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यूपी चुनाव: कुछ ऐसा है मायावती का वोट बैंक, इस सीट पर बटन 'हाथी' का ही दबता है!

 Abhishek Tripathi |  2016-07-03 04:23:59.0

mayawatiतहलका न्यूज ब्यूरो
आगरा. यूपी विधानसभा चुनाव से पहले बसपा सुप्रीमो मायावती को आए दिन उनके करीबी ही परेशान करने में लगे हैं। पहले स्वामी प्रसाद मौर्य और बाद में आरके. चौधरी ने बसपा छोड़कर मायावती के कुनबे में सियासी हलचल पैदा कर दी है। दोनों नेताओं ने मायावती पर कई गंभीर आरोप भी लगाए, लेकिन मायावती का यही कहना है कि दोनों नेता गद्दार थे और पार्टी छोड़कर जाना ही उनके लिए बेहतर विकल्प था। बसपा के वरिष्ठ सूत्रों की मानें तो, दोनों नेताओं के पार्टी छोड़ने के बाद भी मायावती के दलित वोट बैंक पर कोई खास असर नहीं पड़ा है।


ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि यूपी में ऐसी कई विधानसभा सीटें हैं, जहां मायावती का वोट बैंक बिल्कुल पक्का है। एक तरीके से कहा जाए तो ये बसपा की आरक्षित सीट से कम भी नहीं। ऐसी ही एक सीट है आगरा छावनी। इस सीट पर पिछले तीन चुनावों से बसपा ने ही भारी बहुमत से जीत हासिल की है। मायावती ने प्रत्याशी कोई भी उतारा हो, लेकिन जीत बिल्कुल पक्की रहती है। आगरा छावनी सीट पर बसपा वोटरों को धर्म और जाति से कोई फर्क नहीं पड़ता है।


2012 के चुनाव में बसपा उम्मदीवार जीता
बता दें, 2012 विधानसभा चुनाव में बसपा से गुटयारी लाल दुबेश ने आगरा छावनी सीट से जीत हासिल की थी। उन्हें कुल 67 हजार 786 वोट मिले थे, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी बीजेपी उम्मीदवार गिरिराज सिंह धर्मेश 61 हजार 371 वोट ही पा सके। 2017 के चुनाव के लिए भी बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने इस सीट से गुटयारी लाल दुबेश को ही उम्मीदवार बनाया है।


बीजेपी और बीएसपी की होती है सीधी टक्कर
इससे पहले 2007 में जुल्फिकार अहमद भुट्टो ने 30 हजार 524 तो 2002 में मोहम्मद बशीर ने 32 हजार 182 वोट से जीत हासिल कर बीएसपी को ये सीट दिलाई। दोनों ही बार पारजित उम्मीदवार बीजेपी के केशो मेहरा रहे। केशो मेहरा को 2007 में 27 हजार 149 तो 2002 में 30 हजार 662 वोट मिले थे। यानी पिछले तीन चुनावों में आगरा छावनी सीट से मुख्य टक्कर बीएसपी और बीजेपी की ही रही है जिसमें हर बार बीएसपी को जीत मिली है।


बीजेपी को कम आंकना भी हो सकता है गलत
हालांकि, अगर और पीछे जाएं तो ये सीट बीजेपी के ही खाते में रही है। 1996 में बीजेपी के इन्हीं केशो मेहरा ने बीएसपी के हाजी इस्लाम कुरैशी को हराया था। केशो मेहरा को 44 हजार 556 वोट मिले जबकि हाजी इस्लाम कुरैशी को 38 हजार 933 वोट। 1993 में बीजेपी की ओर से रमेश कांत लवानियां मैदान में थे। उन्होंने तब सपा के कृष्णवीर सिंह को मात दी थी। लवानियां की झोली में 54 हजार 444 जबकि कष्णवीर सिंह की झोली में 37 हजार 144 वोट आए। सपा ने 2017 के चुनावों के लिए यहां से चंद्रसेन टपलू को अपना उम्मीदवार घोषित किया है।

दलित-मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र होने के कारण आगरा छावनी सीट बीएसपी का गढ़ बन गई है। हालांकि, बीजेपी उम्मीदवार इस सीट पर लगातार टक्कर दे रहे हैं। ऐसे में बीजेपी को यहां कमतर नहीं आंका जा सकता। अगर मुस्लिम वोट यहां बंटा तो बीजेपी यहां से कमबैक कर सकती है। वहीं सपा की जीत किसी चमत्कार से कम नहीं होगी।

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