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बाल दिवस विशेष: चाचा नेहरूजी! आज बच्चों का है बुरा हाल शिक्षा के लिए मोहताज. आगे क्या होगा?

 Vikas Tiwari |  2016-11-14 05:45:42.0

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तहलका न्यूज़ ब्यूरो


नई दिल्ली. देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के जन्मदिन को हम हमेशा से बाल दिवस के तौर पर मनाते चले आ रहे हैं, लेकिन आज भी हमारे देश करोड़ों बच्चे दो जून की रोटी के लिए मोहताज हैं. शिक्षा के लिए मोहताज हैं, कुपोषण के शिकार हैं, मजदूरी करने को मजबूर हैं.


पढ़ाई-लिखाई तो भूल ही जाईये और इसी वजह से हमारे आस-पास हर जगह पढ़ने लिखने की उम्र में छोटे-छोटे बच्चे मेहनत मजदूरी करने में लगे हुए हैं लेकिन इस तरफ किसी का ध्यान जाता ही नहीं है.


केवल बाल दिवस के दिन हम ये याद कर लेते हैं कि बच्चों के लिए कुछ करना चाहिए लेकिन करने का वो दिन कब आएगा इस बारे में शायद ही कोई जानता हो. सरकार सर्व शिक्षा अभियान के तहत करोड़ों रुपया ऐसे बच्चों के लिए खर्च कर रही है.


जिससे उनको शिक्षित किया जा सके और समाज की मुख्य धारा से जोड़ा जा सके लेकिन आज भी बच्चे दो जून की रोटी के लिए ऐसे काम करने को मजबूर हैं.


जो शायद उनकी उम्र से दोगुने और तीन गुने ज्यादा बड़े लोग करते हैं. क्या उन बच्चों को पढ़ने का अधिकार नहीं है. बाल दिवस केवल एक दिन स्कूलो में मना लेने से इस त्यौहार का उद्देश्य खत्म नही हो जाता है आज भी हमारे देश में बालमजदूरी जैसे जैसे जघन्य अपराध होते रहते है.


जिस उम्र में बच्चो के हाथ में किताबे होनी चाहिए उस उम्र में इन बच्चो को आर्थिक कमजोरी के चलते इन्हें काम करने पर मजबूर कर दिया जाता है जिसके चलते इनके जीवन में पढाई का कोई महत्व नही रह जाता है.


ऐसे में अगर बच्चे पढ़ लिख न सके तो एक विकसित राष्ट्र का सपना भी देखना नही चाहिए ऐसे में बस यही प्रश्न उठता है हमारे देश के सरकारों को बच्चो को बालमजदूरी से बचाने के लिए कानून का निर्माण किया जाय और पूरी सख्ती से इसे लागू भी किया जाय और साथ में इन बच्चो के पढाई के खर्चो को भारतीय सरकारों को एक सीमा तक खुद उठाना चाहिए तभी हम एक विकसित राष्ट्र का सपना देख सकते है और तभी बाल दिवस मनाने का उद्देश्य भी पूरा होगा.


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नाम और शिक्षा का अधिकार:-

शिक्षा का अधिकार या फिर सर्व शिक्षा अभियान बस नाम मात्र के हैं। हकीकत तो यह है कि शिक्षा में भी भेदभाव हो रहा है. जो बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ रहे हैं और जो बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे हैं दोनों में विशेष अंतर होगा. एक बिल्कुल एक्सीलेंट और दूसरा निल बटे सन्नाटा.


ऐसा नहीं है कि सरकारी स्कूलों में पढ़नेवाले बच्चे तेज नहीं होते. होते हैं लेकिन निजी स्कूलों में शिक्षा ज्यादा अच्छी तरीके से दी जाती है और यही कारण है कि लोग अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाना चाहते हैं ताकि उनका भविष्य उज्जवल हो चाहे बच्चों के अभिभावकों को इसके लिए एक समय भूखा रहना पड़े.


