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दूसरी ईस्ट इण्डिया कंपनी न बन जाए चाइना बाजार!

 Abhishek Tripathi |  2016-10-04 05:37:43.0

china_marketशबाहत हुसैन विजेता


लखनऊ. सर्जिकल स्ट्राइक के बाद देश के भीतर से यह स्वर तेज़ हुआ है कि भारत को सख्ती करनी चाहिए. पाकिस्तान को मजबूर करना चाहिए कि वह हमारे देश में आतंक का खेल खेलना बंद करे. पाकिस्तान के साथ-साथ भारत को दूसरा सबसे बड़ा खतरा चीन से है.


चीन भारत के साथ लागातार दोहरी पालिसी अपनाता रहता है. एक तरफ वह भारत में चाइना बाज़ार का विस्तार करता जा रहा है तो दूसरी तरफ वह अरुणाचल में हस्तक्षेप भी करता जा रहा है. बार-बार की उसकी घुसपैठ रुकने का नाम नहीं ले रही है. हद तो यह है कि जिस दिन भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चाइना के राष्ट्राध्यक्ष के साथ मीटिंग चल रही थी उस दिन भी चाइना की फौजें भारत में चहलक़दमी कर रही थीं.


भारत के सामने पाकिस्तान और चीन की तरफ से जो मुश्किलें खड़ी की जा रही हैं वह एक जैसी नहीं हैं. पाकिस्तान को राह पर लाने के लिए सेना की ज़रुरत है. सेना की सख्ती से पाकिस्तान के हौसले पस्त होंगे तो चीन के मामले में भारत के नागरिकों को अपनी जेब से ज्यादा अपने देश का ध्यान करना होगा. भारत के लोग जिस दिन चीन का सस्ता माल खरीदना बंद कर देंगे उसी दिन चीन की कमर टूटने लगेगी. चीन हमारे ही पैसे का इस्तेमाल हमारे खिलाफ कर रहा है.


एक मित्र ने अपने फेसबुक स्टेटस पर लिखा कि चीन के मोबाइल पर चीन का माल न खरीदने का ज्ञान बाँट रहे हैं लोग. पढ़ने में यह बात बहुत अच्छी लग सकती है और यह लाइन ढेर सारे लाइक भी बटोर सकती है लेकिन हकीकत का आइना कुछ और बयान करता है.


चीन का मोबाइल इस्तेमाल करना दूसरी बात है और चीन की दूसरी सस्ती चीज़ें खरीदना दूसरी बात है. दरअसल चाइना इलेक्ट्रोनिक्स के क्षेत्र में काफी तरक्की कर चुका है. दुनिया की ज़्यादातर बड़ी इलेक्ट्रानिक्स कम्पनियों के टीवी, लैपटाप और मोबाइल को चाइना ही असेम्बिल करता है. हम कितना भी अच्छा मोबाइल खरीद लें लेकिन उसे खोलकर देखें तो अधिकाँश मोबाइल यही बताएँगे कि वह चाइना से आपके हाथ तक पहुंचे हैं. मोबाइल, लैपटाप और टेलिविज़न के मामले में चीन को सिर्फ असेम्बिल करने का ही पैसा मिलता है जो उस मजदूर के खाते में चला जाता है जो उसे असेम्बिल करता है.


चीन के जिस माल के बहिष्कार की बात की जा रही है वह उस माल की बात है जो हमारे बाज़ार को प्रभावित कर रहा है. सोचने और समझने की बात यह है कि आखिर चीन होली का रंग और दीवाली के पटाखे से लेकर लक्ष्नी-गणेश की मूर्तियाँ तक कैसे बेचने लग गया. भारत के लोग चीन के लक्ष्मी-गणेश सिर्फ इसलिए खरीद रहे हैं क्योंकि वह भारत के बने लक्ष्मी-गणेश से ज्यादा अच्छे और भारत से कम कीमत पर मिल रहे हैं. खरीदने वालों का नजरिया यह है कि जब हमें अच्छा माल सस्ता भी मिलेगा तो हम उसे क्यों न खरीदें.


डेढ़ दशक पीछे जाएँ. भारत में चाइना बाज़ार खुल रहे थे. चाइना बाज़ार में हर माल 70 रुपये में मिल रहा था. एक से बढ़कर एक खिलौने, बर्तन, चटाई, कुर्सी, मेज़ चाहे जो भी लिया जाए सब 70 रूपये का था. इतनी कम कीमत देख लोग चाइना बाज़ार पर टूट पड़े थे. फिर जैसे-जैसे लोगों की आदत पड़ती गई चीन अपने सामान का दाम बढ़ाता गया. यह बिलकुल उसी तर्ज़ पर हुआ जैसे कि अंग्रेजों ने भारत को चाय पीना सिखाया था.


भारत के बाज़ार आज चाइना के माल से पटे पड़े हैं. बल्ब, झालर, पंखे, सस्ते मोबाइल सेट, कुछ खाने-पीने की चीज़ें और लक्ष्मी गणेश. इन सामानों की वजह से भारत का हज़ारों करोड़ रुपया चीन जा रहा है. दुकानदार अच्छा हो तो उसका बिजनस बढ़ाने में दिक्क़त नहीं है लेकिन अगर उसकी नीयत खराब हो और वह अपना माल बेचते-बेचते यहाँ दूसरी ईस्ट इण्डिया कंपनी खोलने जा रहा हो तो हमें सोते से जाग जाना चाहिए.


हमारे ही पैसे से जब हम पर वार होने लगेगा तो यही सस्ता माल हमें महंगा लगने लगेगा. हम अपने देश का बना महंगा सामान यह सोचकर खरीदें की हम ज्यादा पैसे देकर अपने लिए सुरक्षा खरीद रहे हैं. हम सुरक्षित ही नहीं रहेंगे तो बचाए पैसे का क्या करेंगे.

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