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अपने मुस्लिम दोस्तों की खातिर, यह हिन्दू अपनी दिहाड़ी छोड़ लौट आता है गांव

 Anurag Tiwari |  2016-06-21 08:35:24.0

[caption id="attachment_90363" align="aligncenter" width="1024"]Gulab Yadav, Abhishek Yadav, Azamgarh, Ramzan, Sahari, Kuwait गुलाब यादव अपने बेटे अभिषेक यादव के साथ[/caption]

तहलका न्यूज ब्यूरो

आजमगढ़. एक तरफ जहां यूपी में चुनावों से पहले हिन्दू मुस्लिम ध्रुवीकरण की राजनीति गरमाई हुई है, वहीँ सूबे के आज़मगढ़ जिले में एक ऐसा भी परिवार है, जो देश के गंगा-जमनी तहजीब को जिन्दा रखे हुए है। यह परिवार रमजान के महीने के दौरान रात को सिर्फ इसलिए जगता है ताकि सुबह अपने मुस्लिम भाइयों को सहरी के लिए जगा सके। ख़ास बात यह है कि इस परिवार के मुखिया गुलाब इस काम करने के लिए दिल्ली में अपनी दिहाड़ी मजदूरी छोड़ कर अपने घर आजमगढ़ लौट आते हैं।

अपनी नौकरी छोड़ आते हैं आजमगढ़

आजमा गढ़ के मुबारकपुर गांव के रहने वाले गुलाब यादव पेशे से दिल्ली में दिहाड़ी मजदूर हैं और साल एक अधिकतर समय वहीँ रहते है। जैसे ही रमजान शुरू होने वाला होता है, गुलाब अपनी दिहाड़ी मजदूरी छोड़ आजमगढ़ स्थित अपने गांव लौट आते हैं। गुलाब यादव का कहना कि उन्हें यह काम करके बहुत आत्मिक शांति मिलती है। इस काम की जिम्मेदारी उनके पिता के बाद,  उनके बड़े भाई ने कुछ सालों तक सम्हाली और उसके बाद गुलाब ने यह जिम्मा सम्हाल लिया और हर साल रमजान के समय वे गांव लौट आते हैं।


खाड़ी की नौकरी भी छोड़ आए गुलाब

दो साल पहले गुलाब यादव की मिडिल ईस्ट में कुवैत में नौकरी लगी थी। रमजान आने के पर उन्होंने अपने मालिक से अपने काम का हवाला देते हुए छुट्टी मांगी, लेकिन मालिक ने छुट्टी देने से मना कर दिया। अपनी धुन के पक्के परंपरा के निर्वाह की जिद  के लिए गुलाब यादव ने अपना वीजा तक कैंसल करवा दिया। गुलाब ने अपने पिता की शुरू की गई परंपरा को कायम रखने के लिए अपनी नौकरी को भी ठोकर मार दी और हर रमजान से पहले आकर अपनी परंपरा का निभा रहे है। साल 2008 में चिरकिट यादव का निधन हो गया। तब चिरकिट के बड़े बेटे विक्रम यादव ने पिता की विरासत सम्हाल ली। इसके एक साल बाद उनकी नौकरी पीसब्लूडी मेठ की नौकरी लग गई। इसके बाद चिरकिट के सबसे छोटे बेटे गुलाब यादव ने अपने पिता द्वारा शुरू की गई इस परंपरा की कमान सम्हला ली और अब वे अपने बेटे अभिषेक को भी इसमें शामिल कर चुके है
कैसे शुरू हुई परम्परा

सठियांव ब्लॉक के कौड़िया गाव के रहने वाले 70 के दशक में गाव में लगने वाले अखाड़े में मौजूद थे। इस अखाड़े में शाम को गांव के हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग शाम को शामिल होते थे। एक दिन मजाक में ही उनके मुस्लिम दोस्तों ने चिरकिट से कहा कि आप खाली रहते हैं, क्यों न भोर में सबको सहरी खाने के लिए जगाने का काम कर लें। दोस्तों के मजाक को सवाब का काम समझ कर चिरकिट यादव ने साल 1961 से ही भोर में मुस्लिम परिवारों को सहरी खाने के लिए जगाने का काम शुरू कर दिया।

पूरा गांव सोता है तब जाग रहे होते हैं बाप-बेटे

रात के तीन बजे जब पूरा गांव चैन की नींद सो रहा होता है तो बनारसी साड़ियों के लिए मशहूर आजमगढ़ के मुबारकपुर गांव के गुलाब यादव और उनके 12  वर्षीय बेटे अभिषेक जाग रहे होते हैं। ये दोनों रात एक बजे से सुबह तीन बजे तक गांव के मुस्लिम परिवारों को रमजान में सहरी और फज्र (सुबह) की नमाज के लिए जगाने का का करते हैं। यह इन दोनों की कोई आज की दिनचर्या नहीं बल्कि गुलाब यादव पिछले 45 सालों से अपने पिता के ज़माने से यह काम करते आ रहे हैं और अब उनका 12 साल का बेटा भी उनके इस पुन्य काम में हाथ बंटाता है।

तब तक नहीं हटते जब तक परिवार न जागे

रात एक बजे से तीन बजे के बीच 45 वर्षीय गुलाब यादव और उनका 12 वर्षीय बेटा अभिषेक गांव के हर मुस्लिम घर के दरवाजे पर दस्तक देकर उन्हें साडी के लिए जागते हैं। यह दोनों तब तक उस दरवाजे पर रहते हैं, जबतक कि उस परिवार में जगहट न हो जाए।

गांव वाले भी हैं शुक्रगुजार

गुलाब के पड़ोसी शफीक बताते हैं कि उन्होंने चार साल की उम्र से गुलाब के परिवार को यह परम्परा निभाते देख रहे हैं। वे बताते हैं कि गुलाब डेढ़ घंटे में पूरे गांव का चक्कर लगाते हैं। इसके बाद वे गांव का दूसरा चक्कर लगाते हैं कि ताकि कोई परिवार शहरी करने से चूक न जाए। शफीक कहते हैं कि रमजान में रोजे का इससे बड़ा पुण्य कोई क्या कम सकता है।

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