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सुरक्षित सीटों ने बनाया भाजपा का विजय पथ

 shabahat |  2017-03-11 10:02:39.0

सुरक्षित सीटों ने बनाया भाजपा का विजय पथ


तहलका न्यूज़ ब्यूरो

लखनऊ. उत्तर प्रदेश की राजनीति में सत्ता की सीढ़ी चढ़वाने में अल्पसंख्यक बाहुल्य और सुरक्षित सीटें सबसे अहम किरदार निभाती हैं. जो भी राजनीतिक दल इन सीटों पर अपने प्रत्याशी जिता ले जाता है हुकूमत उसी की बन जाती है. यूपी में 130 सीटें अल्पसंख्यक बाहुल्य हैं और 85 आरक्षित सीटें हैं. यह 215 सीटें परिणाम देने वाली सीटें हैं.

भारतीय जनता पार्टी ने 1991 में अल्पसंख्यक बाहुल्य इलाकों में 76 और सुरक्षित की गईं 50 सीटें जीती थीं और प्रदेश में भाजपा की सरकार बन गई थी. 2007 के चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने अल्पसंख्यक बाहुल्य इलाकों की 59 सीटें जीतीं और सुरक्षित की गई सीटों में से 62 सीटों पर कब्ज़ा किया और सरकार बना ली. 2012 के चुनाव में अल्पसंख्यक बाहुल्य इलाके की 78 सीटें समाजवादी पार्टी के खाते में आ गईं और सुरक्षित की गई 59 सीटों पर भी समाजवादी पार्टी का क़ब्ज़ा हो गया और सूबे में समाजवादी पार्टी की सरकार बन गई.

उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के लिये हालांकि सुरक्षित सीटों पर जीत पाना बहुत चुनौती की बात होती है क्योंकि भाजपा का चेहरा या तो राम मंदिर के नाम पर पहचान रखता है या फिर उसे साम्प्रदायिक पार्टी के रूप में देखा जाता है. लेकिन जब भी भाजपा सुरक्षित सीटों पर जीत दर्ज करती है उसकी सरकार बनती है. इस विधानसभा चुनाव में भी सुरक्षित सीटों ने भाजपा के लिये प्रचंड बहुमत का रास्ता तैयार किया है.

सुरक्षित सीटें विधानसभा के लिये ही नहीं लोकसभा चुनाव में भी फैसलाकुन साबित होती हैं. भाजपा ने जब-जब यूपी की सुरक्षित सीटों पर कब्ज़ा किया है उसे केन्द्र में भी सत्ता का स्वाद मिला है. 1996 के लोकसभा चुनाव में 18 सुरक्षित सीटों में से 14 सीटें जीतकर सत्ता का मज़ा लिया था. हालांकि अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बनी सरकार बहुमत साबित नहीं कर पायी थी.

भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव तक इस गणित को अच्छी तरह से समझ लिया था. इसी वजह से उसने यूपी में तीन जाटव, दो खटिक और कोरी, खरवार, कठेरिया, नट और निषाद बिरादरी से एक-एक प्रत्याशी को मैदान में उतारा. भाजपा ने 2014 में सुरक्षित सीटों को जितनी अच्छी तरह से समझा उतना तो बहुजन समाज पार्टी भी नहीं समझ पायी.

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