Breaking News
  • Breaking News Will Appear Here

भारत के मौजूदा लोकतंत्र में राष्ट्र ध्वज में लपेटा जाता है क़ातिल का शव: रूप रेखा वर्मा

 Sabahat Vijeta |  2016-10-24 10:40:26.0

rooprekha-varma


अखिलेश मिश्र स्मृति राष्ट्रीय परिसंवाद में बुद्धिजीवियों ने प्रकट किये अपने विचार


लखनऊ. मौजूदा समय में देश में लोकतंत्र की दशा बेहद दयनीय है. हम ऐसे लोकतांत्रिक देश के नागरिक है, जहां पर गौकशी के नाम पर एक व्यक्ति अखलाक की पीट-पीट कर हत्या कर दी जाती है. कुछ दिन बाद अखलाक के एक हत्यारे की मृत्यु होती है तो लोग उसके शव को राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे में लपेटा जाता है. यह कृत्य राष्ट्र ध्वज और लोकतंत्र दोनों का अपमान है. यह विचार आज लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति प्रो. रूपरेखा वर्मा ने अखिलेश मिश्र स्मृति राष्ट्रीय परिसंवाद में ‘भारतीय लोकतंत्र के इस मुश्किल दौर में ...’ विषय पर आयोजित परिसंवाद की अध्यक्षता करते हुए व्यक्त किये. यह कार्यक्रम एकेडमी आॅफ रिसर्च, ट्रेनिंग ऐंड हयूमेन एक्शन (अर्थ) और अखिलेश मिश्र ट्रस्ट (अमिट) की ओर से आयोजित किया गया था.


प्रो. रूपरेखा वर्मा ने कहा कि देश के वर्तमान लोकतंत्र में जनता और जनप्रतिनिधि के बीच कुछ ‘दलाल’ जैसे लोग स्थापित हो गये हैं. उन्होने कहा कि बहुसंख्यक हिन्दुओं को खुश करने के चक्कर में अल्पसंख्यक मुसलमानों की परेशानियों को सियासी दल नहीं सुन रहे हैं. उनको डर है कि अगर हमने मुसलमानों का पक्ष लिया तो हिन्दु हमसे नाराज़ हो जायेंगे. रूपरेखा वर्मा ने देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्यायपालिका की भूमिका पर भी प्रश्न चिन्ह लगाये. उन्होंने कहा कि न्यायालय को 2002 गुजरात दंगों के सम्बन्ध में अमित शाह और वहां के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं मिले और उन्हे बरी कर दिया गया. अब प्रश्न यह उठता है कि साक्ष्य न मिलना अलग बात है, न्यायालय कम से कम इनसे यह तो पूछ सकता था कि आप सत्ता में थे आपने जनता की सुरक्षा के लिए क्या किया?


उन्होंने कहा कि एक राजनीतिक दल द्वारा हिन्दु सभ्यता का बखान किये जाने पर उन्होंने कहा कि हिन्दु धर्म तो प्रारम्भ से ही वर्णों के अलावा न जाने कितने भागों में बंटा रहा है. इस धर्म में वर्णों के अंदर जातियों और जातियों के अन्दर भी न जाने कितनी उपजातियों का वर्गीकरण किया गया है. किसी राजनीतिक दल का नाम लिये बिना उन्होंने कहा कि लालकृष्ण आडवाणी पाकिस्तान जाकर जिन्ना की कब्र पर फूल चढ़ाते हैं और जी खोलकर उनकी तारीफ करते हैं लेकिन भारत का एक आम नागरिक अगर ऐसा कर ले तो उस पर देशद्रोह का मुक़दमा चलाया जाता है. यह कैसा लोकतंत्र है? देश के एक मंत्री महेश शर्मा कहते है कि ‘‘एपीजे अब्दुल कलाम हालांकि मुसलमान थे लेकिन उन्होंने रक्षा के क्षेत्र में भारत को अपना अतुलनीय योगदान दिया है.’’यह मंत्री महोदय ‘...हालांकि मुसलमान...’ कहकर आखिर क्या जताना चाहते है. यही भारतीय लोकतंत्र का मौजूदा मुश्किल दौर है.


