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नतीजो के बाद फिर बढेगा सपा में संग्राम

 Utkarsh Sinha |  2017-03-12 06:07:16.0

नतीजो के बाद फिर बढेगा सपा में संग्राम

तहलका न्यूज ब्यूरो

लखनऊ. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की भारी असफलता के बाद पार्टी के अंदरखाने में बड़ी हलचल के संकेत आने लगे है. दरअसल अब असफलता का सारा ठीकरा अखिलेश के सर पर फोड़ने की तैयारी है. इस बात की भी बड़ी संभावना है कि जो लोग बीते कल अखिलेश के साथ दिखाई दे रहे थे , वे आने वाले कल चाचा शिवपाल के साथ दिखाई देंगे, पापा-मम्मी से लेकर चाचा तक. तो कई कांग्रेस-सपा के गठबंधन को भी जिम्मेवार बताएंगे. ये सब बातें तो होंगी ही लेकिन जो संकेत मिल रहे हैं उनसे यही लगता है कि कहीं पार्टी का विघटन की तरफ न बढ़ जाए. चुनाव बाद नयी पार्टी बनाने का एलान करने वाले चाचा शिवपाल यादव अब भतीजे अखिलेश यादव को कोई मौका नहीं देंगे. जो मुलायम सिंह के लिए भी एक धर्म संकट पैदा करेगा.

मुलायम सिंह यादव की दूसरी पत्नी साधना यादव ने कुछ दिन पहले ही मीडिया के सामने आकर अपनी सियासी महत्वाकांक्षाओ को प्रकट कर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पर बड़ा हमला बोल चुकी हैं. साधना गुप्ता ने कहा था कि उन्होंने मुलायम के न चाहने से खुद तो राजनीति में आने से इंकार किया लेकिन वह चाहती हैं कि उनका बेटा प्रतीक यादव राजनीति में आकर सांसद बने. अब साधना पार्टी में अखिलेश विरोधियों के लिए एक ठिकाना, एक छत की भूमिका अदा कर सकती हैं. संकेत आजम खान भी दे चुके हैं. एग्जिट पोल देखने के बाद आजम खान ने नतीजे आने से पहले ही हार का ठीकरा जनता पर फोड़ दिया. आजम ने कहा कि अगर राज्य में उनकी पार्टी हारती है तो इसके लिए अकेले मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जिम्मेदार नहीं होंगे. आजम खान ने कहा, कि अगर विधानसभा चुनावों में सपा हारती हैं तो इसका ठीकरा अखिलेश के सिर नहीं बल्कि जनता पर फोड़ा जाना चाहिए. आजम ने यहां तक कह दिया कि अगर उनकी पार्टी हारी और प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी तो इसका खामियाजा जनता भुगतेगी.

आजम ने तो जनता के सिर ठीकरा तो फोड़ दिया लेकिन पार्टी की हार का ठीकरा किसके सर फूटेगा ये तो वक्त बतायेगा.

इसी बीच समाजवादी पार्टी के मंत्री और राजधानी लखनऊ मध्य से हारे प्रत्याशी रविदास मेहरोत्रा ने सपा-कांग्रेस गठबंधन पर बयान दिया उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी को गठबंधन का कोई फायदा नहीं हुआ. समाजवादी पार्टी अकेले सरकार बना सकती थी इसलिए अखिलेश को चुनाव में अकेले जाना चाहिए था. चाचा शिवपाल 11 मार्च के बाद नई पार्टी बनाने की बात पहले ही कर चुके हैं. हालांकि बाद में उन्होंने इसका खंडन भी कर दिया था. लेकिन यह तय है कि अखिलेश के लिए मार्च माह कुछ ठीक ठाक नहीं रहने वाला है. बुआ की गोद पसंद करने वाले बबुआ की मदद अब बुआ भी नहीं कर सकती हैं.
समाजवादी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पार्टी के मुखिया के रूप में जब अपनी नयी सियासी सफ़र को शुरू किया था तब उनको इस तरह के परिणाम का अंदाजा नहीं था कि ऐसा भी होगा कि जहां 2012 के चुनाव में 224 सीट पाने वाली समाजवादी पार्टी को 2017 के इस चुनाव में केवल 50 से 60 सीटों पर संतोष करना पड़ेगा. 17वीं विधानसभा के इस चुनाव में गठबंधन के बाद कुल 403 सीटों में से समझौते के तहत समाजवादी पार्टी 298 और कांग्रेस 105 सीट पर चुनाव मैदान में थी.
जनवरी 29 को जब राहुल गाँधी और अखिलेश यादव यूपी चुनावो के लिए गठबंधन करने के बाद पहली बार साझा प्रेस कन्फ्रेसं में एक साथ दिखे तो उसमे जवानी का जोश भी था और गठबंधन की गर्मजोशी भी.

राहुल और अखिलेश दोनों ही इस चुनाव को खुद बनाम मोदी बनाना चाहते थे और आने वाले दिनों में इस गठबंधन के निशाने पर मोदी ज्यादा और मायावती कम थीं. गठबंधन के रणनीतिकारो को लगता है कि वे अगर चुनाव को मोदी बनाम गठबंधन का सीधा मुकाबला बना कर मुस्लिम वोटरों को अपनी तरफ खींचने में कामयाब रहेंगे. लेकिन यह गठबंधन भी कुछ कारगर साबित नहीं हुआ. 2012 में 28 सीट पाने वाली कांग्रेस इस बार दो दहाई भी नहीं पहुँच सकी वहीं सरकार बनाने का दावा करने वाली सपा लगभग केंद्र में कांग्रेस की तरह एक यहाँ एक मजबूत विपक्ष भी नहीं बन सकी. वैसे इस गठबंधन से कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं था जबकि समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव का भविष्य दांव पर था.

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