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नोटबंदी से क्या चुनावी राजनीति में पड़ेगा फर्क?

 Tahlka News |  2016-11-29 11:44:41.0

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उत्कर्ष सिन्हा

8 दिसंबर को प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के अचानक नोटबंदी के फैसले ने कई बहसों को जन्म दिया है. विपक्षी दल इस मामले में सत्ताधारी भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं तो वहीँ नरेन्द्र मोदी इसे काले धन के खिलाफ बड़ी लडाई के रूप में प्रस्तुत करने में कोई हिचक नहीं दिखा रहे हैं. कहा तो यह भी जा रहा है कि बीते ढाई सालो में बढ़ी महगाई और सीमा पर बढ़ते तनाव के उपजते आक्रोश को कम करने के पहले नरेन्द्र मोदी ने यह दाँव उस वक्त खेला है जब यूपी और पंजाब के विधानसभा के चुनाव सर पर हैं और इस मास्टर स्ट्रोक के जरिये वे बाकी सवालो को दबाने में सफल हो जाए.

ऐसे में यह सवाल बड़ा है कि क्या यह दाँव भाजपा के लिए चुनावी सफलता का वाहक बनेगा ? इस फैसले के आने के बाद से हुए उपचुनावों के नतीजे बहुत कुछ नहीं कह पाए मगर गुजरात और महाराष्ट्र के निकाय चुनावो में भाजपा को बड़ी जीत मिली. उत्साहित भाजपा नेताओं ने यह दावा भी किया है कि यह नतीजे जनता का समर्थन बताते हैं.


अब बात राज्यों के विधानसभा चुनावो की की जाए तो निश्चित तौर पर यह लगता है कि विपक्षी दलों की तैयारियों पर बड़ा फर्क पड़ा है. बीते कुछ सालो में बड़ी रैलियों, हेलीकाप्टर से प्रचार और मतदाताओं को रिश्वत का चालान बढ़ा हुआ है. अब नोटबंदी के बाद उपजे माहौल में निश्चित रूप से इस तरह के खर्चो के लिए धन की मुश्किल आएगी.

इसके साथ ही भाजपा पर यह भी आरोप लगने लगा है कि वह इस फैसले के आने के पहले ही अपने नगद पैसे को जमीनों में निवेश कर चुकी थी.विपक्षी नेताओं ने कागजात पेश करते हुए बिहार के आंकड़े प्रस्तुत किए हैं जहाँ नगद लेनदेन के माध्यम से भाजपा कार्यालयों के लिए जमीनों की खरीद 8 नवम्बर के ठीक पहले की गयी है.

कहा जा रहा है कि भरी भरकम रैलियाँ करने के लिए मशहूर बसपा सुप्रीमो मायावती पर इसकी ज्यादा मार पड़ी है. मायावती का साथ छोड़ने वाले तमाम नेता उनपर टिकट के बदले पैसा मांगने का आरोप लगाते भी रहे हैं, मगर मायावती ने भी यह साफ़ किया है कि उनकी पार्टी कार्यकर्ताओं और प्रत्याशियों से चंदा लेती है और लेती रहेगी. मगर इस दावे के बावजूद बसपा अपनी रणनीति बदलने पर विचार कर रही है जहाँ बड़ी रैलियों की जगह छोटी रैलिओं और कार्यक्रमों की रूपरेखा बनायीं जा रही है.

कांग्रेस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर भी शो मास्टर माने जाते हैं और राहुल गाँधी के लिए खाट सभावो का आयोजन भी उनकी इसी योजना का हिस्सा था मगर पैसो की किल्लत अब उनकी रणनीति पर भी भारी पडेगी और इस तरह के आयोजनों पर भी इसका असर पड़ेगा. अभी से ही कांग्रेस के लिए टीम पीके के खर्चो की भरपाई करने में मुश्किलें आनी शुरू हो चुकी हैं.

कांग्रेस के बड़े नाता तो इसे बाकायदा विपक्ष को कमजोर करने की साजिश का हिस्सा बता रहे हैं. कांग्रेस नेता प्रदीप माथुर का कहना है कि – भाजपा की सान्थ्गान्थ चूँकि बड़े कार्पोरेट घरानों से है और मोदी सरकार उनके लाभ के लिए खुल कर काम कर रही है इस वजह से भाजपा को तो बड़ा चंदा मिलेगा मगर छोटे और नगद चंदो से काम चलने वाली पार्टियाँ इसका खामियाजा भुगतेंगी. क्युकी वे अपनी कम्पैनिंग के लिए कैश पर ही निर्भर करती हैं.

समाजवादी पार्टी यूपी की सत्ता में है और उसके चेहरा अखिलेश यादव अपना रथ ले कर निकलने वाले हैं. हलाकि पार्टी के अंदरूनी संतुलन गड़बड़ाने के बाद समाजवादी पार्टी का कैम्पेन अभी शुरू नहीं हो सका है लेकिन अब इसके स्वरुप पर भी फर्क पड़ना तय है.

भाजपा ने विधानसभा चुनावो के लगभग 6 महीने पहले यह दाँव खेला है. यूपी के वोटरों का लगभग 35 प्रतिशत युवा है और वह काले धन के खिलाफ भावनात्मक रूप से खड़ा हुआ है. मोदी का अनुमान है कि यह वोटर उसके साथ ही आएगा. मोदी को यह भी भरोसा है कि शुरूआती अफरातफरी से उपजा आक्रोश दो तीन महीनो में थम जायेगा और तब तक नए मुद्दे सामने आ जायेंगे. मोदी की रणनीति में भी यह बात दिखाई देती रही है कि हर 2-3 महीनो में वे एक नया मुद्दा ले आते हैं जो पिछली परेशानियों को भुला देता है. ऐसे में जानकारों का आंकलन है कि आगामी जनवरी माह तक वे कुछ ऐसे मुद्दे छेड़ेंगे जो भावनात्मक रूप से लोगो को विभाजित कर सके.

नोटबंदी के बाद विपक्ष संसद में भले ही एक जुट दिखाई दे रहा हो मगर बाहर वह बिखरा हुआ ही है. बसपा जहाँ आक्रामक रुख अख्तियार किए हुए हैं वही समाजवादी पार्टी इस मामले में सवाल तो उठा रही है मगर इस मुद्दे पर संघर्ष करने से बच भी रही है. 29 नवम्बर को लखनऊ में ममता बनर्जी के प्रदर्शन को अखिलेश यादव ने समर्थन तो दिया मगर खुद उस कार्यक्रम में ऐन वक्त पर नहीं गए.

यह देखना दिलचस्प होगा कि यूपी की सियासत के चुनावी व्याकरण किस तरह से बदलते हैं. नोटबंदी के व्यापक असर को लेकर नरेंद्र मोदी का आंकलन कितना सटीक बैठता है और इसकी मार से तात्कालिक तौर पर तबाही झेल रहे महिला ,मजदूर और किसान वर्ग को विपक्षी पार्टिया कितना अपने पाले में रख पाती हैं वह ही नतीजो का फैसला करेगा.

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