सबसे बड़ी बात यह है कि बच्चों की शिक्षा को लेकर खासकर 8वीं तक के बच्चों का समाज भी ध्यान नहीं देता. चलिए हम आपसे ही पूछते हैं क्या आप कभी भी अपने आस-पास के स्कूलों की जानकारी ली है? क्या आपने कभी जानने की कोशिश की है कि स्कूल में पढ़ाई होती है या नहीं?


स्कूल में शिक्षक सही समय पर आते हैं कि नहीं? स्कूल में बच्चों को किस तरह से शिक्षा दी जा रही है? क्या कभी आप स्कूल में आयोजित होनेवाले बाल सभा का हिस्सा बनें? शायद इन सबका जवाब आपके पास नहीं में होगा.


दरअसल, यही कमीं है हम में. आपके क्षेत्र में यदि कहीं आरकेस्ट्रा आदि का आयोजन किया जाता है तो आप वहां पहुंच जाते हैं. उसके बाद बार-बालाओं पर 1000-1000 के नोट उड़ाने में अपनी बहादुरी और अपने आपको धनवान बताने की कोशिश करते हैं.


क्या आपने सोचा है कि यदि उन्हीं नोटों को किसी गरीब बच्चे की पढ़ाई पर उड़ाया जाए तो उसका क्या फल मिलेगा? शायद नहीं! आप उन नोटों को गरीब बच्चों की शिक्षा पर उड़ाकर देखिया ऐसा फल मिलेगा जिसकी आपने कभी कल्पना भी नहीं की होगी.


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बच्चों के प्रति अपराध:-

यूं तो बच्चों के प्रति किसी भी प्रकार के अपराध का होना एक चिंता का विषय है किन्तु बच्चों के यौन शोषण सम्बन्धी अपराधों का बढ़ना विशेष चिंता का विषय है. बच्चों का यौन शोषण केवल अपराध ही नहीं उनके प्रति क्रूरता भी है.


नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो के द्वारा संकलित किये गए आंकड़ों से प्रकाश में आता है कि वर्ष 2013 की तुलना में वर्ष 2014 में बच्चों के प्रति विभिन्न प्रकार के अपराधों में लगभग 50 प्रतिशत की बृद्धि हुयी है.


वर्ष 2013 में जहां रिपोर्टेड अपराधों की संख्या 58224 रही थी वही 2014 में यह संख्या बढ़ कर 89423 हो गयी है.


संकलित आंकड़ों के अनुसार इनमें से यौन शोषण (Rape and sexual assault) के मामलों की संख्या मामलों की कुल संख्या का लगभग 21.41 प्रतिशत दोनों वर्षों में रही है.


यौन अपराधों के बढ़ने की दर 2012 की अपेक्षा 2013 में लगभग 45 % और 2013 की अपेक्षा 2014 में लगभग 55 % रही है.


हम सभी जानते हैं कि अनेक कारणों से अपराधों के सभी मामले रिपोर्ट नहीं हो पाते हैं. वास्तविक आंकड़े इनसे कहीं अधिक होंगे.


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बाल मजदूरी के नीचे दबा बचपन:-

बचपन...!, इंसान की जिंदगी का सबसे हसीन पल, न किसी बात की चिंता और न ही कोई जिम्मेदारी। बस हर समय अपनी मस्तियों में खोए रहना, खेलना-कूदना और पढ़ना लेकिन सभी का बचपन ऐसा हो यह जरूरी नहीं. बाल मजदूरी की समस्या से आप अच्छी तरह वाकिफ होंगे.


कोई भी ऐसा बच्चा जिसकी उम्र 14 वर्ष से कम हो और वह जीविका के लिए काम करे बाल मजदूर कहलाता है. गरीबी, लाचारी और माता-पिता की प्रताड़ना के चलते ये बच्चे बाल मजदूरी के इस दलदल में धंसते चले जाते हैं.


आज दुनिया भर में 215 मिलियन ऐसे बच्चे हैं जिनकी उम्र 14 वर्ष से कम है और इन बच्चों का समय स्कूल में कॉपी-किताबों और दोस्तों के बीच नहीं बल्कि होटलों, घरों, उद्योगों में बर्तनों, झाड़ू-पोंछे और औजारों के बीच बीतता है.  


