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गठबंधन के लिए तैयार छोटे चौधरी को है लेन देन का इंतज़ार

 Tahlka News |  2016-11-08 08:57:58.0

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उत्कर्ष सिन्हा 

लखनऊ. यूपी के विधान सभा चुनावो में ताजा शोर महागठबंधन का है. समाजवादी पार्टी के नेतृत्व में बनने वाले इस संभावित महागठबंधन के लिए आई हालिया तेजी को अब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के ताजा सकारात्मक रुख से और बल मिला है.

इस गठबंधन में एक प्रमुख हिस्सा बनाने को तैयार छोटे चौधरी यानी अजीत सिंह अब अपनी पार्टी के हितो को ले कर ज्यादा मुखर हो रहे हैं. पश्चिम यूपी की सियासत में अच्छा दखल रखने वाले चौधरी अजीत सिंह का दबदबा बीते लोकसभा चुनावो में अचानक ख़त्म हो गया और उनकी पार्टी राष्ट्रीय लोकदल शून्य पर निपट गयी थी.


बावजूद इस बड़ी हार के फिलहाल अजीत सिंह उत्साहित हैं और उनकी पार्टी खुद को अभी भी पश्चिमी यूपी की सियासत में खुद को वजनदार मान रही है. इसकी वजह बताते हुए राजनितिक विश्लेषक प्रो. शफीक अहमद कहते हैं. ”2013 के दंगो के कारण राष्ट्रीय लोकदल का मुख्य वोट जाट-मुस्लिम गठजोड़ बिखरा जरूर था मगर जैसे जैसे भाजपा का असली चेहता सामने आता गया. इसके बाद दिल्ली में चौधरी अजीत सिंह के बंगले को खाली कराने के लिए केंद्र सरकार ने जो तेजी दिखाई और इसे चौधरी चरण सिंह का समरक बनाने की बात नकारी, उससे जाट मतदाता में गुस्सा उभरा और उसकी सहानुभूति अजीत सिंह के साथ हो गयी है. रही सही कसर हरियाणा में जाट आरक्षण आन्दोलन के दौरान भाजपा सरकार के रवैये ने निकल दी. इसके बाद पश्चिमी यूपी का जाट वोटर एक बार फिर अजीत सिंह के साथ आ गया है. संजीव बालियाँ और सत्यपाल सिंह जैसे भाजपा नेताओं की उस इलाके में व्यापक स्वीकृती नहीं है और इस वजह से अजीत सिंह ही फिलहाल जाट वोटरों की पसंद है.”

अजीत सिंह इस स्थिति को बखूबी समझ रहे हैं. उन्हें लगता है कि जाट वोटो की ताकत पश्चिमी यूपी की लगभग 40 सीटो पर बहुत मायने रखती है और अब इसी ताकत के बल पर वे महागठबंधन में अपना हिस्सा चाहते हैं.
“ यह बात जरूरी है कि अगर हम गठबंधन चाहते हैं तो यह उस शर्त पर नहीं होगा कि हम क्या चाहते हैं, या कोई एक दल क्या चाहता है, बल्कि क्या मिलेगा और क्या देना है इस बात पर काफी चर्चा की जरूरत है. इसमें सिर्फ दो मत नहीं हो सकते हैं, कोई भी गठबंधन तब तक नहीं हो सकता है जबतक लेन देन तय ना हो.”  -- चौधरी अजीत सिंह 

अजीत का अनुमान है कि सपा भी गठबंधन के लिए इसलिए आगे बढ़ रही है क्यूकी उसका आंकलन भी यही है कि बिना गठबंधन उसकी सम्भावनाये कमजोर पड़ती है.
यूपी विधानसभा के लिए पश्चिमी यूपी पर भाजपा की निगाह भी है. मुजफ्फर नगर दंगो के बाद हुए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के बाद इस इलाके में भाजपा को बहुत फायदा हुआ था. इसके बाद भाजपा सांसद हुकुम सिंह ने कैराना से हिन्दुओं के पलायन की सूची और दादरी में गोमांस के आरोप में हुयी अख़लाक़ की हत्या के मुद्दे के जरिये भी पार्टी ने सांप्रदायिक विभाजन की कोशिशो को हवा देने में कोई कसर नहीं रखी.
पश्चिम यूपी में समाजवादी पार्टी का जलवा तब भी बहुत कमजोर था जब 2012 में उसे पूर्ण बहुमत मिला था. मुजफ्फर नगर दंगो के बाद स्थिति समाजवादी पार्टी के लिए और भी ख़राब हो गयी. सरकार पर दंगो को रोकने में नाकामयाबी का आरोप भी लगा था.
महागठबंधन के अगुआ नेताओं को लगता है कि कांग्रेस के साथ आने से मुस्लिम वोटो को विखरने की संभावनाए भी कम होती हैं.
चौधरी अजीत सिंह का कहना है कि मैंने पहले ही कहा था कि भाजपा को रोकने के लिए गठबंधन इस समय की जरूरत है. जब सपा के कार्यक्रम में एक मंच पर तमाम नेता आए तो इसका मतलब यही है कि सभी गठबंधन के पक्षधर हैं.

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