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जानिए क्या है श्राद्ध का महत्व, कैसे करें पितरों को तर्पण

 Anurag Tiwari |  2016-09-15 15:11:56.0

Pitra Paksh, Shraddh, Procedure, Dr JN Tripathi

Pitra Paksh, Shraddh, Procedure, Dr JN Tripathiडॉ जेएन त्रिपाठी

लखनऊ. जब श्रद्धा से पितरों के निमित्त जो तर्पण,पुण्य ,दान आदि कर्म विधि पूर्वक किए जाते हैं तो वह श्राद्ध कहलाता है। जो मनुष्य पिछला शरीर त्याग चुके हैं परन्तु अगला शरीर अभी नहीं प्राप्त किया है, वे इनके बीच रहकर स्वयं को मनुष्यों जैसा अनुभव करते हैं और अति शक्तिशाली होते हैं। इन्हें ही पितर कहा जाता है।

इस साल पितृ पक्ष 16 सितम्बर ( शुक्रवार ) से 30 सितम्बर (शुक्रवार ) तक है। इस समय सूर्य देव दक्षिणायन होते  हैं और पितरों की तृप्त आत्माओ को मुक्ति का मार्ग प्रदान करते हैं। हिन्दू धर्म में तो प्रत्येक शुभ कार्य के प्रारम्भ में माता पिता पूर्वजों को नमन करने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। ऋषियों ने पूरे एक पक्ष को ही पितरों के निमित्त कर दिया है। यह लगभग 15 दिनो का रहता है, पितृपक्ष की अमावस्या को सर्व पित्र अमावस्या भी कहतें हैं। यह पक्ष पितरों को अति प्रिय हैं, इस दौरान पितर पृथ्वी के अति निकट आ जातें हैं। इसीलिए इस काल में  इन अतृप्त आत्माओं की शांति के लिए  श्राद्ध  कर्म का विधान है।  श्राद्ध का पितरों से घनिष्ठ सम्बन्ध है, पितरों को आहार और अपनी श्रद्धा पहुंचाने का यही एक माध्यम है। इसमें तर्पण पिंड दान ,दान, शुभ संकल्प और अपने द्वारा जाने अनजाने किये गए अशुभ कर्मों के लिए क्षमा याचना करनी चाहिए।


जिस मृत व्यक्ति के एक वर्ष के सारे क्रिया कर्म संपन्न हो चुके हैं उन्ही का श्राद्ध- कर्म किया जाता है। जिनका श्राद्ध कर्म किया जाता है उनके नाम , गोत्र का उच्चारण करके मन्त्रों द्वारा अन्न जल आदि अपनी शुद्ध श्रद्धा एवं भवना द्वारा दिया जाता है।  उन्हें विभिन्न रूपों में प्राप्त होता है। जैसे कोई पितर देव योनि में है उन्हें यह पदार्थ अमृत के रूप में, गन्धर्व में भोग्य के रूप में, पशु में तृण के रूप में, यक्ष को पेय रूप में, दानव को मांस रूप में और प्रेत योनि में रक्त रूप में तथा मनुष्य योनि में हैं तो अन्न रूप में प्राप्त होता है। पितर सारे श्राद्ध कर्म को सूक्ष्म रूप में ग्रहण कर लेतें हैं।

पुराणों के अनुसार यमराज इस काल में सभी पितरों को मुक्त कर देतें हैं कि वह अपने स्वजनों के पास जाकर तर्पण ग्रहण कर सकें।  पिता , बाबा (पिता का पिता ) और परबाबा (पिता के  पिता का पिता) को तीन देवों के सामान माना गया है क्रमशः वसु ,रूद्र ,आदित्य ,ये तीनों पूर्वजों के प्रतिनिधि माने गए हैं। श्राद्ध काल में ये लोग मौजूद रहते हैं और शुद्ध -भवन  से किये गए श्राद्ध कर्म से तृप्त एवं प्रसन्न होकर अपने वंशजों को सुख एवं समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करतें हैं, जो कि अति फलदायी होता है।

