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नोटबंदी से परेशांन किसान संगठनो ने लिखी PM मोदी को खुली चिट्ठी

 Tahlka News |  2017-01-07 08:02:53.0



तहलका न्यूज ब्यूरो

नयी दिल्ली. नोटबंदी के फैसले के बाद किसानो की बढ़ी दिक्कतों के सिलसिले में देश भर के बड़े किसान संगठनो ने एक जुट हो कर प्रधानमंत्री मोदी को खुला ख़त लिखा है. भारतीय किसान यूनियन, ऑल इंडिया कोआर्डिनेशन कमेटी ऑफ फार्मर्स मूवमेंट, तमिलनाडु फार्मर्स एसोसिएशन, और शेतकारी संगठन जैसे बड़े किसान संगठनो ने खेतिहर मजदूरों और किसानो की समस्याओं से प्रधानमंत्री को अवगत कराया है.

पढ़िए पूरा पत्र

सेवा में,

प्रधानमंत्री,
भारत सरकार

प्रिय प्रधानमंत्री महोदय,

नमस्‍ते! आपके नाम इस खुले पत्र पर हस्‍ताक्षर करने वाले देश के विभिन्‍न राज्‍यों व क्षेत्रों में रह रहे लाखों किसानों का प्रतिनिधित्‍व करते हैं। हम आपके 8 नवम्‍बर, 2016 को अर्थव्‍यवस्‍था में काले धन पर अंकुश लगाने के नाम पर 86% भारतीय मुद्रा का विमुद्रीकरण किए जाने के निर्णय के बाद से ग्रामीण भारत, विशेषकर कृषकों व खेतिहर मजदूरों के सामने आ रही कठिनाइयों को लेकर गहरी चिंता में हैं। यह शुरुआत से ही साफ है कि पूरी विमुद्रीकरण प्रक्रिया के दौरान हमारी ग्रामीण व कृषि संदर्भों/अर्थव्‍यवस्‍थाओं का ध्‍यान नहीं रखा गया। कमजोर व संकटग्रस्‍त वर्गों के लिए आवश्‍यक कदम नहीं उठाए गए।
हमने 31 दिसम्‍बर, 2016 की शाम आपके राष्‍ट्र के नाम संबोधन को इस उम्‍मीद में ध्‍यान से और सावधानीपूर्वक सुना कि उनकी कठिनाइयों का अंत करने वाला कोई शुभ समाचार सुनने को मिलेगा। लेकिन हमें निराशा ही हाथ लगी। कृषि के संबंध में आपने कहा कि सरकार डीसीसीबी व प्राइमरी सोसाइटियों से लिए गए कृषि ऋण पर 60 दिन के ब्‍याज का दायित्‍व लेगी, जिसे किसानों के बैंक खातों में सीधे जमा कराया जाएगा। आपने यह भी कहा कि नाबार्ड 41,000 करोड़ रुपए से सहकारी बैंकों और सोसाइटियों का पुनर्पूंजीकरण करेगी। आपने यह भी कहा कि तीन महीने के भीतर तीन करोड़ किसान क्रेडिट कार्ड रुपे कार्ड में बदले जाएंगे जिससे कि किसान कहीं भी उनका उपयोग कर सकें। हमें यह कदम तब अपर्याप्‍त लगते हैं जबकि किसानों के लिए यह फसल चक्र लगभग बर्बाद हो चुका है। हमें यह भी लगता है कि जो पहले से मौजूद योजनाएं और चीजें हैं उन्‍हें ही दोहराया जा रहा है।
आपकी ओर से किसानों की पीड़ा दूर करने के लिए घोषित तीन प्रमुख कदमों की पड़ताल करने पर यह सच्‍चाई सामने आती है: जब विमुद्रीकरण के चलते फसल की बुवाई समय से नहीं हो सकी है, ऋण अदायगी को 60 दिन के लिए टालना या सरकार का ब्‍याज का भार उठाना, जो 50000 रुपए (लघु अवधि का ऋण जो आमतौर पर साधारण किसान सांस्‍थानिक ऋण के तौर पर लेता है) के ऋण पर 60 दिन के लिए 333 रुपए होता है, उनकी कठिनाइयों को देखते हुए कुछ भी नहीं है, वह भी उस साल जो अच्‍छा वर्ष साबित होता। तमाम तरह की प्राकृतिक आपदाएं झेलने वाले किसान ऐसी सर्जिकल स्‍ट्राइक का जिसका सामना उन्‍हें बरसों में नहीं करना पड़ा के बिना अपने नुकसान की भरपाई कर पाते।

