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इंदिरा गांधी के इतिहास को दोहरा सकते हैं अखिलेश यादव

 Abhishek Tripathi |  2017-01-06 15:21:02.0

तहलका न्यूज ब्यूरो
लखनऊ. उत्तर प्रदेश में चुनाव की बिसात बिछ गई है। 11 फरवरी को पहले चरण के वोट भी पड़ जाएंगे, लेकिन उत्तर प्रदेश की सत्ता का संचालन कर रही समाजवादी पार्टी (सपा) में ऐसी रार छिड़ी है कि पार्टी का सिंबल साइकिल ही फंसता हुआ नजर आ रहा हे। ऐसे में 1969 का वो दौर याद आता है जब कांग्रेस विभाजित हो गई थी और इंदिरा गांधी जैसी दिग्गज नेता को नए चुनाव चिन्ह के साथ मैदान में उतरना पड़ा था, लेकिन उस दौर में इंदिरा गांधी का कद इतना बड़ा था कि चुनाव चिन्‍ह् मायने नहीं रखता था। वहीं, इस दौर में जब चिन्‍ह् नेता से बड़े हो गए हैं, तब पिता-पुत्र में छिड़ी ये जंग चिन्‍हविहीन होने पर क्या गुल खिलाएगी। ये देखने वाली बात होगी।


जब इंदिरा ने 'गाय-बछड़े' सिंबल से लड़ा चुनाव
आजादी के बाद शुरू के चार आम चुनावों में कांग्रेस का चुनाव चिन्‍ह 'दो बैलों की जोड़ी रहा।' 1969 में इंदिरा गांधी के बढ़ते कद के बीच कांग्रेस में पहली बार विभाजन हुआ। पार्टी कांग्रेस (ओ) और कांग्रेस (आर) में विभाजित हो गई। इंदिरा गांधी का गुट कांग्रेस (आर) के नाम से जाना गया। इस गुट ने कांग्रेस के चुनाव चिन्‍ह 'दो बैलों की जोड़ी' को अपनाने की कोशिश की लेकिन कांग्रेस (ओ) ने इसका विरोध किया। नतीजतन कांग्रेस के सिंबल को फ्रीज कर दिया गया। इस वजह से इंदिरा गांधी को कांग्रेस का परंपरागत सिंबल नहीं मिल पाया। इसके चलते इंदिरा गांधी ने इससे मिलते-जुलते 'गाय और बछड़ा' चुनाव चिन्‍ह को चुना। उसके बाद 1971 के आम चुनावों में इसी चुनाव चिन्‍ह के साथ इंदिरा गांधी ने आम चुनावों में जबर्दस्‍त सफलता हासिल की।

अखिलेश के साथ 206 विधायक
समाजवादी पार्टी के कुनबे में जारी कलह और सुलह की कोशिशों के बीच पार्टी सिंबल 'साइकिल' को लेकर लड़ाई चुनाव आयोग के सामने है। चुनाव आयोग ने सपा के दोनों गुटों को नोटिस भेजकर समर्थन पर हलफनामा दायर करने को कहा है। इस बीच सीएम अखिलेश यादव ने समर्थक विधायकों और मंत्रियों के साथ लखनऊ में बैठक की। अखिलेश ने समर्थकों से चुनाव में उतरने को कहा और बताया कि पार्टी सिंबल का मामला वे देख लेंगे। अखिलेश के समर्थन में 206 विधायकों के समर्थन पत्र पर हस्ताक्षर कराया गया।

मुलायम या अखिलेश के पास अब क्या विकल्प बचा है
जानकारों की मानें तो, दोनों गुट यह दावा करेंगे कि वो असली समाजवादी पार्टी हैं। इसके बाद इलेक्शन कमीशन देखेगा कि किसके पास पार्टी के ज्यादा विधायक, सांसद, एमएलसी और पदाधिकारी हैं। इसे देखते हुए फैसला होगा कि पार्टी का सिंबल (साइकिल) किसे दिया जाए। हो सकता है कि किसी को भी सिंबल ना दिए जाए। दूसरी ओर, अगर तस्वीर साफ नहीं रही तो इलेक्शन कमीशन दोनों गुटों को नए सिंबल भी दे सकता है।

चुनाव आयोग ने दोनों गुटों को नोटिस भेजा
चुनाव आयोग ने दोनों गुटों से 9 जनवरी तक विधायकों, विधान परिषद सदस्यों और पार्टी के अन्य पदाधिकारियों के समर्थन को लेकर हलफनामा दायर करने को कहा है। गौरतलब है कि घमासान बढ़ने के बीच मुलायम सिंह और अखिलेश गुट ने चुनाव आयोग के सामने अपनी-अपनी स्थिति रखी थी। आयोग ने इसी के बाद 9 जनवरी तक हलफनामा दायर करने को कहा है।

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Abhishek Tripathi ( 2165 )

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