महत्वपूर्ण सामाग्री 

श्राद्ध में उपयोगी वस्तुओं में गंगा जल, शहद, दूध, कपड़ा, दौहित्र, कुश और तिल महत्वपूर्ण हैं। तुलसी से तो पितर चिर काल तक प्रसन्न और संतुष्ट  रहतें हैं। सोने , चाँदी, कांसे, ताँबे के पात्र या पत्तल का प्रयोग करना चाहिए।  लोहे एवं केले के पत्र का प्रयोग निषिद्ध है।

यह स्थान हैं पवित्र

श्राद्ध स्थलों में गया जी, पुष्कर, प्रयाग, नैमिष, काशी, ऋषिकेश, कुरुक्षेत्र, हिमालय, गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा आदि अनेक स्थल पवित्र माने गए हैं।  दक्षिण दिशा में ढालू और पवित्र होना आवश्यक है।

तर्पण विधि

श्राद्ध में मुख्य कर्मों में से एक तर्पण है। इसमें हम पीतल की थाली में शुद्ध जल लेकर उसमे थोड़े काले तिल व दूध डालकर अपने सामने रखें, उसके आगे एक खाली पात्र रखें। अब दोनो हाथों के अँगूठे और तर्जनी के बीच में कुश लेकर अंजुली बना लें, दोनों हाथों को परस्पर मिला लें तथा पितर का नाम आदि लेकर तृप्त्यनताम कहते हुए जल को आगे  रखे पात्र में छोड़ दें हर पितर के लिए तीन  तीन अंजुली तर्पण करें, इसी क्रिया को तर्पण कहते हैं।

इस मन्त्र का करें जाप

ॐ त्रिपुरायै च विद्महे भैरवये च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात। इस मंत्र की दो माला जाप करें, फिर पूजन स्थल पैर रखें जल को अपनी आँखों में लगाएं और थोड़ा घर में छिड़क दें तथा बचे जल को पीपल के पेड़ को अर्पित कर दें। इस क्रिया से सारी नकारात्मक ऊर्जा विसर्जित हो जाती है और अनेकों समस्याओं से मुक्ति मिल जाती है।

श्राद्ध विधि

  1. एक दिन पूर्व ब्राह्मण को निमंत्रित करें। निमंत्रण देने वाला और ब्राह्मण दोनों क्रोध, स्त्रीगमन, परिश्रम आदि से दूर रहें जिससे श्राद्ध कर्म पूरी श्रद्धा और पवित्र भावना के साथ संपन्न हो सके।

  2. श्राद्ध स्थल को स्वच्छ एवं गंगा जल से शुद्ध कर लें।

  3. आँगन में रंगोली बनाएं और घर की महिलाएं शुद्ध होकर शुद्ध भावना एवं प्रसन्नता पूर्वक पितरो का भोजन बनाएं।

  4. श्रेष्ठ ब्राह्मण से पितरों की पूजा,तर्पण आदि श्राद्ध कर्म करवाएं।

  5. पितरों के निमित्त अग्नि में गोदुग्ध, गोघृत, दही, खीर पितरों की प्रिय वस्तु (यदि ज्ञात हो) अर्पित करें।

  6. गाय, कुत्ता, कौवा और अतिथि के लिए भोजन से चार ग्रास निकाल दें।

  7. ब्राह्मण को प्रेम पूर्वक भोजन कराएं ,मुखशुद्धि ,वस्त्र ,दक्षिणा आदि दें।

  8. ब्राह्मण प्रसन्न होकर मंगल कामना करेंऔर आशीर्वाद दें।


इस प्रकार सुन्दर भावना से किये गए श्राद्धकर्म से सकल मनोरथों की पूर्ति होती है और हेल्थ,वेल्थ एंड हैप्पीनेस तीनों का लाभ मिलता है।

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