किसान क्रेडिट कार्ड की जगह रुपे या अन्‍य डेबिट कार्ड का प्रावधान 2012 से अस्‍तित्‍व में है और 2013-14 तक ऐसे 5.66 मिलियन कार्ड जारी किए जा चुके हैं। यह यूपीए सरकार के कदम को ही आगे बढ़ाना है जिसके दायरे में अब तक 3 करोड़ किसान आ जाने चाहिए थे और बढ़ावा दिए जाने के बावजूद यह न होना आश्‍चर्यजनक ही है।

जहां तक नाबार्ड की ओर से सहकारी बैंकों व सोसाइटियों को कम ब्‍याज दर वाला 41000 करोड़ रुपए उपलब्‍ध कराने की बात है: यह नया नहीं है। 2015-16 में नाबार्ड ने लघु अवधि के रीफाइनेंस पोर्टफोलियो के तहत 71497 करोड़ व दीर्घ अवधि रीफाइनेंसिंग के तहत 48,064 करोड़ रुपए की क्रेडिट लिमिट को स्‍वीकृति दी थी। जारी किया गया धन बीती तिमाही का अवशेष है जिसका उपयोग नहीं किया जा सका और जो पहले से ही उपलब्‍ध था।

उपर्युक्‍त को देखने के बाद, जबकि ऐसा लग रहा है कि विमुद्रीकरण व हमारे सामूहिक बलिदान का कोई स्‍पष्‍ट लाभ नजर नहीं आ रहा है और पर्याप्‍त नकदी की उपलब्‍धता के बारे में कोई स्‍पष्‍टता नहीं है,हम यह मानने के लिए विवश हैं कि सरकार के लिए किसानों की कठिनाइयां बिल्‍कुल भी मायने नहीं रखती हैं।

इतना ही नहीं विमुद्रीकरण के फैसले का समय यह दिखाता है कि किसानों के जीवनयापन/कृषि चक्र का बिल्‍कुल भी ध्‍यान नहीं रखा गया। रबी की बुवाई के साथ ही खरीफ में हुए उत्‍पादन की बिक्री पर असर पड़ा। पिछले वर्ष (2015-16) जो कि कृषि के लिए खराब साल रहा के मुकाबले 2016-17 में रबी की अधिक बुवाई का दावा करना किसी भी तरह सही नहीं है जिसके आधार पर कहा जा सके कि रबी पर विमुद्रीकरण का असर नहीं हुआ है।

भारत भर के गांवों में हम ऐसी कठिनाइयों व पीड़ा की ऐसी अनगिनत कहानियों से दो-चार हुए हैं, जो नकदी की कमी के चलते किसानों के हाथों कृषि मजदूरों को समय पर भुगतान न मिलने, किसानों के इस मौसम में कृषि प्रबंधन पर खर्च घटाने, किसानों के फसल न बेच पाने व व्‍यापारियों की अपनी कठिनाइयों व उनसे भी बढ़कर सहकारी बैंकों से कर्ज लेने वाले किसानों के ऋण न चुका पाने से जुड़ी हैं। यहां तक कि मशीनों का समय पर रखरखाव तक मुश्‍किल हो गया है। स्‍वयं सहायता समूहों व उनकी फेडरेशनों की मितव्‍ययिता व कर्ज से जुड़ी गतिविधियां भी प्रभावित हैं। खराब हो जाने वाली वस्‍तुओं के उत्‍पादकों की समस्‍या तो और भी विकराल है। साथ ही वापस लौट रहे प्रवासी मजदूरों की भी कठिनाइयां हैं जो गांव के बाहर अन्‍य क्षेत्रों में रोजगार नहीं पा रहे हैं। विमुद्रीकरण का सर्वाधिक नकारात्‍मक असर ग्रामीण सहकारी बैंकिंग सेक्‍टर के ध्‍वस्‍त होते जाने के रूप में सामने आया है, जबकि विभिन्‍न तरीकों से ग्रामीण बैंकिंग व ग्रामीण साख को मजबूत बनाने की जरूरत है, जिसमें राजनीतिक हस्‍तक्षेप को दूर करना भी शामिल है।

