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टीपू ने दिखाए सुलतानी तेवर, अलग सिम्बल पर लड़ेंगे उनके प्रत्याशी !

 Tahlka News |  2016-12-29 12:43:58.0

टीपू-ने-निकली-तलवार

उत्कर्ष सिन्हा

लखनऊ. समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने सीएम अखिलेश यादव की गैरमौजूदगी में जब पार्टी के प्रत्याशियों की सूची जारी कर दी थी तभी जिस बात की संभावना जताई जा रही थी वही हुआ. गुरुवार की सुबह से शुरू हुए समाजवादी ड्रामे का जब शाम को अंत हुआ तब यह बात स्पष्ट हो गयी कि समाजवादी पार्टी के राजकुमार ने अपने बादशाह के खिलाफ खुली बगावत कर दी है.

गुरुवार की सुबह से ही मुख्यमंत्री के सरकारी आवास पर अखिलेश समर्थक विधायको और टिकट काटे गए मंत्रियों का जमावड़ा होना शुरू हो गया था. सुबह लगभग 10 बजे अखिलेश मुलायम सिंह से मिलने गए थे और उसके बाद उन्होंने अपने समर्थक विधायको और मंत्रियों से बैठक शुरू कर दी. इसके बाद अचानक दोपहर 1 बजे वे फिर से मुलायम सिंह से मिलने चले गए जहाँ मुलायम और शिवपाल के साथ उनकी बैठक करीब डेढ़ घंटे चली . मगर बात नहीं बनी. इसके बाद अखिलेश ने एक बार फिर अपने समर्थक विधायको के साथ बैठे और सबसे वादा किया कि वे सबको चुनाव लड़ायेंगे. थोड़ी ही देर बाद ही अखिलेश द्वारा 167 समर्थको की सूची भी जारी करने की खबर आनी शुरू हो गयी. बताया जा रहा है कि ये सभी अखिलेश समर्थित प्रत्याशी कहलायेंगे और वे अलग अलग सिम्बल पर चुनाव लड़ेंगे. इसके साथ ही लम्बे समय से अखिलेश के कड़े तेवरों का इन्तजार कर रहे उनके समर्थको में उत्साह की एक बड़ी लहर दौड़ गयी.


पार्टी में बीते तीन महीनो से चल रहे आतंरिक युद्ध को टालने में मुलायम सिंह भले ही कुछ दिन तक कामयाब रहे हो मगर सियासत के अखाड़े के मंझे पहलवान मुलायम सिंह यादव को उनके ही मैदान पर खुद के बेटे के हांथो शिकस्त खानी पड़ी है. अखिलेश के इस ताजा रुख के बाद मुलायम क्या फैसला करेंगे यह भी देखने वाली बात होगी मगर इतना तो तय है कि यूपी और पार्टी की सियासत में फ़िलहाल अखिलेश उन पर भारी पड़ गए हैं.

अब सियासी पंडितो को सपा महासचिव पद से एक बार बर्खास्तगी के बाद वापसी करने वाले प्रो राम गोपाल यादव के रुख पर भी है. महासचिव होने के नाते पार्टी के सिम्बल के बारे में राम गोपाल एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो सकते हैं. साथ ही यह भी हो सकता है कि यदि यह टूट औपचारिक रूप से हो जाती है तो पार्टी का चुनाव चिह्न विवादित बता कर इसे सीज करने का आवेदन भी कर दिया जाय.
अखिलेश के इस कदम के बाद यह भी माना जा रहा है कि उन्होंने मुलायम सिंह पर इस बात का दबाव बढ़ा दिया है कि या तो उनकी बात मानी जाए या फिर पार्टी की टूट का ठीकरा भी मुलायम सिंह पर ही पड़े. अखिलेश के इस कदम के बाद यदि मुलायम अनुशासनहीनता के नाम पर अखिलेश को बर्खास्त कर देते हैं तो अखिलेश फिर खुल के खेलेंगे. ऐसे में पहले से अखिलेश के पक्ष में झुक रही कांग्रेस के साथ गठजोड़ भी देखने को मिल सकता है.

5 नवम्बर को जब पार्टी की रजत जयंती मनाई गयी थी उसके पहले भी अखिलेश यादव ने अपनी ताकत दिखाई थी. उस वक्त यह भी चर्चा थी कि उन्हें इस बात का अंदेश था कि पार्टी उन्हें सीएम पद से हटाया भी जा सकता है और इसीलिए उन्होंने अपने समर्थक विधायको से अपने पक्ष में दस्तखत भी करवा लिए थे.

अखिलेश ने जो सूची मुलायम सिंह को दी थी उसमे से करीब 80 नाम काट दिए गए थे. इसके अलावा मुलायम सिंह ने मुख्यमंत्री पद का चेहरा भी किसी को घोषित करने से इंकार कर दिया था . ऐसे में अखिलेश के पास सख्त तेवर दिखाने के अलावा कोई चारा भी नहीं बचा था.

इस संभावित टकराव का अंदाजा अखिलेश को भी था और इसलिए ही उन्होंने एक तरफ तो मुलायम सिंह को आदर देने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी मगर साथ ही साथ उनके प्रचारों में अखिलेश की ब्रांडिंग अलग से ही हो रही थी. माना जा रहा है कि अखिलेश यादव की टीम ने प्रचार सामग्री की तैयारी भी इसी हिसाब से कर रखी है.

अब गेंद मुलायम सिंह के पाले में है देखना है कि वे क्या कदम उठाते हैं मगर एक बात तो तय है कि लम्बे इन्तजार के बाद टीपू ने अपनी तलवार म्यान से बाहर निकाल ही ली है.

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