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महागठबंधन की राह से सत्ता का सफ़र तय करेगी समाजवादी पार्टी

 Sabahat Vijeta |  2016-11-06 16:54:39.0

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शबाहत हुसैन विजेता


लखनऊ. समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश की सत्ता में दोबारा वापसी के लिए कोई कोर कसर छोड़ना नहीं चाहती. अखिलेश यादव की सरकार ने हालांकि यूपी में सरकार बनाने के बाद साढ़े चार साल तक लगातार काम किया है लेकिन इसके बावजूद वह अकेले चुनावी समर में उतरकर कोई रिस्क नहीं लेना चाहती. समाजवादी पार्टी यह बात अच्छी तरह से जानती है कि चुनाव के दौरान ढेर सारे फैक्टर एक साथ काम करते हैं और सिर्फ विकास के सहारे सत्ता की वैतरणी पार नहीं हो सकती. उसे पता है कि दूसरे राजनीतिक दल भी इसी काम के लिए रात-दिन एक किये हुए हैं. यही वजह है कि समाजवादी पार्टी ने अब बिहार विधानसभा चुनाव की तर्ज़ पर उत्तर प्रदेश में भी महागठबंधन बनाकर चुनाव लड़ने का फैसला किया है.


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यूपी की सत्ता में दोबारा वापसी के लिए एक तरफ समाजवादी पार्टी लोहिया वादियों और चरण सिंह वादियों को अपने साथ जोड़ने की तैयारी कर रही है तो दूसरी तरफ कांग्रेस के साथ गठबंधन की संभावनाओं को भी नकार नहीं रही है. हालांकि कांग्रेस के साथ समाजवादी पार्टी के रिश्ते पहले से ही बेहतर हैं. अखिलेश यादव और राहुल गांधी कई बार सार्वजनिक मंचों से एक दूसरे की तारीफें करते रहे हैं.


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बिहार विधानसभा चुनाव से पहले बने गठबंधन में सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव सर्वमान्य नेता के रूप में उभरे थे. उस गठबंधन से मुलायम ने खुद को अलग नहीं किया होता तो उनके लिए यूपी की राह बहुत आसान हो गई होती लेकिन मुलायम और लालू के समधी बन जाने की वजह से बिहार से मदद की संभावनाएं खत्म नहीं हुई हैं. हालांकि बिहार चुनाव के पहले गठबंधन टूटने से जो फांस नीतीश कुमार जैसे नेताओं के दिल में गड़ी थी उसे निकालना भी आसान नहीं होगा.


विकास रथ यात्रा


समाजवादी पार्टी की चौधरी अजित सिंह से बातचीत हो चुकी है. दोनों के बीच सिर्फ सीटों की संख्या तय होना बाकी है. समाजवादी पार्टी के रजत जयन्ती समारोह में शिवपाल सिंह यादव और अखिलेश यादव को करीब लाने के लिए मंच पर ही लालू प्रसाद यादव ने जिस तरह की कोशिश की उससे यह बात साफ़ हो गई कि यूपी में समाजवादी पार्टी का गैर भाजपा और गैर बसपा गठबंधन बनाने में लालू सबसे बड़े पुल साबित होंगे.


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समाजवादी पार्टी और सरकार के बीच लम्बे समय तक चले घमासान के बाद जब पार्टी का रजत जयन्ती समारोह तय हुआ उसी समय अखिलेश यादव ने भी विकास से विजय की ओर रथ यात्रा का एलान कर दिया. 3 नवम्बर को लखनऊ से उन्नाव तक की रथयात्रा में अखिलेश ने रिकार्ड भीड़ जुटाकर सभी को सोचने पर मजबूर कर दिया. 5 नवम्बर को पार्टी के रजत जयंती समारोह में भी रिकार्ड भीड़ उमड़ी और यह बात साफ़ हो गई कि विपक्षी पार्टियाँ समाजवादी पार्टी को उतने हलके में नहीं लें जितना कि परिवार में मचे घमासान के बाद वह उसे लेने लगी थीं.


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समाजवादी पार्टी परिवार में मचे घमासान से अखिलेश यादव बड़े नेता के रूप में उभरे हैं और उन्हें इग्नोर कर पाना अब न समाजवादी पार्टी के वश की बात है और न ही दूसरी पार्टियों के लिए ही यह संभव है.


राष्ट्रीय लोक दल के प्रमुख और चौधरी चरण सिंह के पुत्र अजित सिंह के साथ समाजवादी पार्टी का गठबंधन फायदे का सौदा इसलिए साबित होगा क्योंकि राष्ट्रीय लोक दल का पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अच्छा प्रभाव है. 27 साल से यूपी की सत्ता से दूर कांग्रेस को प्रशांत किशोर के प्रबंधन ने बार्गेनिग पॉवर में ला ही दिया है. अमरीकी स्टाइल में उत्तर प्रदेश में आम लोगों से संपर्क साध कर राहुल गांधी ने भी यूपी के लिए काफी मेहनत की है. ऐसे में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी में गठबंधन होता है तो ताज्जुब नहीं होना चाहिए क्योंकि कांग्रेस गठबंधन के महत्व को अच्छी तरह से जानती है. उसने बिहार में गठबंधन का मज़ा भी चखा है. बिहार में गठबंधन के सहारे वह 4 से 27 सीटों तक पहुँच गई. यूपी में कांग्रेस की तरफ से अभी गठबंधन को लेकर कोई बयान सामने नहीं आया है लेकिन यह उम्मीद जताई जा रही है कि अगले एक महीने के भीतर गठबंधन को लेकर स्थितियां तय हो जायेंगी.


समाजवादी पार्टी के रजत जयन्ती समारोह में जिस तरह से दूसरे राष्ट्रीय नेताओं की मौजूदगी रही उसने समाजवादी पार्टी के उत्साह को बढ़ा दिया है. समाजवादी पार्टी एक तरफ जनता के बीच अपने विकास को लेकर जायेगी तो साथ ही ऐसे सहयोगियों के साथ मिलकर चुनाव लड़ेगी जो भाजपा का रास्ता मुश्किल बनायेंगे.

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