जिला सहकारी बैंकों को 500 व 1000 रुपए के नोट बदलने या जमा करने की अनुमति नहीं दी गई थी। जिससे 33 राज्‍य सहकारी बैंकों और 367 जिला सहकारी बैंकों के 12 करोड़ ग्राहक प्रभावित हुए,जबकि यह सभी राज्‍य व 349 जिला सहकारी बैंक कोर बैंकिंग प्‍लेटफार्म पर हैं। लगभग 5 करोड़ किसान आवश्‍यक केवाईसी मानक पूरा करने व किसान क्रेडिट कार्ड ऋण पाने के बाद, ऋण चुकाने में असमर्थ हैं और रिपोर्ट बताती है कि ऋणों की उठान में भारी कमी आई है। अगर वर्तमान स्‍थिति बनी रही तो सहकारी बैंकों को गर्त में जाने से शायद ही रोका जा सकेगा।

वहीं जिन किसानों/खेत मजदूरों के पास जन धन योजना के तहत खाते हैं, उनके लिए निकासी सीमा के मानक असमान हैं। अगर हम भारत को नकदरहित/कम नकद वाली डिजिटल अर्थव्‍यवस्‍था बनाने के नीतिगत सपने की बात करें, तो हम यही कह सकते हैं कि किसान व अन्‍य ग्रामीण ऐसे सपनों के सच होने से पहले ढांचागत सुविधाओं जैसे कि निर्बाध बिजली आपूर्ति को प्राथमिकता देंगे। ऐसी सेवाएं हमारी जीवनशैली को सीधे प्रभावित करने के अलावा राष्‍ट्र की आर्थिक प्रगति में भी सहायक होंगी।

ऐसा प्रतीत होता है कि 'काले धन के खिलाफ लड़ाई' और विमुद्रीकरण का उपयोग ग्रामीण जनों को जबरिया तकनीकी वित्‍तीय व्‍यवस्‍था का हिस्‍सा बनाने के लिए हो रहा है। जहां यह ऐसे तकनीकी वित्‍तीय सिस्‍टम चलाने वाले कॉरपोरेट जगत के लिए तो लाभ का सौदा हो सकता है लेकिन इसका खामियाजा आम ग्रामीण जन को उठाना पड़ रहा है, जिनकी ऐसी व्‍यवस्‍थाओं तक पहुंच सीमित व उपयोगिता बेहद कम है।

ऐसी व्‍यवस्‍थाओं के क्रियान्‍वयन में महानगरीय वित्‍तीय प्रणालियों और ग्रामीण व कृषि आधारित अर्थव्‍यवस्‍थाओं के अंतर को ध्‍यान में नहीं रखा गया है, जो ग्रामीण अर्थव्‍यवस्‍थाओं के बारे में गहन जानकारी का अभाव दर्शाता है। अंत में, वर्तमान विमुद्रीकरण प्रक्रिया ने नई तरह के भ्रष्‍टाचार को जन्‍म दिया है (जो पुराने नोटों के बदले कमीशन, जमाखोरों व आयकर चोरी करने वालों तक बड़ी मात्रा में नई मुद्रा पहुंचने के तौर पर नजर आ रहा है), ऐसी दंडात्‍मक वित्‍तीय प्रणाली जो कॉरपोरेट फाइनेंसरों को मुनाफा देगी और ग्रामीण जनों को कंगाल बनाएगी, विशेषकर छोटे व सीमांत किसानों को जो कि कृषक आबादी का बड़ा हिस्‍सा हैं।

