Breaking News
  • Breaking News Will Appear Here

इस पेड़ पर आजादी के दीवानों को लटकाकर अंग्रेजों ने बना दिया था कंकाल, आज तक शहीद हैं गुमनाम

 Anurag Tiwari |  2016-08-15 10:17:30.0

bawani imli, fatehpur, freedom struggle, Independence day

तहलका न्यूज ब्यूरो

फतेहपुर. जिले की बिन्दकी तहसील में इमली का एक ऐसा पेड़ है, जो अंग्रेजों की क्रूरता की आज भी गवाही देता है। इस पेड़ पर अंग्रेजों ने 1858 में 52 आजादी के दीवानों को फांसी पर लटका दिया था। उन्हीं 52 शहीदों की याद में आज यह पेड़ बावनी इमली के नाम से जाना जाता है।

आजादी की पहली जंग के समय 1857 में नाना साहेब के नेतृत्व में फतेहपुर जिले में भी आजादी के दीवानों ने अंग्रजों के खिलाफ जंग का एलान कर दिया था। इन्हीं आजादी के दीवानों में से एक थे रसूलपुर गांव के निवासी ठाकुर जोधा सिंह अटैया। इनकी आक्रमण करने की गुरिल्ला तकनीक से अंग्रेज़ खौफ खाते थे।

10 जून 1857 को जोधा सिंह ने अपने साथी क्रांतिकारियों के साथ फतेहपुर कचहरी और सरकारी खजाने पर कब्जा कर लिया। एक महीने बाद 7 जुलाई 1857 को मेजर रिनार्ड और हैवलाक अँगरेज़ सैनिकों के साथ शेरशाह सूरी मार्ग पर औंग कसबे चले आये।


जोधा सिंह ने एक बार फिर कमान संभाली और महाराज सिंह के साथ मिलकर अंग्रजों को कानपुर की ओर बढ़ने से रोका। जोधा सिंह अटैया को सरकारी कार्यालय लूटने एवं जलाये जाने के कारण अंग्रेजों ने उन्हें डकैत घोषित कर दिया।

bawani imli, fatehpur, freedom struggle, Independence day

इसके बाद जोधा सिंह ने 27 अक्टूबर 1857 को एक दरोगा और एक अंग्रेज सिपाही को मौत के घाट उतर डाला। अंग्रजों को भारत से बाहर भागने की ठान चुके जोधा सिंह ने 7 दिसंबर 1857 को एक बार फिर गंगापार रानीपुर पुलिस चौकी पर हमला करएक अंग्रेज परस्त को मौत की नींद सुला दिया।

दो दिन बाद इसी क्रांतिकारी गुट ने 9 दिसंबर को जहानाबाद में गदर काटी और छापा मारकर ढंग से तहसीलदार को बंदी बना लिया। जोधा सिंह ने दरियाव सिंह और शिवदयाल सिंह के साथ मिलकर जो गोरिल्ला युद्ध नीति अपनाई थी उससे अंग्रेजी हुकूमत बौखला गयी।

इस घटना के दो महीने बाद ही 4 फरवरी 1858 को दरियाव सिंह को उनके पुत्र सुजान सिंह, भाई निर्मल सिंह और अन्य साथियों को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया।  बदला लेने के लिए जोधा सिंह ने चुन चुनकर अंग्रेजों से सहानभूति रखने वालों, अंग्रेजों के दफ्तरों और खजानों पर हमले शुरू कर दिए। इन हमलों से बौखलाए अंग्रेजों ने जोर शोर से जोधा सिंह की तलाश शुरू कर दी।

गद्दारों ने यहाँ भी इतिहास में एक काला पन्ना जोड़ दिया जब उनकी मुखबिरी पर जोधा सिंह 28 अप्रैल 1858 को अपने इक्यावन साथियों के साथ लौटते वक़्त कर्नल क्रिस्टाइल की सेना द्वारा गिरफ्तार कर लिए गए। अंग्रजों ने सभी 52 व्यक्तियों को फांसी दे दी।

bawani imli, fatehpur, freedom struggle, Independence day

फांसी के लिए उन्होंने इसी इमली के पेड़ को चुना। लोगों में अंग्रेजी हुकूमत का खौफ पैदा करने के लिए इन लोगों के शवों को पेड़ से उतारा नहीं गया। कई दिनों तक यह क्रांतिकारियों के शव इसी इमली के पेड़ पर झूलते रहे और उनमे कीड़े पड़ गए। धीरे-धीरे इन क्रांतिकारियों के शव कंकाल में परिवार्तित हो गए।

लगभग एक महीने बाद चार जून की रात महाराज सिंह अपने हथियार बंद साथियों के साथ इस जगह पहुंचे और शवों को उतारकर शिवराजपुर में इन नरकंकालों की अंत्येष्टि की।

इस पूरे वाकये में अफसोसनाक बात यह रही कि आज तक जोधा सिंह के साथ शहीद हुए 51 क्रांतिकारियों के नाम तक नहीं पता चल पाए। इन 52 शहीदों की शहादत का गवाह बने इमली के पेड़ को बावनी इमली कहा जाता है।

Tags:    

  Similar Posts

Share it
Share it
Share it
Top