने नागरिकों के लिये जीवन की गुणवत्ता सुनिश्चित नहीं कर सकता है ।यह एक ऐसा सामाजिक और राजनीतिक एजेंडा है जिसे प्रदेश की सभी राजनीतिक पार्टियों को अपनाना चाहिये।

प्रमुख वायु प्रदूषण तथा उनके स्रोत

कार्बन मोनो आक्साइड (CO) यह गंधहीन, रंगहीन गैस है। जो कि पेट्रोल, डीजल तथा कार्बन युक्त ईंधन के पूरी तरह न जलने से उत्पन्न होती है। यह हमारे प्रतिक्रिया तंत्र को प्रभावित करती है और हमें नींद में ले जाकर भ्रमित करती है।

कार्बन डाई आक्साइड (CO2) यह प्रमुख ग्रीन हाउस गैस है जो मानव द्वारा कोयला, तेल तथा अन्य प्राकृतिक गैसों के जलाने से उत्पन्न होती है।

क्लोरो-फ्लोरो कार्बन (CFC)
यह वे गैसें हैं जो कि प्रमुखत: फ्रिज तथा एयरकंडीशनिंग यंत्रों से निकलती हैं। यह ऊपर वातावरण में पहुँचकर अन्य गैसों के साथ मिल कर 'ओजोन पर्त' को प्रभावित करती है जो कि सूर्य की हानिकारक अल्ट्रावायलेट किरणों को रोकने का कार्य करती हैं।

लैड यह पेट्रोल, डीजल, लैड बैटरियां, बाल रंगने के उत्पादों आदि में पाया जाता है और प्रमुख रूप से बच्चों को प्रभावित करता है। यह रासायनिक तंत्र को प्रभावित करता है। कैंसर को जन्म दे सकता है तथा अन्य पाचन सम्बन्धित बीमारियाँ पैदा करता है।

नाइट्रोजन आक्साइड (Nox) यह धुऑं पैदा करती है। अम्लीय वर्षा को जन्म देती है। यह पेट्रोल, डीजल, कोयले को जलाने से उत्पन्न होती है। यह गैस बच्चों को, सर्दियों में साँस की बीमारियों के प्रति, संवेदनशील बनाती है।

सस्पेन्ड पर्टीकुलेट मैटर (SPM) कभी कभी हवा में धुऑं-धूल वाष्प के कण लटके रहते हैं। यही धुँध पैदा करते हैं तथा दूर तक देखने की सीमा को कम कर देते हैं। इन्हीं के महीन कण, साँस लेने से अपने फेंफड़ों में चले जाते हैं, जिससे श्वसन क्रिया तंत्र प्रभावित हो जाता है।

सल्फर डाई आक्साइड (SO2) यह कोयले के जलने से बनती है। विशेष रूप से तापीय विद्युत उत्पादन तथा अन्य उद्योगों के कारण पैदा होती रहती है। यह धुंध, कोहरे, अम्लीय वर्षा को जन्म देती है और तरह-तरह की फेफड़ों की बीमारी पैदा करती है।

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