समाज के अन्‍य वर्गों की तरह हम भी इस उम्‍मीद में खामोश रहे कि अर्थव्‍यवस्‍था को भारी फायदा पहुंचेगा क्‍योंकि आपने सभी नागरिकों से 30 दिसम्‍बर तक 50 दिन बलिदान देने को कहा। हालांकि, यह अस्‍पष्‍ट है कि इस पूरी कार्रवाई का उद्देश्‍य क्‍या था और उसे किस तरह पाया गया है। इतिहास इसे आजादी के बाद की सबसे ज्‍यादा चोट पहुंचाने वाली योजना के तौर पर याद करेगा, जिसे भ्रष्‍टाचार, काला धन व आतंकवाद से लड़ाई के नाम पर अंजाम दिया गया।

कृषि पर वित्‍त मंत्री की ओर से 19 नवम्‍बर 2016 को आयोजित बजट पूर्व मंत्रणा में कृषि संगठनों की सरकार से महत्‍वपूर्ण मांगों में से एक कृषि सौदों को विमुद्रीकरण नियमों से छूट देने की थी। हालांकि इस पर कोई सकारात्‍मक कदम देखने में नहीं आया, सिर्फ इस बात को छोड़कर कि किसानों को सार्वजनिक क्षेत्र की दुकानों से बीज इत्‍यादि की खरीद के लिए विमुद्रीकृत नोटों के उपयोग की छूट दी गई। सरकार की यह प्रतिक्रिया अपर्याप्‍त थी। फसल बीमा प्रीमियम की समय सीमा बढ़ाने के साथ ही कृषि ऋण के पुनर्भुगतान के लिए 60 दिन अतिरिक्‍त दिए गए। यह सारे कदम तभी उपयोगी होते जब नकदी का प्रवाह पर्याप्‍त या बढ़ रहा होता, जैसा कि नहीं है।

वहीं एनसीआरबी के ताजा आंकड़ें दर्शाते हैं कि किसानों की आत्‍महत्‍या के मामलों में 2015 में बढ़ोतरी हुई है, किसानों की आत्‍महत्‍या के ज्‍यादातर मामले कर्ज में डूबे/दिवालिया होने से जुड़े हैं। भारतीय कृषि की दुर्गति का असर किसानों व खेत मजदूरों दोनों ही पर पड़ रहा है। यह राष्‍ट्र उस अन्‍नदाता पर और बोझ नहीं डाल सकता जो उसका भूखा पेट भरता है।

इन हालात में हम आप से किसानों की कठिनाइयां कम करने के लिए निम्‍न कदम उठाए जाने की अपील करते हैं:

जो भी काला धन आया है (बैंकिंग प्रणाली में वापस न लौटे विमुद्रीकृत नोट, या वर्तमान कार्रवाई के जरिए एकत्र कर व आय और नए कर माफी उपाय), उससे प्रत्‍येक कृषक परिवार (यहां हम व्‍यापक संदर्भों में कृषक शब्‍द का उपयोग कर रहे हैं जिसमें खेत मजदूर भी शामिल हैं) को डायरेक्‍ट बेनिफिट ट्रांसफर के जरिए कम से कम 10,000 रुपए प्रदान किए जाएं। यह कुल मिलाकर 1.2 लाख करोड़ रुपए होगा जो उन शुरुआती अनुमानों से कम है जो काले धन के खिलाफ लड़ाई के बारे में लगाए गए थे। अति आवश्‍यक कि सहकारी बैंकों को तुरंत अन्‍य बैंकों के समानांतर लाया जाए। सहकारी बैंकों में जमा व निकासी पर लगे सभी प्रतिबंध हटाए जाएं। किसानों पर जन धन खातों के संबंध में जमा व निकासी पर लगे सभी प्रतिबंध हटाए जाएं। फसल में हुए नुकसान की भरपाई के लिए सभी किसानों के ऋण माफ किए जाएं। बढ़ी हुई नाबार्ड फंडिंग से, संयुक्‍त उत्‍तरदायित्‍व समूहों व स्‍वयं सहायता समूहों को अधिक सॉफ्ट लोन उपलब्‍ध करवाए जाएं। महिला कृषकों के लिए ग्रामीण स्‍तर पर वित्‍त व समर्थन के लिए फंड उपलब्‍ध करवाया जाए।
साथ ही किसान क्रेडिट स्‍कीम में वित्‍त का स्‍तर बढ़ाया, ब्‍याज दर घटाई और कृषि ऋण का विस्‍तार कर उसकी पहुंच बढ़ाई जाए।

