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भाजपा और कांग्रेस के कई नेताओं का भविष्य तय करेगा उत्तराखंड चुनाव

 shabahat |  2017-02-17 14:47:43.0

भाजपा और कांग्रेस के कई नेताओं का भविष्य तय करेगा उत्तराखंड चुनाव


देहरादून. उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव में जनता का फैसला हो चुका है. जनता ने ईवीएम के भीतर यह फैसला सुनिश्चित कर दिया है कि उत्तराखंड की सत्ता का खेवनहार कौन होगा. हालांकि इस बार का उत्तराखंड चुनाव बहुत मुश्किल चुनाव था. कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी की साख यहाँ दांव पर लगी है. दोनों ही पार्टियाँ अपनी-अपनी सरकार बनने का दावा कर रही हैं. लेकिन जनता के फैसले की तस्वीर तभी स्पष्ट हो पायेगी जब ईवीएम का ताला टूटेगा और हकीकत सबके सामने होगी.

उत्तराखंड के इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी जहाँ भीतरघात से जूझती रही वहीं कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती उसके अपने बागी उम्मीदवार रहे. 70 सदस्यीय विधानसभा में कर्णप्रयाग सीट का चुनाव बसपा प्रत्याशी की मौत की वजह से स्थगित हो गया था. वहां अब 9 मार्च को वोटिंग होगी. जिन 69 सीटों पर जनता का आदेश ईवीएम में कैद हो चुका है वहां 628 उम्मीदवारों की उम्मीदें जुड़ी हुई हैं और सभी को अपनी जीत की उम्मीद है.

उत्तर प्रदेश से टूटकर गठित हुए उत्तराखंड की बात करें तो अस्तित्व में आने के बाद एक बार कांग्रेस और फिर दूसरी बार भाजपा को सत्ता हासिल हुई. कहना चाहिये कि उत्तराखंड की जनता ने दोनों दलों को अच्छी तरह से परख लिया है. आमतौर पर जिस दल की सरकार होती है वह दल चुनाव में अपरहैण्ड होता है लेकिन इस बार कांग्रेस के लिये चुनौतियाँ बहुत ज्यादा थीं. चुनाव से कुछ ही दिन पहले कांग्रेस में बहुत बड़ी टूट हुई थी. भाजपा ने इस चुनाव में खुद को आगे लाने के लिये यह चुनाव विकास के नाम पर लड़ा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को आगे कर दिया. कांग्रेस ने यह चुनाव मुख्यमंत्री हरीश रावत के चेहरे पर ही लड़ा.

मुख्यमंत्री हरीश रावत ने यह बात बहुत अच्छी तरह से महसूस कर ली कि इस बार डिफेंसिव खेलने से नुकसान होगा इसलिये उन्होंने भाजपा को उसी के गढ़ में घुसकर घेरने की योजना बनाई. रावत ने भाजपा के गढ़ से चुनाव लड़ने का फैसला भी इसीलिये किया ताकि वह भाजपा के गढ़ में सेंध लगा सकें.

उत्तराखंड चुनाव की सबसे दिलचस्प बात यह है कि बड़े नेताओं को भी अपनी सीटें बचाना एक चुनौती की तरह लग रहा है. कांग्रेस और भाजपा के अध्यक्षों के लिये भी अपनी सीटें निकालना किसी चुनौती से कम नहीं है. कांग्रेस अध्यक्ष किशोर उपाध्याय सहसपुर सीट से चुनावी मैदान में हैं. तो भाजपा अध्यक्ष अजय भट्ट अपनी पारंपरिक रानीखेत सीट से चुनाव लड़े. दोनों की किस्मत ईवीएम में बंद हो चुकी है लेकिन दोनों जानते हैं कि इस बार प्रतिष्ठा बचाना बहुत मुश्किल बात है. कांग्रेस अध्यक्ष के लिए बागी आयेंद्र शर्मा और भाजपा अध्यक्ष के लिए बागी प्रमोद नैनवाल एक बड़ी मुश्किल बनकर उभरे.

इस चुनाव में तो खुद विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल के लिए भी अपनी प्रतिष्ठा बचाना लोहे के चने चबाने की तरह है. उनकी पारम्परिक सीट जागेश्वर पर उनके मुकाबले में भाजपा ने कोई कसर नहीं छोडी है. हरीश रावत के प्रभावशाली मंत्री भी अपनी सीट बचाने के लिये रात दिन एक किये रहे. जो नेता नामांकन के बाद अपनी पार्टी के दूसरे प्रत्याशियों को जिताने में लग जाते थे, इस बार खुद उन्हें जीतना भी बहुत मुश्किल महसूस हुआ. डॉ. इंदिरा हृदयेश, प्रीतम पंवार, सुरेन्द्र सिंह नेगी और राजेन्द्र भंडारी सरीखे नेता खुद अपने लिये संघर्ष करते नज़र आये.

इस बार उत्तराखंड चुनाव में जहाँ हरीश रावत की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है वहीं कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामने वाले हरक सिंह रावत, यशपाल आर्य सतपाल महाराज के सामने भी अस्तित्व बचाने का संकट है. अगर यह तीनों नेता चुनाव नहीं जीत पाते हैं तो फिर भाजपा में भी इनकी कोई अहमियत नहीं रह जायेगी.

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