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मिलावट के खेल में सारे नियम फेल

 Avinash |  2017-03-07 15:39:36.0

मिलावट के खेल में सारे नियम फेल

डा. सीमा जावेद (स्वतंत्र पत्रकार एवं पर्यावरणविद)

मिलावट के खेल में अब तक देश में सारे नियम कानून फेल होते आये हैं. चाहे वह होली पे बिकने वाला केमिकल गुलाल हो या फिर चटक रंग से लैस ताज़ी दिखने वाली सब्जी या फिर आकर्षक कृत्रिम रंगों से सजे भोज्य पदार्थ. कागज़ पर लिखी इबारत में भले ही सब्जी रंगने की मनाही हो या फिर पकवानों में केवल खाने के योग्य सुरक्षित रंगों के इस्तेमाल की बात हो पर केमिकल रंगों की बिक्री और इनके इस्तेमाल पर हमारी सरकारें लगाम कसने में नाकामयाब रही हैं. जब कृत्रिम तरीके से किसी भी खाद्य पदार्थ का उत्पादन किया जाता है तो उसमें कृत्रिम रंगों का इस्तेयमाल जरूरी हो जाता है। साथ ही उत्पाकदों को खराब होने से बचाने के लिए भी इन रंगों का प्रयोग किया जाता है। इससे खाद्य पदार्थों का प्राकृतिक स्वूरूप बिगड़ जाता है बदलते समय के साथ-साथ बाजार में प्रोसेस्ड फूड आने लगे हैं जिनमें फूड कलर का इस्तेमाल किया जाने लगा है, जिससे वह फ्रेश और अट्रैक्टिव दिखें, कई बार इनके रंगों की तरफ आकर्षित होकर ही हम इन्हें खाने के लिए मचल उठते हैं। दूध में पानी मिलाने की बात अब काफी पुरानी हो चुकी है।

गर्मी पड़ते ही भिन्डी परवल शिमला मिर्च में चटकीला हरा रंग, बैगन को चमकदार बनाने के लिए लागाई गयी ग्रीस, टमाटर, मटर पलक आदि को रंगने का काम सब्जी मंडियों में ही नहीं बल्कि सब्जी कि दुकानों पर भी शुरू हो जाता है. इतना ही नहीं मिर्च पाउडर में ईंट या बालू का चूर्ण ए मावा में स्टार्च की मिलावट ए हल्दी में रंग मिलाए चांदी के वर्क में एल्युमिनियम, शहद में पानी या चीनी, चाय पत्ती में रंग, अरहर की दाल में खेसरी दाल मेटानिल पीला रंग, काली मिर्च में पपीते के बीज, हींग की मात्रा बढ़ाने के लिए उस में अरारोट, आटे में मिलावट कर के उसे फालतू सफेदी देना आदि आम बातें हैं अब नमक में भी मिलावट मिलने लगी है. फल और सब्जी में चटक रंग के लिए रासायनिक इंजेक्शन, ताजा दिखने के लिए लेड और कॉपर सोल्युशन का छिड़काव, सफेदी के लिए फूलगोभी पर सिल्वर नाइट्रेट का प्रयोग किया जा रहा है। मिठाइयों में ऐसे रंगों का प्रयोग हो रहा है, जिससे कैंसर का खतरा रहता है और डीएनए में विकृति आ सकती है ।

मैगी में मिलावट का मामला तो एक छोटा-सा नमूना भर है. भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (र्ऐंएसएसएआई) ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि देश में 68.4 फ़ीसद दूध मिलावटी बिकता है. ग्रामीण क्षेत्रों में यह 31 फ़ीसद है. सरसों के तेल और दूसरे खाद्य तेलों में अर्जीमोन मेक्सिकाना का बीज मिलाया जाता है, जिससे लोग ड्रॉप्सी के शिकार हो जाते हैं. अर्जीमोन की मिलावट से सिर में दर्द, डायरिया, त्वचा पर धब्बे होने, बेहोशी, ग्लूकोमा और सांस लेने में तकलीफ की शिकायत होती है. ड्रॉप्सी 1977 और 1999 में महामारी के रूप में सामने आई थी.

