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किसानो की सीएम अखिलेश से अपील, जीएम फासलो के ट्रायल रोकने में मदद करे

 Tahlka News |  2016-09-12 14:24:04.0

तहलका न्यूज ब्यूरो 

लखनऊ. देश एवं प्रदेश के नागरिकों के स्वास्थ्य, किसानों के बीज स्वावलंबन एवं जैविक खेती की रक्षा हेतु संशोधित जीन वाली (जीएम) सरसों के किसी भी रूप में उत्तर प्रदेश में स्वीकृति न दिये जाने के सम्बन्ध में भारतीय किसान यूनियन ने यूपी के सीएम अखिलेश यादव को एक पत्र लिखा है.

भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने अखिलेश यादव को लिखा है कि देश के सबसे बड़े राज्य के रूप में उत्तरप्रदेश एवं यहाँ की सरकार की देश के विकास की दशा और दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका रहती है. आप के नेतृत्व में किसान एवं जन हितैषी राज्य सरकार ने जीएम फसलों के खतरे को पहले ही भांप लिया है और राज्य में जीएम फसrakesh tikait

लों के क्षेत्र परीक्षण तक की अनुमति नहीं दी। अधिकांश अन्य राज्य सरकारों, जिन में सरसों बोने वाले मुख्य राज्य राजस्थान, मध्यप्रदेश एवं हरियाणा भी शामिल हैं, ने भी जीएम फसलों के खेत परीक्षण तक की अनुमति नहीं दी है। समाजवादी पार्टी पूर्व से ही इन फसलों के विरोध में रही है, आपके द्वारा भी पूर्व में इन फसलों को अनुमति न दिये जाने का आश्वासन किसान संगठनों को दिया जाता रहा है.

केंद्रीय वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी (जीईएसी) संशोधित जीन वाली जीएम सरसों को अनुमति देने की ओर तेजी से अग्रसर है. पिछले वर्ष 2010 में इस कमेटी द्वारा बीटी बैंगन को अनुमति दिये जाने के बाद इसी मंत्रालय द्वारा बीटी बैंगन पर अनिश्चित काल के लिए प्रतिबंध लगाया था, जो अब तक जारी है यानी कि 6 साल गुजर जाने के बाद भी इस की सुरक्षा स्थापित नहीं हुई है.

राकेश टिकैत ने अखिलेश यादव से अपील की हैं कि भारतीय किसान यूनियन ने यह तय किया है कि किसान एवं जन विरोधी जीएम सरसों का पुरजोर विरोध किया जाए. आप से भी हम पूरे समर्थन बल्कि इस संघर्ष में नेतृत्व की आशा करते हैं.

किसान नेता ने इस बात को भी संदर्भित लिया है कि एक मात्र जीएम फसल जिस की अनुमति अब तक देश में दी गई है, बीटी कपास का हश्र देश के सामने हैं। जहाँ एक ओर बीटी कपास के आने के बाद सदियों से चली आ रही देसी किस्मों की शुद्धता चंद वर्षों में लगभग खत्म हो गई, बाजार में कपास का शुद्ध गैर-बीटी बीज मिलना दूभर हो गया, वहीं चंद वर्षों में ही पहले बीटी कपास एक, फिर बीटी कपास दो और अब बीटी कपास तीन लाने की नौबत आ गई है। जिस तकनीक से उत्पन्न बीज चंद सालों में खत्म हो जाते हैं, बीज शायद उतने साल भी नहीं चलते जितने साल उन्हें विकसित करने में लगते हैं, कोई सरकार किस प्रकार उस तकनीक पर विश्वास कर के सरसों जैसे रोजमर्रा के खाद्य उत्पाद, में जीएम बीज लाने की सोच सकती है?

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