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DU और JNU के नतीजो के फर्क के निहितार्थ

 Tahlka News |  2016-09-11 11:07:04.0

du vs jnu
उत्कर्ष सिन्हा

दोनों ही विश्वविद्यालय दिल्ली में हैं , दोनों की ही अपनी प्रतिष्ठा है, दोनों के छात्र संघ चुनावो के नतीजों पर पूरे देश की निगाह रहती है. मगर नतीजे हमेशा दोनों के फर्क होते हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय में जहाँ मध्यमार्गी राजनितिक दलों के छात्र संगठन आमने सामने रहते हैं और मुकाबला NSUI Vs AVBP होता है वही JNU की सियासत में वामपंथी संगठनो का पलड़ा हमेशा भारी होता है.

आखिर देश के दिल में बसे इन दोनों विश्वविद्यालयों के युवाओं के बीच ये वैचारिक अंतर क्यूँ ? एक ही शहर के दो किनारों पर बसे इन संस्थानों के अन्दर वो क्या है जो युवा राजनीती को दो विपरीत ध्रुवो पर खड़ा रहता है. इस बात को समझना जरूरी है और जब अन्दर की तह को उधारेंगे तब पता चलेगा कि भारत के समाज शास्त्र का इन नतीजो में कितना दखल है.


DU और JNU दोनों में छात्रो का एक बड़ा हिस्सा देश के दूसरे हिस्सों से आता है. ये छात्र इन कैम्पसो को कास्मोपोलिटन स्वरुप भी देते हैं मगर दोनों के अन्दर आने वाले युवाओं की सामाजिक पृष्ठभूमि में बहुत बड़ा बुनियादी फर्क होता है.

दिल्ली यूनिवर्सिटी के एडमिशन की कटआफ सूची में आने के लिए आपको स्कूल में बेहतर प्रदर्शन करना होता है. सरकारी प्राईमरी स्कूल में राज्यों के बोर्ड से पढ़े बच्चो के लिए ये कैम्पस एक सपना सरीखा है जिसके भीतर की दुनिया में दाखिल होने के लिए उन्हें एक ऐसे आधार की जरुरत होती है जो सामान्यतया उनके बस की बात नहीं होती. अपवाद हर जगह होते हैं मगर बात तो बहुमत की ही होती है.

इसके विपरीत JNU की प्रवेश प्रक्रिया अलग है वहां आदिवासी, दलित, अल्पसंख्यक के साथ साथ सुदूर इलाको से आने वाले मेधावी बच्चो के लिए रास्ते खोले गए हैं. इस विश्वविद्यालय की दाखिले की प्रक्रिया ही ऐसी बनायीं गयी जिसके भीतर वर्गीय संरचना में कमजोर माने जाने वाले बच्चो को शिक्षा के उच्चतम स्तर तक ले जाया जा सके.

इस फर्क को आप इन कैम्पसो के नजदीक पहुचते ही बखूबी महसूस कर सकते हैं. DU के कैम्पस में बिखरे हुए इन्द्रधनुषी रंग JNU के आते ही अपना कलेवर बदल लेते हैं. DU के कैंटीन और वहां की फिजाओं में बिखरे माईक्रोसाफ्ट और कोकाकोला की जगह JNU का गंगा ढाबा ले लेता है जहाँ अफ्रीका की सियासत में अमेरिकी दखल या फिर उड़ीसा के नियमगिरि के विस्थापितों की बाते कटिंग चाय की चुक्सियों के साथ आपका स्वागत करती हैं.

ये दोनों ही खुशबुएँ यहाँ पढने वाले बच्चे अपने साथ ले कर आते हैं. 95 प्रतिशत की मेरिट के लिए खुद को सिर्फ किताबो में झोंक चुके और सिविल सर्विस से ले कर बड़े कार्पोरेट में एक अदद बेहतर नौकरी की तलाश में DU का छात्र जिस दुनिया में खुद को पाता है उसमे वह सुदूर भारत को अखबारों और किताबो के जरिये देखता है जबकि JNU का छात्र अपने साथ आदिवासी, दलित या फिर किसी दूर दराज के जिलो में चल रहे अपने समाज के संघर्ष को व्यापकता में समझने के लिए किताबो का सहारा लेता है. अखबारों में छपे समय समाचार उसे बहुत उत्तेजित नहीं करते बल्कि समाज की वास्तविकता से दूर दिखाई देते हैं.

कश्मीर  और उत्तर पूर्व के संघर्षो की बहस DU में बस उस हद तक ही जाती है जितनी प्रतियोगी परीक्षा में इस विषय को बेहतर लिखने की जरुरत है मगर यही बहस जब JNU में पहुचती है तो आवाम की पक्षधरता की हद तक परवान चढ़ जाती है.

DU में कमोबेश उच्च मध्यमवर्गीय कैसमोपोलिटन इंडिया की बजाय JNU में जो कैस्मोपोलिटन भारत बनता है उसकी बेचैनी बिलकुल दूसरी तरह की होती है जो उस सामाजिक जकडन को एक झटका दे कर तोड़ देने की जद्दोजहद करती है जो वह अपने अनुभवों के साथ ले कर आया होता है.

दोनों के संगीत का एक फर्क है और वही फर्क इन नतीजो में भी दिखता है . DU कन्टेम्पेरेरी म्यूजिक पर झूमता है और JNU पारंपरिक ढपली की थाप पर और जब यही संगीत राजनीती में तब्दील होता है तब सुरों का अलगाव साफ़ दिखाई देने लगता है.

IAS अफसर अनुराग यादव की पढ़ाई JNU में हुयी है और उनके काम में भी वो तरबियत साफ़ झलकती है. बीते शनिवार को जब JNU छात्र संघ के नतीजे आये तो अनुराग की ये टिप्पणी भी आई जो इस फर्क को समझने के लिए मौजू है.

अनुराग लिखते हैं- जनकवि 'पाश' के जन्मदिन ही जेएनयू में इलेक्शन महज इतिफ़ाक ही सही पर उम्मीद है जेएनयू के छात्र इस दिन को यादगार रखेंगे..जो ये जानना चाहते हों की जेएनयू ने कैसे वोटिंग की होगी? उन्हें ये समझने के लिए पाश को पढना पड़ेगा.

भारत --
मेरे सम्मान का सबसे महान शब्द
जहाँ कहीं भी प्रयोग किया जाए
बाक़ी सभी शब्द अर्थहीन हो जाते है
इस शब्द के अर्थ
खेतों के उन बेटों में है
जो आज भी वृक्षों की परछाइओं से
वक़्त मापते है
उनके पास, सिवाय पेट के, कोई समस्या नहीं
और वह भूख लगने पर
अपने अंग भी चबा सकते है
उनके लिए ज़िन्दगी एक परम्परा है
और मौत के अर्थ है मुक्ति
जब भी कोई समूचे भारत की
'राष्ट्रीय एकता' की बात करता है
तो मेरा दिल चाहता है --
उसकी टोपी हवा में उछाल दूँ
उसे बताऊँ
के भारत के अर्थ
किसी दुष्यन्त से सम्बन्धित नहीं
वरन खेत में दायर है
जहाँ अन्न उगता है
जहाँ सेंध लगती है

बस यही DU और JNU के छात्र राजनीती का सीधा सा फर्क है.

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