बड़े शहरों के साथ-साथ आपको छोटे शहरों में भी हर गली नुक्कड़ पर कई राजू-मुन्नी-छोटू-चवन्नी मिल जाएंगे जो हालातों के चलते बाल मजदूरी की गिरफ्त में आ चुके हैं. और यह बात सिर्फ बाल मजदूरी तक ही सीमि‍त नहीं है इसके साथ ही बच्चों को कई घिनौने कुकृत्यों का भी सामना करना पड़ता है.


जिनका बच्चों के मासूम मन पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ता है. आज सरकार ने आठवीं तक की शिक्षा को अनिवार्य और निशुल्क कर दिया है, लेकिन लोगों की गरीबी और बेबसी के आगे यह योजना भी निष्फल साबित होती दिखाई दे रही है.


बच्चों के माता-पिता सिर्फ इस वजह से उन्हें स्कूल नहीं भेजते क्योंकि उनके स्कूल जाने से परिवार की आमदनी कम हो जाएगी. माना जा रहा है कि आज भारत में 60 मिलियन बच्चे बाल मजदूरी के शिकार हैं.


आंकड़ों की यह भयावहता हमारे भविष्य का कलंक बन सकती है. भारत में बाल मजदूरों की इतनी अधिक संख्या होने का मुख्य कारण सिर्फ और सिर्फ गरीबी है.


यहां एक तरफ तो ऐसे बच्चों का समूह है बड़े-बड़े मंहगे होटलों में 56 भोग का आनंद उठाता है और दूसरी तरफ ऐसे बच्चों का समूह है जो गरीब हैं, अनाथ हैं, जिन्हें पेटभर खाना भी नसीब नहीं होता.


दूसरों की जूठनों के सहारे वे अपना जीवनयापन करते हैं. जब यही बच्चे दो वक्त की रोटी कमाना चाहते हैं तब इन्हें बाल मजदूर का हवाला देकर कई जगह काम ही नहीं दिया जाता.


आखिर ये बच्चे क्या करें, कहां जाएं ताकि इनकी समस्या का समाधान हो सके. सरकार ने बाल मजदूरी के खिलाफ कानून तो बना दिए। इसे एक अपराध भी घोषि‍त कर दिया लेकिन क्या इन बच्चों की कभी गंभीरता से सुध ली?   


बाल मजदूरी को जड़ से खत्म करने के लिए जरूरी है गरीबी को खत्म करना। इन बच्चों के लिए दो वक्त का खाना मुहैया कराना. इसके लिए सरकार को कुछ ठोस कदम उठाने होंगे.


सिर्फ सरकार ही नहीं आम जनता की भी इसमें सहभागिता जरूरी है. हर एक व्यक्ति जो आर्थिक रूप से सक्षम हो अगर ऐसे एक बच्चे की भी जिम्मेदारी लेने लगे तो सारा परिदृश्य ही बदल जाएगा.


अब कई सवाल उठते हैं क्या आपको नहीं लगता कि कोमल बचपन को इस तरह गर्त में जाने से आप रोक सकते हैं? देश के सुरक्षित भविष्य के लिए वक्त आ गया है कि आपको यह जिम्मेदारी अब लेनी ही होगी। क्या आप लेंगे ऐसे किसी एक मासूम की की जिम्मेदारी? 


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अनाथ बच्चों का बुरा हाल:-

स्ट्रीट चिल्ड्रेन...! एक ऐसा शब्द है, जो शहर की सड़कों पर रहने वाले बच्चों के लिए प्रयोग होता है. वेपरिवार की देखभाल और संरक्षण से वंचित होते हैं.


सड़कों पर रहने वाले ज्यादातर बच्चे 5 से 17 वर्ष के हैं और अलग-अलग शहरों में उनकी जनसंख्या भिन्न है. स्ट्रीट चिल्ड्रेन निर्जन भवनों, गत्तों के बक्सों, पार्कों अथवा सड़कों पर रहते हैं.


