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और अखिलेश ने खींच दी एक बड़ी लकीर

 Tahlka News |  2016-11-03 05:46:24.0

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उत्कर्ष सिन्हा

लखनऊ. 3 नवम्बर की सुबह सवा दस बजे जब यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव लखनऊ के ला मार्ट स्कूल के मैदान में समाजवादी विकास रथ के रवाना होने के अवसर पर कार्यकर्ताओं को संबोधित कर रहे थे तब दरअसल वे भारतीय राजनीती में एक नयी और बड़ी लकीर खींच रहे थे. अखिलेश ने अपने 10 मिनट के भाषण में जिस तरह के तेवर दिखाए और सूबे के विधानसभा चुनावो के आगे बढ़ कर देश के मुस्तकबिल की बात से जोड़ दिया वह सीधा संकेत था की देश की राजनीती में आने वाले दिनों में वे एक बड़ा विकल्प बनाने के ख्वाहिशमंद हैं.

अखिलेश के रथयात्रा के लिए जिस तरह से नौजवानों का हुजूम लखनऊ में जुटा है वह जयप्रकाश नारायण के आन्दोलन के बाद शायद सबसे बड़ा हुजूम है. 1975 में इंदिरा गाँधी द्वारा इमरजेंसी के की घोषणा के बाद जब जय प्रकाश नारायण ने युवाओं का सड़को पर उतरने का आह्वान किया था उस वक्त के बाद भारतीय राजनीति में मंडल और कमंडल आन्दोलन जैसी कई कई बड़ी घटनाये हुयी मगर इस बार के नौजवानों के जमावड़े के पीछे सिर्फ मकसद था अखिलेश यादव को अपना निर्विवाद नेता मानना.


बीते 2 महीनो में समाजवादी पार्टी में बहुत उथल पुथल हुयी. एकबारगी लगा की पार्टी टूट जाएगी मगर ये अखिलेश का संयम ही था जिसने न सिर्फ पार्टी को बचाया बल्कि मुलायम सिंह यादव जैसे मजबूत और जिद्दी नेता को भी अब यद् सन्देश मिल गया है की समाजवादी पार्टी का भविष्य जिस पीढ़ी के हांथो में है उसके निर्विवाद नेता सिर्फ अखिलेश यादव ही है.

इस संकट की घडी में अखिलेश ने अपनी नेतृत्व क्षमता का भी परिचय दिया है. उनके समर्थक बड़ी संख्या में पार्टी से निकले गए मगर इन समर्थको को अखिलेश ने नहीं छोड़ा और न ही समर्थको ने उन्हें छोड़ा.
मुलायम की लोहिया, जनेश्वर के प्रतीक वाले समाजवाद को अखिलेश ने और आगे बढाया है . इस बार उनके रथ पर सम्पूर्ण क्रांति के अगुआ जयप्रकाश नारायण की तस्वीर भी मौजूद है. जेपी देश में युवा क्रांति के प्रतीक हैं और अखिलेश जेपी के प्रतीक को अपने साथ जोड़ कर रख रहे हैं. इसी तरह किसान नेता चौधरी चरण सिंह की तस्वीर भी इस बार रथ पर है , जाहिर है अखिलेश किसानो और नौजवानों के साथ खुद को जोडके दिखना चाहते हैं और वे काफी हद तक इस में सफल भी हैं.

अखिलेश ने 3 नवम्बर को कई काम एक साथ किये . आपर समर्थन के साथ रथ पर निकले अखिलेश ने मोदी और मायावती जैसे अपने विपक्षियों को इस तरह की भीड़ से आगे निकलने की चुनौती दी है. किसी भी नेता के रोड शो में अबतक 2-3 लाख की भीड़ तो होती थी या फिर रैलियों में मगर एक लम्बी रथयात्रा में 5 लाख से ज्यादा की भीड़ एतिहासिक है. साथ ही मंच पर शिवपाल यादव की मौजूदगी के बावजूद अखिलेश ने एक बार भी उनका नाम नहीं लिया. विवादस्पद मंत्री गायत्री प्रजापति को भी मंच पर जगह नहीं मिली. अखिलेश का सन्देश बहुत साफ़ था.

अखिलेश ने विपक्ष के साथ पार्टी के भीतर भी एक बड़ी लकीर खींच दी है. उन्होंने साफ़ कहा कि यह कहा जा रहा था की 3 नवम्बर और 5 नवम्बर के कार्यक्रम के बीच बड़ी दूर है मगर ये दोनों कार्यक्रम पार्टी के हैं और जो लोग भी 3 नवम्बर के कार्यक्रम को सफल बना रहे हैं वे ही 5 नवम्बर के कार्यक्रम को सफल बनायेंगे.

आज ही भाजपा भी अपने परिवर्तन यात्रा को रवाना करेगी और आने वाले 6 नवम्बर से उसकी यात्रायें निकलेंगी. राहुल गाँधी की यात्रा पूरी हो चुकी है ऐसे में अखिलेश और भाजपा की यात्राओं के बीच तुलना स्वाभाविक रूप से होगी. यह बात अखिलेश को बखूबी पता है और आज की भीड़ ने अखिलेश यादव को एक बढ़त तो दे ही दी है. अब मोदी मैजिक के भरोसे चुनावी समर में उतरने वाली भाजपा को अखिलेश मैजिक से निपटना है.

जाहिर है की यूपी का चुनाव भारतीय राजनीती की दिशा तय करने के लिए एक अहम् मोड़ साबित होने वाला है और इस बात के संकेत अखिलेश यादव के संबोधन में साफ़ दिखाई दे रहे हैं.

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