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"योगी" मुख्यमंत्री के ये 30 दिन

 Utkarsh Sinha |  2017-04-19 07:24:59.0

योगी मुख्यमंत्री के ये 30 दिन

उत्कर्ष सिन्हा

"राजा को आध्यात्मिक एवं आत्मसंयमी होना चाहिए, राजा काम, क्रोध, त्याग, संयम आदि गुणों से परिपूर्ण हो" – कौटिल्य

लखनऊ. जिस वक्त ये खबर लिखी जा रही है ठीक 30 दिन पहले इसी वक्त यूपी के इतिहास में पहली बार एक साधू मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहा था. उस वक्त अलग अलग हलकों में योगी आदित्यनाथ को ले कर उत्सुकता भी थी और कहीं एक भय भी. मगर 30 दिन बीतते बीतते गोरक्ष पीठ के इस युवा महंत ने अपने हठयोग से यूपी के राजयोग को काफी हद तक तब्दील कर दिया है.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आवास 5 कालिदास मार्ग के बिस्तर अब कड़े हैं और शयनकक्षों में रात दिन चलने वाले एयर कंडीशन मशीने खामोश है. सूबे की सत्ता का सबसे सशक्त केंद्र मुख्यमंत्री सचिवालय अब अल सुबह से लेकर आधी रात तक जागता है. सचिवालय के दफ्तरों में उंघते बाबू अब सतर्क दिखाई देते हैं. पान और गुटका यहाँ कड़ाई से प्रतिबंधित है और नौकरशाही पर दबाव बहुत बढ़ा हुआ है.

महज 30 दिनों में आया ये फर्क योगी की कार्यशैली की वजह से है. वे कहते हैं- " हम यहाँ सत्ता सुख लेने नहीं आये हैं, काम करने आये हैं" और इसके साथ अफसरों को वह एक कड़ा सन्देश भी देते हैं –" जिन्हें इस तरह काम करने में मुश्किल हो वो इसे छोड कर चले जाए" . योगी के यही तेवर आरामतलब बाबुओं को बदलने पर मजबूर कर रहे हैं.

योगी शुरू से ही कड़े तेवरों वाले नेता माने जाते रहे हैं. बीते 22 सालों की उनकी राजनीति उग्र कही जाती रही है. उनके बयानों ने सुर्खिया बटोरी हैं लेकिन इन 30 दिनों में उनका काम इस कदर सुर्खियाँ बटोर रहा है कि देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ज्यादा अब योगी खबरों की दुनिया में हैं.

सत्ता सम्हालते ही योगी ने प्रशासन को सावधान की मुद्रा में खड़ा कर दिया है. ताबड़तोड़ निर्णय, कड़े फैसले और पार्टी एजेंडे को लागू करने के लिए दृढ इच्छा शक्ति ने योगी के प्रति बहुतों की धरणा बदली है. सत्ता को पहली बार नजदीक से देख रहे योगी को यह पता था कि नौकरशाही से ज्यादा खतरा किसी भी को कोई और नहीं होता इसलिए उन्होंने विभागीय समीक्षा बैठकों का दौर शुरू कर दिया. इस जरिये उन्हें खुद भी शासन की शैली और विभागों को समझने का मौका मिला. हर समीक्षा बैठकों में उन्होंने बदलाव के निर्देश भी दिए और तत्काल फैसले भी लिए.

किसानो की कर्जमाफी चुनावो के दौरान भाजपा का एक बड़ा मुद्दा रहा था. मगर नतीजे आने के बाद केंद्र सरकार ने हाँथ खड़े कर दिए. योगी के लिए अपनी साख बचाने के लिए यह पहली बड़ी चुनौती थी. पहली कैबिनेट में ही इस फैसले को करना भी था. यहाँ योगी ने अपनी इच्छा शक्ति दिखाई और रास्ता निकलने के आदेश दिए . कैबिनेट बैठक में देरी जरूर हुयी मगर वादा पूरा भी हुआ.

सुचिता के लिए योगी ने सिर्फ नौकरशाहों को ही नहीं बल्कि अपने मंत्रियों को भी सचेत किया. 15 फिन के भीतर अपनी संपत्ति की घोषण का आदेश भी इसी का हिस्सा था. शुरूआती दौर में हीलाहवाली भी हुयी मगर अंततः कड़े तेवर ने रंग दिखाया और सबने अपनी संपत्ति का ब्यौरा सरकार को दे दिया.