स्ट्रीट चिल्ड्रेन को परिभाषित करने के लिए काफी कुछ लिखा जा चुका है, पर बड़ी कठिनाई यह है कि उनका कोई ठीक-ठीक वर्ग नहीं है, बल्कि उनमें से कुछ जहां थोड़े समय सड़कों पर बिताते हैं और बुरे चरित्र वाले वयस्कों के साथ सोते हैं. वहीं कुछ ऐसे हैं, जो सारा समय सड़कों पर ही बिताते हैं और उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं होता.


यूनिसेफ द्वारा दी गई परिभाषा व्यापक रूप से मान्य है, जिसके तहत स्ट्रीट चिल्ड्रेन को दो मुख्य वर्गों में बांटा गया है. पहला सड़कों पर रहने वाले बच्चे भीख मांगने से लेकर बिक्री करने जैसे कुछ आर्थिक क्रियाकलापों में लिप्त रहते हैं.


उनमें से ज्यादातर शाम को घर जाकर अपनी आमदनी को अपने परिवारों में दे देते हैं. वे स्कूल जा सकते हैं तथा उनमें परिवार से जुड़े रहने की भी भावना हो सकती है.


परिवार की आर्थिक बदहाली के कारण ये बच्चे आखिरकार स्थाई तौर पर सड़कों पर की ही जिंदगी चुन लेते हैं और दूसरा सड़कों पर रहने वाले बच्चे वास्तव में सड़कों पर (या आम पारिवारिक माहौल से बाहर) ही रहते हैं.


उनके बीच पारिवारिक बंधन मौजूद हो सकता है, पर यह काफी हल्का होता है, जो आकस्मिकतौर पर या कभी-कभी ही कायम होता है.


अपने देश भारत का इस मामले में भी बुरा हाल है. एक अरब से ज्यादा आबादी वाला भारत सबसे बड़ा लोकतंत्र है जिसमें बच्चों की आबादी 40 करोड़ के करीब है. स्ट्रीट चिल्ड्रेन ऐसे बच्चे होते हैं जिनका अपने परिवारों से ज्यादा वास्तविक घर सड़क होता है.


यह ऐसी स्थिति है, जिसमें उन्हें कोई सुरक्षा, निगरानी या जिम्मेदार वयस्कों से कोई दिशा-निर्देश नहीं मिलती. मानवाधिकार संगठन के अनुमान के मुताबिक भारत में करीब 1 करोड़ 80 बच्चे सड़कों पर रहते या काम करते हैं. इनमें से ज्यादातर बच्चे अपराधों, यौनवृत्तियों, सामूहिक हिंसा तथा नशीले पदार्थों के शिकार हैं.


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कुपोषण से प्रत्येक वर्ण मर जाते हैं 10 लाख बच्चे!

भारत में 5 साल से कम उम्र के करीब 10 लाख बच्चे हर साल कुपोषण के कारण मर जाते हैं. इतना ही नहीं कुपोषण के मामले में भारत दक्षिण एशिया का अग्रणी देश बन गया है.


जहां कुपोषण के मामले सबसे अधिक पाए जाते हैं. राजस्थान के बारन और मध्य प्रदेश के बुरहानपुर में एक नई स्टडी से पता चला है कि देश के गरीब इलाकों में बच्चे ऐसी मौत का शिकार होते हैं जिसको रोका जा सकता है.


यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में कुपोषण के कारण 5 साल से कम उम्र के करीब 10 लाख बच्चों की हर साल मौत हो जाती है.


राजस्थान के बारे में रिपोर्ट में कहा गया है कि एनएफएचएस-3 के अनुसार, 5 साल से कम आयु के 20 फीसदी बच्चे की मौत हो गई (एनएफएचएस-2 से 11.7 फीसदी ज्यादा).


24 फीसदी बच्चों की ग्रोथ रुकी हुई है जबकि एनएफएचएस-2 में यह 52 फीसदी थी। 44 फीसदी बच्चों को अंडरवेट पाया गया जो एनएफएचएस-2 के अनुसार 50.6 फीसदी था.


एनएफएचएस-3 डेटा में यह भी दिखाया गया है कि राजस्थान में अनुसूचित जनजाति के पांच साल से कम आयु के बच्चे गंभीर कुपोषण समस्या के शिकार हैं.


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