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उत्तर प्रदेश में भगवा सुनामी, इन 4 कारणों से BJP के हाथ आई बाजी

 Vikas tiwari |  2017-03-11 08:53:10.0

उत्तर प्रदेश में भगवा सुनामी, इन 4 कारणों से BJP के हाथ आई बाजी

तहलका न्यूज़ ब्यूरो
लखनऊ. उत्तर प्रदेश में बीजेपी का 15 साल का वनवास खत्म हो गया है. बीजेपी ने ना सिर्फ उत्तर प्रदेश में बहुमत हासिल किया है बल्कि अपना ही रिकॉर्ड तोड़ दिया है. सभी 403 सीटों के रुझान आ चुके हैं और 303 सीटों पर बीजेपी आगे चल रही है. समाजवादी और कांग्रेस गठबंधन को 69 सीट और बीएसपी 20 सीटों पर आगे चल रही है. हम डालते हैं उन नतीजों पर नजर जिन्होंने यूपी में बीजेपी को बाजीगर साबित किया.

1. फिर चला मोदी मैजिक
यूपी में बीजेपी की जीत का सबसे बड़ा कारण मोदी मैजिक का फिर से चलना है. केंद्र में भले ही मोदी सरकार तीन साल पूरे करने के करीब हो लेकिन मोदी पर भरोसा कम होते नहीं दिख रहा है. 2014 के लोकसभा चुनाव में यूपी में मोदी मैजिक चला था और यूपी की 80 में 73 सीटों पर बीजेपी और सहयोगिया का कब्जा हो गया था. बीजेपी इसी मैजिक से सहारे यूपी के रण में थी. अब दो तिहाई से ज्यादा सीटें बीजेपी को आती दिख रही हैं. ये सीधे तौर पर मोदी मैजिक है.

2. सपा में विवादों का अखिलेश को नुकसान
सपा और कांग्रेस भले ही गठबंधन के सहारे वोटों के गणित का आंकड़ा पेश कर रहे थे लेकिन नतीजे सबके सामने है. सपा-कांग्रेस गठबंधन का हालत एकदम खराब हो गई. सत्ता से अखिलेश के दूर होने का कारण माना जा रहा है मुलायम परिवार में घमासान और फिर सपा सरकार के मंत्रियों के एक के बाद एक विवाद में आते जाना. पारिवारिक घमासान से उबरकर अखिलेश ने खुद की छवि पेश तो की लेकिन एंटी इंकमबेंसी फैक्टर का उन्हें सामना करना पड़ा. चुनाव के दौर में मंत्री गायत्री प्रजापति का रेप केस में नाम आना और फिर फरार रहने को लेकर भी अखिलेश सरकार सवालों के घेरे में आई.

3. कांग्रेस से अभी दूर नहीं हुई है नाराजगी
यूपी में बीजेपी ने फिर भारी जीत हासिल की है. जिस कांग्रेस के साथ गठबंधन कर अखिलेश फिर सत्ता में वापसी की आस लगाए बैठे थे उससे कोई लाभ नहीं मिला. 2014 के आम चुनावों में कांग्रेस के खिलाफ जनता में गुस्से का फायदा मोदी टीम को मिला. यूपी में सोनिया और राहुल गांधी को छोड़कर कोई भी कांग्रेस उम्मीदवार नहीं जीत पाया. 2012 के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस 20-22 सीटों से आगे नहीं बढ़ पाई थी. इस चुनाव में भी बीजेपी अव्वल रही. सोनिया गांधी प्रचार में नहीं उतरीं और प्रियंका गांधी ने भी बस एक सभा की. हालांकि, अखिलेश के साथ साझे रोड शो और रैलियां कर राहुल गांधी ने प्रचार को धार दी लेकिन उससे कोई फायदा नहीं मिला.

4. मायावती खेमे में 2007 जैसे सोशल इंजीनियरिंग की कमी
बीजेपी अगर यूपी में सबसे आगे दिख रही है तो मायावती फैक्टर भी इसमें बड़ा कारण है. जिस दलित वोट को लेकर मायावती की पूरी राजनीति टिकी है क्या बीजेपी उसमें सेंध लगाने में सफल रही है. इस चुनाव में मायावती बिना किसी सोशल इजीनियरिंग के उतरीं थी. 2007 के चुनाव में मायावती ने ब्राह्मण और दलित जातियों के गठजोड़ को साधा था और इस समीकरण को लेकर अपने बूते बहुमत हासिल किया था लेकिन इस बात कहानी दोहराई जाए ये मुश्किल दिखता है. कम से कम एग्जिट पोल के नतीजे ते यही कहते हैं. इस बार ब्राह्मण समुदाय मायावती के साथ नहीं था. 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी मैजिक ने बसपा का सबसे अधिक नुकसान किया था. सपा तो 5 और कांग्रेस 2 सीटें जीतने में कामयाब रही थी लेकिन बसपा का तो खाता तक नहीं खुला था. अब विधानसभा चुनाव में भी यही हाल है.

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