परिसंवाद में अपने प्रो. अपूर्वानंद ने कहा कि देश में पिछले कुछ सालों से लगातार एक धर्म विशेष द्वारा दूसरे धर्म और दलित जाति के लोगों को प्रताड़ित किया जा रहा है. कोई भी सियासी दल इन प्रताड़ित लोगों की न सामने आकर मदद करते है न ही उनका संरक्षण करते हैं. उनको डर है कि ऐसा करने से कहीं एक धर्म विशेष या वर्ग विशेष का वोटर उनसे नाराज़ न हो जाएँ. अपूर्वानंद ने अपनी बातों के साक्ष्य के रूप में देश में घटित हुई अनेक घटनाओं का वर्णन किया. उन्होंने कहा कि अगर ऐसा ही रहा तो भारतीय जनतंत्र को इसके दुष्परिणामों को भुगतना पड़ेगा. अपूर्वानंद ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि भारतीय राजनीति की आज की कठिनाई यह है कि मुसलमानों का अकेलापन बढ़ता जा रहा है. उनका पक्ष लेने वाले व्यक्तियों पर चौतरफा हमले हो रहे हैं.


प्रो. सुहेल हाशमी ने कहा कि ‘भारत’ की एक नई परिभाषा विकसित की जा रही है. यहां के शासकों को आक्रमणकारी बताया जा रहा है. कहा जा रहा है कि भारत में आर्यों का आगमन हुआ था, बाकी सब आक्रमणकारी थे. सरकार देश के दलितों, मुस्लिमों, अल्पसंख्यकों, आदिवासियों और अन्य लोगों से मुख्य धारा में जुड़ने के लिए कह रही है. आखिर यह कौन सी मुख्य धारा है जिसमें देश के ये सब लोग नहीं हैं.


प्रभात पटनायक ने अपने उद्बोधन में कहा कि मैं दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से जुड़ा रहा हूँ. मौजूदा लोकतंत्र का मुश्किल दौर यह है कि यहां का एक छात्र नजीब अहमद पिछले कई दिनों से लापता है. हमारा सरकारी अमला और पुलिस उसे ढूंढ नहीं पा रहा है. यहां के छात्रों को अफज़ल गुरू के पक्ष में आवाज़ उठाने पर न जाने क्या-क्या झेलना पड़ता है.


इससे पहले कार्यक्रम में प्रो. बद्री नारायण ने भी भाषण दिया. परिसंवाद का संचालन प्रो. रमेश दीक्षित ने किया. इस दौरान श्री दीक्षित ने कहा कि देश को ऐसी दिशा में ले जाया जा रहा है, जहां का रास्ता बेहद खूनी है. उन्होंने कहा कि 1947 में विभाजन के दौरान महात्मा गांधी उपवास कर रहे थे. उनसे पूछा गया कि आप ऐसा क्यों कर रहे है, आपका ऐसा करना आपके मुसलमानपरस्त होने का सबूत देता है. गांधी जी ने उत्तर दिया कि हां मै मुसलमानपरस्त हूँ, मेरे एक अफ्रीकी मित्र ने मुझे शिक्षा दी है कि बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक आपने-सामने हो तो तुम अल्पसंख्यक का साथ दो और मै वही कर रहा हूँ. मेरा यह उपवास पाकिस्तानी हिन्दुओं और भारतीय मुसलमानों के लिए हैै.कार्यक्रम में बढ़ी संख्या में शहर के साहित्यकार, लेखक, समाजसेवी, बुद्धिजीवी और आम लोग मौजूद थे.

Tags:    

  Similar Posts

Share it
Share it
Share it
Top