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योगी सरकार के इस फैसले से शुरू हो सकते हैं किसानों के बुरे दिन

 Avinash |  2017-03-22 10:54:22.0

योगी सरकार के इस फैसले से शुरू हो सकते हैं किसानों के बुरे दिन

तहलका न्यूज़ ब्यूरो
लखनऊ. उत्तर प्रदेश में योगी युग शुरू हो गया है. प्रदेश के नए मुख्यमंत्री भी पीएम मोदी की ही तरह 'मैन इन एक्शन' की तर्ज पर काम का रहे हैं. वहीँ योगी के शपथ ग्रहण के के बाद से ही प्रशासनिक अफसरों ने अवैध बूचड़खाने बंद करने की मुहिम शुरू कर दी है, जिससे बूचड़खाने से जुड़े व्यापारियों में हडकंप मचा हुआ है. हालाँकि योगी सरकार ने अभी तक अधिकारिक तौर पर कत्लखानों के संबंध में कोई आदेश जारी नहीं किया है. लेकिन अधिकारी सरकार की मंशा को भांपते हुए अलीगढ़, मेरठ, संभल, मथुरा, आगरा, कानपुर में कई बूचड़खानों को बंद करा चुके हैं.
दरअसल बीजेपी ने विधानसभा चुनाव के दौरान बूचड़खाने को बंद करने का वादा किया था. विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में भी अवैध और यांत्रिक बूचड़खानों को बंद करने की बात कही थी. एक दिन पहले भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता श्रीकांत शर्मा ने भी एक समाचार पत्र को दिए अपने बयान में कहा है कि जल्द ही अवैध और यांत्रिक बूचड़खाने बंद किए जाएंगे. बता दें यही वजह है कि रविवार को जैसे ही योगी ने सीएम पद की शपथ ली उसके बाद बूचड़खानों पर अधिकारीयों ने ताला जड़ना शुरू कर दिया. लेकिन वैध और अवैध तरीके से हो रहे 535 करोड़ रुपये रोज के मीट कारोबार को बंद करना इतना आसान नहीं है. योगी सरकार को कई बड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ेगा.

उल्लेखनीय है कि देश में यूपी भैंस के मीट का सबसे बड़ा निर्यातक है. एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में लगभग 40 बूचड़खाने वैध हैं. ये वो बूचड़खाने हैं जिन्हें केंद्र सरकार की एग्रीकल्चरल एंड प्रोसेस्ड फूड प्रॉडक्ट्स एक्सपोर्ट डवलपमेंट अथॉरिटी (APEDA) से बाकायदा लाइसेंस मिला हुआ है. जबकि अवैध बूचड़खानों की संख्या साढ़े तीन सौ से ज्यादा है.


बढ़ेगी बेरोजगारी
उत्तर प्रदेश में रोजाना अवैध मीट का कारोबार लगभग 60 करोड़ रुपये का है. वहीँ प्रदेशभर में 250 लाइसेंसधारी छोटी इकाई 475 करोड़ रुपये रोज का कारोबार करती हैं. अवैध मीट कारोबार में कत्लखानों से जुड़े मजदूरों की संख्या करीब 12 हजार है. जबकि लाइसेंस वाले कत्लखानों में 38 हजार दिहाड़ी मजदूर काम करते हैं. दिहाड़ी मजदूरों को अनुमानित 300 रुपये रोजाना मजदूरी मिलती है. अब अगर कत्लखानों को बंद किया जाता है तो लगभग 50 हजार से अधिक मजदूर बेरोजगार हो जाएंगे.

किसान भी होंगे प्रभावित
कत्लखानों को बंद करने से सिर्फ व्यापारी ही प्रभावित नहीं होंगे. बल्कि किसानों की भी परेशानी बढ़ेगी. बता दें कि ऐसे जानवर जो दूध नहीं देते उन्हें पालना गरीब किसानों के लिए बड़ा मुश्किल है, ज्यादातर किसान दुधारू और खेती किसानी में काम आने वाले जानवरों को ही पालना पसंद करते हैं. गौरतलब है कि 2012 के पशुधन जनसंख्या के मुताबिक, 2007 की तुलना में भैंसों की संख्या में 28 प्रतिशत और गायों की संख्या में 10 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है.

चमड़ा उद्योग को होगा भारी नुकसान
यूपी का चमड़ा देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी फेमस है, प्रदेश के दो महानगर कानपुर और आगरा चमड़े उद्योग के प्रमुख केंद्र हैं. कानपुर से करीब हर साल 12 अरब डॉलर का चमड़े का सामान विदेशों को निर्यात किया जाता है. इतना ही नहीं देशभर में कच्चा चमड़ा भी कानपुर से ही भेजा जाता है. लेकिन यहाँ वैध कत्लखानों की संख्या सिर्फ 6 है जबकि अवैध कत्लखानों की संख्या करीब 50 है. अब यदि इनको बंद किया जाएगा तो सूबे में चमड़ा उद्योग भी समाप्त हो जाएगा.

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