जैसा कि लग रहा है कि नकदी की कमी अभी बनी रहेगी, कृषि कार्यों के संचालन के लिए मनरेगा जैसी व्‍यवस्‍था की जानी चाहिए जिससे कि कृषि कार्य सुचारू रूप से चले व श्रमिक सरकार से सीधे खातों में भुगतान प्राप्‍त करें, जहां से निकासी बिना किसी शर्त हो। मनरेगा का आवंटन दोगुना किया जाए।

रबी की फसल की बिक्री व विपणन सही तरह से हो सके इसके लिए अभी इंतजाम किए जाएं। व्‍यापारियों व अन्‍य एजेंसियों के पास अभी से पर्याप्‍त नकदी की उपलब्‍धता सुनिश्‍चित की जाए जिससे कि किसानों का नुकसान न हो। सरकार को अधिक खरीद के लिए आगे आना चाहिए, जैसे कि दालों अरहर आदि जिनकी कीमतों में गिरावट देखी जा रही है व इस राशि को सीधे किसानों के खाते में भुगतान करना चाहिए।

भवदीय,
युद्धवीर सिंह, महासचिव, ऑल इंडिया कोआर्डिनेशन कमेटी ऑफ फार्मर्स मूवमेंट (एआईसीसीएफएम)
चौधरी राकेश टिकैत, राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता, भारतीय किसान यूनियन उत्तर प्रदेश
अजमेर सिंह लखोवाल, राज्‍य अध्‍यक्ष, भारतीय किसान यूनियन, पंजाब
के सेला मुत्‍थु, अध्‍यक्ष, तमिलनाडु फार्मर्स एसोसिएशन
नल्‍लागौंदर, उझावर उल्‍लैपलार कच्‍ची (तमिलनाडु फार्मर्स एसोसिएशन)
विजय जवांधिया, शेतकारी संगठन, महाराष्‍ट्र
राजवीर सिंह जादौन, राज्‍य अध्‍यक्ष, भारतीय किसान यूनियन, उत्‍तर प्रदेश
जगदीश सिंह, राज्‍य अध्‍यक्ष, भारतीय किसान यूनियन, मध्‍य प्रदेश
विद्याधर ओलाखा, राज्‍य अध्‍यक्ष, भारतीय किसान यूनियन, राजस्‍थान
रतन सिंह मान, राज्‍य अध्‍यक्ष, भारतीय किसान यूनियन, हरियाणा

सुखदेव सिंह गिल, राज्‍य अध्‍यक्ष, भारतीय किसान यूनियन, हिमाचल प्रदेश
सतनाम सिंह चीमा, राज्‍य अध्‍यक्ष, भारतीय किसान यूनियन उत्‍तराखंड
धन सिंह शेखावत, राज्‍य अध्‍यक्ष, भारतीय किसान यूनियन महाराष्‍ट्र
वीरेंद्र डागर, राज्‍य अध्‍यक्ष, भारतीय किसान यूनियन दिल्‍ली ग्रामीण

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