सीएसई की निदेशक सुनीता नारायण के अनुसार, पेप्सी के सभी ब्राण्डों में औसतन प्रति लीटर द्रव्य में 0.0180 मिलीग्राम व कोका कोला में 0.0150 मिलीग्राम कीटनाशकों की मात्रा मिली थी जबकि ईसीई द्वारा प्रति लीटर द्रव्य में 0.005 मिलीग्राम कीटनाशकों की मात्रा स्वीकृत है। मिलावटी खाद्य पदार्थों के मामले में दूध की हालत भी कोल्ड ड्रिंक्स जैसी ही हो गई है लखनऊ की जन विश्लेषण प्रयोगशाला में पिछले दिनों दूध के करीब एक हजार नमूनों की जांच की गई। इनमें से 211 में मिलावट पाई गई। आठ नमूनों में सोडा और शैंपू मिलाया गया था। दो नमूनों में पोस्टर कलर मिला। महानगरों में भी दूध में मिलावट की घटनाएं आए दिन सामने आती रहती हैं। कंज्यूमर गाइडेंस सोसायटी ऑफ इंडिया ने एक बार कहा था कि मुंबई में बिक रहे खाद्य तेलों में 64 फ़ीसद मिलावट है. इसी तरह 2013 में बड़ौदा में 40 नमूनों का अध्ययन किया गया, जिनमें दाल, अनाज, सब्जी, कंद, जड़ों में आर्सेनिक की मात्रा मानकों से कहीं ज़्यादा थी. इसके अलावा अनाज और दही में कैडमियम की मात्रा भी सामान्य स्तर से ज़्यादा थी. आर्सेनिक स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर डालता है. वहीं कैडमियम से दमा से लेकर कैंसर आदि होने का खतरा रहता है. 2013 में बरेली, देहरादून और इज्जत नगर में अंडों की जांच में पाया गया कि पांच फ़ीसद अंडों में सालमोनेला बैक्टीरिया है. इसी तरह 2011 में कोट्टयम में वाणिज्यिक रूप से इस्तेमाल होने वाली 1.33 फ़ीसद एवं दो फ़ीसद पालतू मुर्गियों और 51.33 फ़ीसद बत्तखों के अंडों में सालमोनेला बैक्टीरिया पाया गया. बत्तख के अंडे कोट्टयम में लोकप्रिय हैं. सबसे अहम अध्ययन सामने आया कि 72,200 नमूनों में से 18 फ़ीसद यानी 13,571 मामले ही फूड सेफ्टी अथॉरिटी के मानकों पर खरे उतर सके, जिनका परीक्षण 2012-13 में किया गया था. वहीं मिलावट के 10,235 मामलों में से केवल 3,845 मामलों में ही दोषियों के खिलाफ आरोप तय हो सके. दिसंबर, 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने मिलावटी दूध तैयार करने और उसे बेचने वालों को उम्रकैद की सजा देने की हिमायत करते हुए राज्य सरकारों से कहा था कि इस संबंध में क़ानून में उचित संशोधन किया जाए.


केंद्रीय खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्री राम विलास पासवान कहते हैं कि सरकार मिलावट के खिलाफ क़ानून और ज़्यादा अधिक ठोस बनाने का प्रयास करेगी. मगर ऐसा कब तक होगा और नया क़ानून लागू करने लायक कोई मशीनरी भी तैयार की जाएगी अथवा नहीं, यह देखना अधिक महत्वपूर्ण होगा. चूंकि स्वास्थ्य एक राज्य सूची का विषय है, ऐसे में क़ानून लागू करने का उत्तरदायित्व राज्य फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन का है. कई मंत्रालयों को राज्य सरकारों से तालमेल की ज़रूरत पड़ेगी, लेकिन चिंता की बात यह है कि फूड सेफ्टी को लेकर राज्यों में पर्याप्त सुविधाएं भी नहीं हैं, जिसका असर भी रोकथाम पर पड़ता है. इसके लिए संबंधित महकमों में खाली पद शीघ्र भरने होंगे, उपभोक्ता अदालतों का विस्तार करना होगा, मिलावट के घिनौने खेल में लगे लोगों के लिए कड़ी सजा का प्रावधान करना होगा.

फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड एक्ट
अभी मिलावट के मामलों में फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड एक्ट के तहत कार्रवाई होती है. इस क़ानून के तहत दोषी को अधिकतम छह माह की कैद और 1,000 रुपये का जुर्माना हो सकता है। अगर किसी चीज के खाने से किसी की मृत्यु हो जाती है, तो कम से कम तीन साल की कैद से लेकर उम्रकैद तक की सजा भी हो सकती है। साथ ही 5,000 रुपये या उससे ज्यादा जुर्माना भी हो सकता है। सन्‌ 1954 में खाद्य-अपद्रव्यीकरण-निवारक अधिनियम (प्रिवेंशन ऑव फ़ूड ऐडल्टरेशन ऐक्ट) समस्त देश में लागू किया और सन्‌ 1955 में इसके अंतर्गत आवश्यक नियम बनाकर जारी किए। 1986 में केंद्र सरकार ने प्रीवेंशन आफ फूड एडल्टरेशन क़ानून में संशोधन किया था, जिसके तहत सभी नागरिकों को यह अधिकार मिला कि वे खुद भी उत्पादों की जांच कर सकते हैं, खाद्य पदार्थों में मिलावट रोकने के लिए फूड एंड ड्रग कमीशन है. शहरों में म्यूनिसिपल अधिकारी इसे लागू कराते हैं और ग्रामीण इलाकों में यह काम राज्य सरकार द्वारा नियुक्त फूड इंस्पेक्टर करते हैं. फूड इन्सपैक्टर का काम होता है कि वह सभी दुकानों और खाने के सामान आदि की दुकानों में जाए और वहॉं बिकने वाली खाने की चीज़ों की गुणवत्ता की जांच करे। अगर फूड इन्सपैक्टर को किसी चीज़ को लेकर शक हो तो वह गवाहों के सामने उस चीज़ के नमूने ले सकता है। तीन नमूने लिए जाते हैं और उन्हें सील कर लिया जाता है। एक नमूने को जांच के लिए कोर्ट में भेज दिया जाता है। दूसरा नमूना खाने की जांच करने वाले अधिकारियों के पास रखा रहता है और तीसरा दुकानदार को संभाल कर रखने के लिए सौंप दिया जाता है। इस कानून में दोषी पाए जाने पर छ: महीनों की जेल और जुर्माना की सजा हो सकती है। परन्तु इस कानून का क्रियान्वन इतना ढीला है कि बहुत ही कम मामलों में ऐसा हो पाता है। दूसरी और यह सबसे छोटे दुकानदारों को परेशान किए जाने का एक जरिया भी बन गया है और उनमें से कई फिर घूस देकर इस तरह परेशान किए जाने से बचने का तरीका अपना लेते हैं। ऐसे में फ़ूड इंस्पेक्टर कभी होश में आकर छापे मरकर फ़ूड सैंपल टेस्ट के लिए ले जाते हैं मगर उसके बाद फिर रात गयी बात गयी वाली कहावत चरितार्थ होती है.


