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अब सड़कें करेंगी खुद का इलाज, इंडियन प्रोफेसर ने की नई तकनीक इजाद

 Anurag Tiwari |  2016-12-12 08:32:27.0

Self-Repairing Roads, Prof Nem Kumar Banthia, IIT


तहलका न्यूज ब्यूरो

इंडिया में सडकों का हाल देखकर हर भारतीय को रोना आता है. हाल ही में देश के कई इलाकों में नई तकनीक से सड़कें बनाई गई है, जो पहले के मुकाबले काफी मजबूत हैं. लेकिन अभी भी समस्या यह है कि मानसून के बाद ज्यादातर सड़कें खस्ताहाल हो जाती हैं. इससे इन पर चलने वाले न केवल व्हीकल्स का बुरा हाल होता है बल्कि इन पर चलने वालों को भी शारीरिक स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ता है. लेकिन अब एक भारतीय प्रोफेसर ने इस समस्या का इलाज ढूंढ लिया है. सड़कें अब अपनी टूट-फूट का इलाज खुद करेंगी.

भारत में पले-बढे कनाडा बेस्ड डॉ नेमकुमार बंथिया ने भारत वापस आकर एक नई तकनीक के साथ नई सड़कों का निर्माण कर रहे हैं, जो खुद-ब-खुद रिपेयर हो जाती है. डॉ नेमकुमार बंथिया और उनकी टीम ने सफलता पूर्वक इस सेल्फ-रिपेयरिंग रोड का भारत में निर्माण करके एक बड़ा मुकाम हासिल किया है. डॉ नेमकुमार बंथिया और वर्तमान में यूनिवर्सिटी ऑफ़ ब्रिटिश कोलंबिया में सिविल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट में प्रोफ़ेसर हैं.

Self-Repairing Roads, Prof Nem Kumar Banthia, IIT

सेल्फ –रिपेयरिंग रोड्स को बनाने के लिए स्प्रेड फाइबर नाम के मजबूत पॉलीमर का उपयोग किया जाता है. डॉ नेमकुमार ने काफी दिनों के रिसर्च के बाद एक ऐसी तकनीक का ईजाद किया जिसके द्वारा सेल्फ-रिपेयरिंग सड़कों का कंस्ट्रक्शन संभव हो सका. इन रोड्स की खासियत यह है कि यह कम लागत में बनती हैं और इनकी उम्र भी अधिक होती है. अपनी इस नई तकनीक का यूज कर 2014 में प्रोफसर बंथिया ने पहली सेल्फ-रिपेयर रोड का काम कर्नाटक के थोंड़ेबावी गांव में शुरू किया था. इस प्रोजेक्ट का काम पिछले साल जाड़े के मौसम में पूरा हुआ. यह रोड अस्चार्य्जंक रूप से गर्मी और बारिश दोनों मौसम में बिना किसी समस्या के बची रहीं और उनका यह प्रोजेक्ट सफल रहा.

प्रोफेसर बंथिया का कहना है कि इस तकनीक से बनी सड़क 15 साल से ज्यादा समय तक ज्यों की त्यों बनी रह सकती है, जो भारत के सामान्य सड़कों की एवरेज लाइफ से कहीं ज्यादा है और पहली बार बनाने में यह आम सडकों के बनाने की लागत से 30 प्रतिशत तक सस्ती पड़ती है.

सेल्फ-रिपेयरिंग सड़क की खासियत

  • - इसे बनाने में लगभग 60 प्रतिशत सीमेंट को फ्लाई ऐश के साथ रिप्लेस किया जाता है.

  • - यह ग्रीनहाउस गैसेस के उत्सर्जन से बचाती है.

  • - इन सड़कों को बनाने के लिए ऐसे फाइबर का उपयोग होता जिस पर हाइड्रोफिलिक नैनो -कोटिंग होती.

  • - यह फाइबर पानी को अपने में सोख लेता जो सड़क में बनने वाली दरार को भरने का काम करता है.

  • - इन सड़कों की मोटाई लगभग 100 मिमी तक होती है आम भारतीय सड़कों से लगभग 60% तक कम होती है.

  • - इससे लागत कम हो जाती है और दूसरी तरफ कम रॉ मटेरियल का उपयोग होता है.

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