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भगवान जगन्‍नाथ निकले रथ पर, जानिए कैसे शुरू हुई काशी में यह परम्परा

 Anurag Tiwari |  2016-07-06 11:33:49.0

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वाराणसी. बुधवार की सुबह काशी के लख्खा मेलें में शुमार तीन दिवसीय रथयात्रा मेले का शुभारम्भ हो गया  है। रथ पर बैठे जगन्नाथ प्रभु भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ नगर भ्रमण को निकले।

वाराणसी में रथयात्रा लगभग 235 साल पुरानी परम्परा है। ओडिशा के पुरी के बाद काशी की धर्म नगरी में साल 1700 में शुरू यह रथयात्रा का विशेष महत्व माना जाता हैं और इसे मिनी पुरी रथयात्रा मेला भी कहा जाता । इस बार वाराणसी के इस रथयात्रा में ख़ास बात ये हैं की सवा दो सौ साल बाद भगवान जगन्नाथ सुभद्रा व बलराम के विग्रह के दर्शन नए विग्रह में परिवर्तन किया गया है, क्योंकि 235 साल बाद भगवान जगन्नाथ का रूप बदलने गया है। जो मूर्ति स्थापित की गई है उसमें भी परिवर्तन किया गया है।


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सुबह  5 बजे से ही वाराणसी की जनता काफी संख्या में भगवान जगन्नाथ के दर्शन को उमड़ पड़ी। मंगला आरती के साथ घंटा घड़ियालों के धुन में डमरुओं के थाप पर जय जगन्नाथ से पूरा माहौल गुंजायमान हो गया, जिसमे सभी भक्त रमे नजर आए। कोई आरती करता तो कोई हाथ जोड़े अपनी फ़रियाद लिए खड़ा नज़र आ रहा था।

कैसे शुरू हुई काशी में जगन्नाथ यात्रा

धर्म नगरी का रथयात्रा मेला सवा 235 शुरू हुई थी। बात उस वक्त की है जब काशी नगरी में गुजरात के जगन्नाथ मंदिर से स्वामी तेजोनिधि काशी पधारे और उन्होंने गंगा किनारे तपस्या की। तेजोनिधि रागभोग किया करते थे, इसी दरम्यान एक रात स्वामी को भगवान जगन्नाथ सपने में साक्षात भगवान जगन्नाथ ने दर्शन दिया और कहा कि उनकी पूजा महादेव की नगरी में भी होनी चाहिए। तभी से स्वामी तेजोनिधि ने ही पुरी की तर्ज पर महादेव के नगरी में रथयात्रा मेले की शुरुआत की थी।

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