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तमाशो भरे बनारस में आखिर क्यों हैं मोदी फिक्रमंद

 Utkarsh Sinha |  2017-03-07 10:53:13.0

तमाशो भरे बनारस में आखिर क्यों हैं मोदी फिक्रमंद

उत्कर्ष सिन्हा

लखनऊ. कहते हैं काशी तीनो लोक से अलग बसी हुयी है, इसका मिजाज भी दुनिया से अलग ही रहता है.,सातवे चरण का प्रचार थमने के पहले के चार दिन तक देश भर की निगाहें बनारस पर जा टिकी थी. एक के बाद एक रोड शो और दो दर्जन केंद्रीय मंत्रियों के साथ भजपा नेतृत्व का पूरा अमला बनारस में कैम्प कर गया था. यूपी के 403 विधानसभा सीटो में बनारस की महज 8 सीटें अचानक इतनी महत्वपूर्ण आखिर क्यों हो गयी कि भारतीय राजनीति के सबसे बड़े ब्रांड नरेन्द्र मोदी को बनारस में टिकना पड़ा.

दरअसल बनारस के मिजाज और सियासी हालत ने नरेन्द्र मोदी को इस बात के लिए मजबूर कर दिया कि वे अपनी संसदीय सीट पर एक बार फिर उस दबंगई से छा जाए जैसा 2014 में हुआ था. तब मोदी के सपने ने उन्हें एतिहासिक जनसमर्थन दिलाया था और पूरी काशी मोदीमय हो गयी थी. मगर बीते ढाई साल में पीएम के विकास के सपने की मंथर गति और बनारस की बहाली ने बनारसियों का मूड बदल दिया. "माँ गंगा ने मुझे बुलाया है" जैसे भावुक बयांन भी सियासी जुमले सरीखे लगाने लगे क्यूंकि मोदी की महत्वाकांक्षी "नमामि गंगे" परियोजना कागजो से बाहर निकल ही नहीं पायी. काशी को क्योटो बनाने का सपना भी परवान नहीं चढ़ा और बुनकरों की हालत भी जस की तस रही बल्कि सूरत के साडी उद्योग ने बनारस को अपने चपेट में ले लिया. बनारस की गद्दियों का अनुपातिक संतुलन बदलने लगा और गुजरती व्यापारी बनारसी व्यापारियों पर भारी पड़ने लगे.

मोदी समर्थक इसका दोष प्रदेश सरकार पर मढ़ते हैं. समर्थको का कहना है कि राज्य सरकार ने केंद्र का सहयोग नहीं किया इसलिए बनारस बदल नहीं सका मगर कई योजनायें जिनमें राज्य की कोई भूमिका नहीं थी उसके भी आगे न बढ़ने की वजह ये समर्थक नहीं बता सके. वोटरों की नाराजगी के अलावा भाजपा के सहयोगियों के प्रभाव का टेस्ट भी इसी वनारस में होना है.

मोदी के अलावा अनुप्रिया पटेल की साख भी इस बार दांव पर है. लोकसभा चुनावो के पहले अनुप्रिया पटेल के नेतृत्व में अपना दल का गठबंधन भाजपा के साथ हुआ और उसके बाद अनुप्रिया पटेल की राजनैतिक हसियत भी अचानक ही बढ़ गयी. केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने के बाद अनुप्रिया को और भी महत्त्व मिला और विधानसभा चुनावो के दौरान अनुप्रिया न सिर्फ गठबंधन का बड़ा चेहरा रही बल्कि वोटो के जातीय गणित में भी अनुप्रिया का बड़ा महत्व रहा. अनुप्रिया को स्टार प्रचारक भी बनाया गया और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष केशव मौर्या के बाद सबसे ज्यादा चुनावी सभाएं भी अनुप्रिया पटेल ने ही की., मगर 2012 के विधानसभा चुनावो में वाराणसी की रोहनिया सीट से विधायक बनी अनुप्रिया खुद संसद बनने के बाद उपचुनावों में इस सीट को बचा नहीं सकी. अनुप्रिया को साथ रख भाजपा ने प्रभावी कुर्मी वोटो को अपने पाले में करने की योजना बनायीं थी. वाराणसी में भी कुर्मी वोटरों की तादात बहुत ज्यादा है मगर केंद्र में मंत्री बनने के बाद अपने परिवार में हुयी टूट के बाद अनुप्रिया कितनी प्रभावी रह गयी हैं इसका फैसला भी बनारस करेगा. रोहनिया सीट से इस बार अनुप्रिया की माँ कृष्णा पटेल भी बतौर निर्दल उम्मीदवार कड़ी है. ऐसे में अनुप्रिया पटेल की साख भी दाव पर है.
नरेन्द्र मोदी की चिंता बनारस भाजपा में हुआ आतंरिक विद्रोह भी है. कई सीटो पर टिकट काटने के बाद भाजपाई बागी हो कर चुनाव मैदान में हैं. वरिष्ठ नेता और 6 बार के विधायक श्यामदेव राय चौधरी भी टिकट काटने से खफा है. हालाकि उनकी नाराजगी दूर करने के लिए अमित शाह भी मेंहनत करते रहे तो वही अपने रोड शो में खुद मोदी भी उन्हें अपने साथ ले कर चले.

नरेन्द्र मोदी और उनकी टीम ने आखिरी चरण के मतदान के आखिरी दिनों में अपनी पूरी ताकत झोंकी है , यूपी चुनावो के कुल परिणामो के साथ वाराणसी के नतीजे भी ब्रांड मोदी को प्रभावित करेंगे. बनारस का मिजाज इस मेहनत के बाद कितना बदला है ये तो 11 मार्च को ही पता चलेगा.

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Utkarsh Sinha ( 394 )

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