इन 30 दिनों में योगी ने तकरीबन 300 आदेश दिए है और तीन दर्जन से ज्यादा फैसले उनकी सरकार ने लिए हैं. शुरुआती देरी के बाद भी एक महीने में अंतत कैबिनेट की तीन बैठके हो गयी. किसानो, अल्पसंख्यको के विकास और मनचलों पर रोक के आदेशों ने योगी की साख फ़िलहाल तो बढा ही रखी है.
योगी की राजनीति कट्टर हिंदुत्व की रही है. इसलिए स्वाभाविक तौर पर उनकी छवि मुस्लिम विरोधी की भी बनायीं गयी . मगर योगी ने बतौर सीएम इस बात को सुनिश्चित किया है कि मुस्लिम अल्पसंख्यको के लिए बेहतर फैसले लिए जाएँ. मदरसों का उन्नतीकरण, मुस्लिम लड़कियों के लिए शादी में मदद आदि फैसलों ने मुस्लिम समाज में योगी के खौफ को कम करने की शुरुआत कर दी है.

मगर आलोचनाओं के बिंदु भी बाकायदा मौजूद हैं. खुद मुख्यमंत्री का सचिवालय 30 दिन बाद भी पूरा नहीं हो सका है. प्रमुख सचिव की कुर्सी अभी भी खाली है और महज 3 अधिकारियों के साथ यूपी जैसे बड़े राज्य का नियंत्रण निश्चित रूप से सुचारू नहीं हो सकता. योगी नौकरशाही को परखने में लगे हैं. पद के लिए लाबियिंग करने वाले नौकरशाहों की चल को समझ रहे हैं और ऐसे कुछ नौकरशाह झटका भी खा चुके हैं लेकिन अविश्वाश के इस दौर से यदि योगी जल्दी ही बाहर नहीं आये तो शासन प्रशासन की गति को बरक़रार नहीं रख सकेंगे.

भ्रष्टाचार के खिलाफ भी योगी की मुहीम तेज है , अखिलेश सरकार की 5 बड़ी योजनाएं जांच के दायरे में हैं, मगर यहाँ बैठे तमाम दागी अफसर अभी भी वहीँ जमे हैं. गोमती रिवर फ्रंट मामले में महज एक सहायक अभियंता निलंबित हुआ है और लखनऊ विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष को हटाने में 30 दिन लग गए. दागी अफसरों की मौजूदगी जांच को प्रभावित करेगी और फिर सवाल भी उठेंगे.

योगी के विरोधी उन पर जातिवाद के आरोप भी ढंके छुपे तौर पर लगाने लगे हैं. उनके द्वारा महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त किये जा रहे नामो में से अधिकांश राजपूत बिरादरी से हैं और खुद योगी भी इसी बिरादरी से हैं.

भाजपा की सरकार बनने में सबसे बड़ा हाँथ सपा सरकार में ख़राब कानून व्यवस्था का था. भाजपा ने भी गुंडा राज ख़त्म करने का वादा किया था, मगर 30 दिनों में यूपी की कानून व्यवस्था की जमीनी हकीकत चिंताजनक है. बलात्कार , टूट और हत्या की बड़ी वारदाते और भी बढ़ गयी है. थानों पर तैनात पुलिसवालों के मिजाज में कोई तब्दीली नहीं दिखाई दे रही और सडकों पर छिनैती भी नहीं रुकी है. यह तक की थाने के सामने ही महिला की हत्या कर दी गयी है. साथ ही इन 30 दिनों में भाजपा विधायको नेताओं के साथ साथ हिन्दू युवा वाहिनी के नाम पर गले में भगवा गमझा लपेटे अराजक तत्व पुलिस थानों में लगातार उत्पात मचा रहे हैं. सबसे बुरी बात तो यह है कि 30 दिनों में पुलिस के एक दरोगा और एक सिपाही की हत्या हो चुकी है और पुलिस पर 5 हमले हुए हैं. हालाकि योगी सरकार ने 12 बड़े अपराधियों की जेले बदल कर उनपर लगाम लगाने की पहल की है मगर जमीन पर असर आना अभी बाकी है.

कानून व्यवस्था को सुधारना योगी की बड़ी चुनौती है और आवाम की निगाह में यही उनका लिटमस टेस्ट भी. तहसीलों और थानों के हालत बदलने में यदि योगी कामयाब हो जाते हैं तो निश्चित तौर पर उनकी लोकप्रियता चौगुनी बढ़ेगी.

30 दिन किसी मुख्यमंत्री को परखने के लिए बहुत कम होते हैं, मगर उसके काम की शुरुआत उसके शैली का अंदाजा लगा देती है. पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का यह कथन योगी के लिए सूत्र बन सकता है -"नौकरशाही वह घोडा है जो अपने पीठ पर बैठे स्वर की लगाम से ही उसके कसावट का अंदाजा लगा लेता है"

जाहिर सी बात है , अगर योगी ने यह लगाम ढीली नहीं छोड़ी तो वे यूपी के सफल मुख्यमंत्रियों की सूची में होंगे और यदि लगाम ढीली पड़ी तो इतिहास के पन्नो में और भी बहुत से दर्ज नामो में से एक और.

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