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सिंधु जल संधि रद्द करने में मोदी को इन मुश्किलों का करना पड़ेगा सामना

 Vikas Tiwari |  2016-09-23 17:06:32.0

सिंधु जल संधि

तहलका न्यूज़ ब्यूरो

नई दिल्ली. पिछले रविवार को तड़के उड़ी में सेना के शिविर पर हुए आतंकी हमले और उसमें पाकिस्तान की भूमिका बाद पड़ोसी देश के साथ तनाव चरम पर है. कयास लगाया जा रहा है कि हमले के खिलाफ जबावी कार्रवाई करते हुए केंद्र में बैठी बीजेपी सरकार सिंधु जल संधि रद्द कर सकती है.

दोनों देशों के बीच तीन युद्धों के बावजूद यह संधि बनी रही है. हालांकि, गुरुवार को भारत ने इस मुद्दे को उठाया, कहा कि कोई भी संधि दोनों पक्षों के बीच 'आपसी सहयोग और विश्वास' पर ही टिकी होती है. लेकिन, यह किसी वास्तविक खतरे की तुलना में दबाव बनाने की रणनीति ज्यादा प्रतीत होती है. ऐसा भारत पहले भी कह चुका है. अगर भारत इसे रद्द करेगा तो दुनिया के शक्तिशाली देश इसकी आलोचना करेंगे क्योंकि यह समझौते कई मुश्किल हालात में भी टिका रहा है.


दोनों देशों के बिना किसी बड़े विवाद के इस संधि के तहत पानी का बंटवारा चलता रहा है. लेकिन, विशेषज्ञों का कहना है कि इस समझौते से भारत को एकतरफा नुकसान हुआ है और उसे छह सिंधु नदियों की जल व्यवस्था का महज 20 फीसदी पानी ही मिला है. पाकिस्तान ने इसी साल जुलाई में भारत द्वारा झेलम और चिनाब नदियों पर जल विद्युत परियोजनाओं का निर्माण करने तैयारी की आशंका में अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता की मांग की थी. हालांकि, इस समझौते को सबसे सफल जल बंटवारे समझौतों में से एक के रूप में देखा जाता है लेकिन अब दोनों दक्षिण एशियाई पड़ोसियों के बीच मौजूदा तनाव में यह समझौता टूटने की आशंका पैदा हो गई है. सामरिक मामलों और सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य के युद्ध पानी के लिए लड़े जाएंगे.

कुछ विशेषज्ञों ने कहा है कि यदि भारत 'पश्चिमी नदियों' के पानी का भंडारण शुरू कर दे (संधि के तहत जिसकी इजाजता है, भारत 36 लाख एकड़ फीट का इस्तेमाल कर सकता है) तो पाकिस्तान के लिए कड़ा संदेश होगा। पाकिस्तान इस मामले में भारत द्वारा कुछ करने की आहट से ही अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता के लिए दौड़ पड़ता है। इससे उस पर काफी दबाव पड़ेगा।

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