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जातीय समीकरणों के फंसे पेंच के बीच सब लड़ेंगे यूपी की जंग

 Tahlka News |  2016-12-23 08:30:43.0

maya-akhilesh-modi

उत्कर्ष सिन्हा

लखनऊ. जैसे जैसे यूपी की चुनावी जंग तेज हो रही है वैसे वैसे सियासत की शतरंज की बिसात पर जाति के मोहरे ज्यादा महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं. भले ही बड़े नेता और पार्टिया पूरे साढ़े चार साल विकास की माला जपती हो मगर चुनाव आते आते भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा सच जातीय समीकरणों के रूप में सामने आ ही जाता है.

इस सच से कोई भी पार्टी खुद को अलग नहीं कर पा रही है. विकास के दावों के साथ खुद की ब्रांडिंग करने वाले यूपी के सीएम अखिलेश यादव ने भी चुनावी वेला में जाति का कार्ड खेल दिया. इसके पहले भाजपा ने जातीय क्षत्रपो को अपने पाले में लाने के लिए एक पूरी मुहीम ही चला दी थी और यादव छोड़ कर कमोबेश हर पिछड़ी जाति के क्षत्रपों को अपने साथ ले लिया. कांग्रेस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर भी इस काम में पीछे नहीं रहे और उन्होंने ब्राह्मण सीएम का शगूफा छोड़ दिया. बसपा की रणनीति तो पूरी तरह जातीय गोलबंदी पर हमेशा से ही टिकी रही है.


1980 के दशक के आखिरी सालो में बीपी सिंह द्वारा शुरू की गई मंडल की राजनीति ने यूपी और बिहार की सियासी तस्वीर को पूरी तरह बदल दिया. भाजपा द्वारा शुरू किये गए राम मंदिर आन्दोलन की हवा भी इसी जातीय गोलबंदी ने निकली थी. तब नारा लगा था “ मिले मुलायम कांशी राम- हवा हो गए जय श्रीराम” . मुलायम और कांशीराम के गठबंधन ने दलित और पिछड़ी जातियों को एक साथ खड़ा कर दिया था, यह गठबंधन तो टूट गया मगर तब से अब तक यूपी की सियासत इस जाति के समीकरणों में जो उलझी वो अब तक नहीं निकल सकी है.

मिशन 2017 के लिए भाजपा ने बड़ी बारीकी से इस समीकरण को बुना है. अनुप्रिया अटल के जरिये कुर्मी, ओम प्रकाश राजभर के जरिये राजभर और स्वामी प्रसाद मौर्य के जरिये कुशवाहा समाज को वह अपने साथ लाने की कवायद में है. इन सबकी अपने अपने जाति समुदाय में अच्छी पकड़ मानी जाती है.इसके साथ ही प्रदेश अध्यक्ष पद पर एक कम जाने पहचाने चेहरे केशव मौर्य की ताजपोशी भी इसी रणनीति का एक हिस्सा रही. भाजपा की रणनीति है कि गैर यादव पिछड़ी जातियों को अपने पाले में गोलबंद कर लिया जाए जिससे समाजवादी पार्टी का मजबूत समर्थक पिछड़ा वर्ग टूट सके. इसी योजना के तहत भाजपा ने पिछड़ा वर्ग सम्मलेनो का एक अभियान चला दिया.

भाजपा की इस रणनीति को ख़त्म करने के लिए अखिलेश यादव ने 17 पिछड़ी जातियों को एससी में शामिल करने की घोषणा कर के नया पत्ता फेंका है. अखिलेश यादव ने इस के जरिये यह सन्देश देने की कोशिश की है कि ज्यादा से ज्यादा पिछड़ी जातियों को आरक्षण का लाभ मिले. राज्य से प्रस्ताव पास कर गेंद उन्होंने केंद्र के पाले में डाल दी है. हालाकि यह पत्ता पहली बार नहीं इस्तेमाल नहीं किया गया है . सन 2005 से अब तक तीन बार मुलायम,पहले भी 2005 में मुलायम सिंह यह प्रस्ताव केंद्र को भेज चुके हैं मगर 2007 में मायावती ने सत्ता में आने के बाद इसे ख़ारिज कर दिया था. इस बार भी अखिलेश यादव के इस प्रस्ताव के फ़ौरन बाद मायावती की कड़ी टिप्पणी आ गयी और उन्होंने इस प्रस्ताव को ही गैरकानूनी बता दिया.

मायावती अपने मूल दलित वोटो को सहेजने की कोशिश में हैं. बीते दिनों भाजपा ने दलितों को अपने पाले में लाने के लिए कई आयोजन किये थे. इससे सतर्क मायावती ने भी भाजपा पर दलित विरोधी ठप्पा लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी . अब अखिलेश सरकार के ताजा फैसले के बाद भी उनके हांथो अपने कोर वोटर को इकठ्ठा करने का मौका हाँथ लग गया है.
अखिलेश यादव ने इस एक तीर से दो शिकार किये हैं. पहला पिछड़ी जातियों के रहनुमा होने का सन्देश और दूसरा दलितों को भाजपा के पाले में जाने से रोकना. अखिलेश यादव को बखूबी मालूम है कि यह शासनादेश या तो अदालत में फंसेगा या फिर संसद में मगर इस मामले में केंद्र की भाजपा सरकार को अपनी नीयत बतानी पड़ेगी , वही एससी कोटे में भागीदारी बढने से चिंतित दलित समुदाय भी भाजपा पर दबाव बनाएगा और फिर मायावती के खेमें में खड़ा हो जायेगा ऐसे में भाजपा के बनते समीकरण गडबड़ाने की स्थिति पैदा हो सकती है.

यूपी की जंग जीतने के लिए लगभग 30 प्रतिशत वोटो की न्यूनतम जरुरत है और इसी को पूरा करने के लिए सियासी गणित बैठाई जा रही है.

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