फूड कलर और उनके नुकसान

ब्रिलिएंट ब्लू-
आमतौर पर इस फूड कलर का प्रयोग बिस्किट, ब्रेड, पेय पदार्थों आदि में प्रयोग किया जाता है। इस रंग के अधिक सेवन से किडनी में समस्या हो सकती है।

इंडिगो कारमाइन- इस कलर का इस्तेसमाल टॉफियोंए पेट फूड्स और अन्य खाद्य पदार्थों में इस्ते्माल किया जाता है। माना जाता है कि इसके ज्यादा प्रयोग से ब्रेन ट्यूमर होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।

फास्ट ग्रीन- ये कलर ज्यादातर कॉस्मेतटिक और दवाओं में मिलाया जाता है। इससे थॉयराइड ट्यूमर होने की बात सामने आने पर अमेरिका में बैन किया जा चुका है।

मेलेकाइट ग्रीन- सब्जी को हरा रंग देने के लिए प्रयोग किए जाने वाला मेलेकाइट ग्रीन लीवर, आंत, किडनी सहित पूरे पाचन तंत्र को नुकसान पहुंचाता है। मेलेकाइट ग्रीन का अधिक सेवन पुरुषों में नपुंसकता और औरतों में बांझपन का भी कारण बन सकता है। यह कैंसर की वजह भी बन सकता है।

एरीथ्रोसिन- इसे लाल रंग की जगह प्रयोग किया जाता है। यह भी टॉफी, बिस्किट और बैक्डे फूड में मिलाया जाता है। इससे भी थॉयराइड ट्यूमर होता है।

एल्यूइरा रेड- इस कलर का सबसे ज्यादा प्रयोग अनाज, मिठाइयों, दवाओं और सौंदर्य प्रसाधन में किया जाता है। यह भी शरीर को कई तरह से हानि पहुंचाता है।

सनसेट यलो- यह ज्यादातर पेय पदार्थ, मिठाइयों, जिलेटिन, कैंडीज और यहां तक कि सॉस में इस्तेमाल किया जाता है। जो कि एड्रेनल ट्यूमर का कारण हैए साथ ही ये बच्चों में हाइपर एक्टिविटी को बढ़ाता है।

रसायनों का प्रयोग

कैल्शियम कार्बाइड- आम को समय से पहले पकाने के लिए।
ऑक्सीटॉसिन- कद्दू ए तरबूज, सीताफल, बैंगन, तोरई और खीरे के आकार को बढ़ाने के लिए।
कॉपर सल्फेट- फलों को जल्दी पकाने के लिए।
वैक्स- सेब और नाशपाती की चमक को बरकरार रखने के लिया किया जाता है।


सेकरीन- तरबूज को मीठा बनाने के लिए।
लेड क्रोमोट- इसका इस्तेमाल सामान्य तौर पर सूखी हल्दी के लिए किया जाता है।

पिछले एक दशक से लगातर मीडिया द्वारा कृत्रिम रंगों से होली खेलने के स्वस्थ पर दुष्प्रभाव के लगातार समाचार प्रकाशित होने के कारण लोगों में इस के प्रति उत्पन्न जागरूकता और हर्बल रंगों से होली खेलने के प्रचलन को मिले बढ़ावे से ऐसा लगता है कि सरकारी नियम कानून से कुछ नहीं होने वाला खाने में मिलावट के इस्तेमाल को रोकने के लिए लोगों को ही इस बारे में जागरूक बनाने और इनका उपयोग रोकना एकमात्र रास्ता बचा है.

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