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अब सामने आ रहा है अखिलेश का "नावेल्टी फैक्टर"

 Utkarsh Sinha |  2017-01-23 14:15:04.0

अब सामने आ रहा है अखिलेश का नावेल्टी फैक्टर


उत्कर्ष सिन्हा

लखनऊ. पहले समाजवादी पार्टी पर नियंत्रण और उसके बाद कांग्रेस से मनचाहा समझौता अखिलेश की सियासत का नया अंदाज भी है और उनकी परीक्षा का प्रश्नपत्र भी. जिस तरह से पहले प्रत्याशियों की घोषणा अखिलेश ने की और उसके बाद कांग्रेस से समझौते में अपने प्रत्याशियों को हटाया , फिर विजय मिश्र जैसे कई पुराने दबंग समाजवादी विधायको का टिकट निर्ममता से काटा उसने एक बात फिर से साबित की है कि अखिलेश अपनी जिद पर कायम रहते हैं और उसके लिए कीमत चुकाने को भी तैयार.

अखिलेश यादव के इस नयी सियासत को वरिष्ठ पत्रकार अम्बिका नन्द सहाय "नावेल्टी फैक्टर" कहते हैं. BBC के एक खबर में सहाय इसे समझाते हैं- "विद्रोह के बाद अखिलेश यादव में नॉवेल्टी फ़ैक्टर आया है और वो नए तेवरों के साथ मैदान में उतरे हैं और कांग्रेस गठबंधन को वो वोटरों में भुना सकते हैं. चुनाव में नॉवेल्टी फैक्टर बहुत महत्वपूर्ण होता है. जयललिता को याद कीजिए कि कैसे वो नॉवेल्टी फ़ैक्टर के साथ चुनाव में आईं. चंद्रबाबू नायडू ने बगावत की और पार्टी को अपने कब्ज़े में किया. आज वैसी ही स्थिति अखिलेश की है. नोटबंदी के बाद भाजपा के ब्राह्मण और बनिया वोट अखिलेश की ओऱ मुड़ने लगे थे. कांग्रेस के साथ आने से उसमें तेज़ी आएगी."

अखिलेश यादव युवा है और स्वाभाविक रूप से बागी भी. समाजवादी पार्टी के अंदरूनी झगड़े ने यह दिखाया था कि अपनी बगावत में वे किस हद तक जा सकते हैं. अखिलेश को अंदाजा है कि उनका यह बागी रुख युवाओं को भी आकर्षित करता है. इसलिए वे पीछे नहीं मुडे. पार्टी से बर्खास्त समर्थको को अखिलेश ने हमेशा अपने साथ सार्वजनिक मंचो पर भी रखा. इसी बात ने उन्बके समर्थको का भरोसा और भी बढाया.

जिस तरह 2012 के चुनावो में अखिलेश ने डीपी यादव को दबंग राजनीति के खिलाफ अपना प्रतीक बनाया था उसकी जगह इस बार पहले बाहुबली अतीक अहमद ने ली. हलाकि कुछ समय पहले मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल के विलय पर अखिलेश जिस तरह के तेवर दिखा रहे थे , वह फिलहाल मुख्तार की पार्टी के लिए नरम हैं , मगर मुख़्तार अंसारी के टिकट पर अभी संशय बरक़रार है. अतीक अहमद ने भी हवा के रुख को भांपा और खुद ही पीछे हट गए. अतीक के बाद नंबर भदोही के बाहुबली विजय मिश्र का आया. वोटरों पर अच्छी पकड़ होने के बावजूद अखिलेश ने उनका टिकट काट दिया. विजय मिश्र भी अब निर्दलीय या फिर किसी अन्य दल से चुनाव लड़ने के फिराक में हैं मगर अखिलेश यहाँ भी वोटो का नुकसान होने का जुआ खेल गए.

अखिलेश यादव ने जिस तरह कांग्रेस से हाँथ मिलाया है वह उसे वक्त की जरुरत बता रहे हैं , हांलाकि यह अखिलेश की सियासी मजबूरी भी कही जा सकती है. लेकिन इसके जरिये अखिलेश ने अपनी पार्टी के संभावित भितरघात से काटने वाले वोट प्रतिशत की भरपाई करने की कोशिश की है और साथ होई बिखरते मुस्लिम वोटो का एक बड़ा हिस्सा खुद के साथ जोड़ने की भी. इसके लिए सहारनपुर जैसे अपने मजबूत इलाके को लगभग पूरी तरह कांग्रेस के हांथो में सौप भी दिया है.


अखिलेश राहुल की कमजोरी भी समझने लगे हैं. प्रदेश में 27 साल से हाशिये पर पड़ी कांग्रेस को इस गठबंधन से भले ही संजीवनी मिलेगी और सरकार बनने की स्थिति में उसे सत्ता में भागीदारी भी मिल सकती है , मगर यदि यह गठबंधन चुनावी रण में जीता जाता है तो अखिलेश की राष्ट्रीय छवि बनेगी और वे सबसे बड़े राज्य के मुखिया होने के साथ साथ राष्ट्रीय राजनीति में नरेन्द्र मोदी के खिलाफ सबसे बड़ा चेहरा बन जायेंगे. राहुल गाँधी अपने तमाम प्रयासों के बावजूद वह स्पार्क नहीं पैदा कर सके हैं जो उन्हें मोदी विरोध की धुरी बना सके.

बिहार चुनावो ने यह दिखा दिया था कि यदि कोई गठबंधन मजबूत नेतृत्व में लडे तो भाजपा की राहें किस कदर मुश्किल हो सकती है. अखिलेश यादव ने इसी फार्म्युले पर दांव खेला है. भाजपा की जातीय गुणा गणित के के सामने वे अपने कोर वोट के साथ विकास की चुनौती सामने लायेंगे. मुद्दा होगा 5 साल का "विकास" बनाम मोदी के "विकासवादी सपने" . नोटबंदी के मार से तंग मजदूर तबका भी अखिलेश की रणनीति का हिस्सा होगा. रोजगार ख़त्म होने के बाद गाँव में लौटे बेरोजगारों की फ़ौज मोदी मैजिक के खिलाफ होगी और अखिलेश इसे लहर बनाने की कोशिश भी करेंगे.

समाजवादी पार्टी का घोषणा पत्र भी इसकी ताकीद करता है, यहाँ भी अखिलेश ने जयललिता के नावेल्टी फैक्टर का अनुपालन किया है. महिलाओं के लिए प्रेसर कुकर से ले कर बच्चो के लिए हर महीने एक लीटर घी और युवाओं के लिए स्मार्ट फोन इसी उपहार राजनीति का हिस्सा है.

युवाओं को पसंद आने वाला बागी तेवर, गरीबो को मुफ्त उपहार और आधारभूत संरचना पर जोर देने के साथ उच्च माध्यम वर्ग की संतुष्टि, नामी बाहुबलियों से दूरी और पारिवारिक व्यक्ति की महिलाओं को लुभाती इमेज, तकनीकी से जुड़ता युवा ही वो काकटेल है जो अखिलेश यादव के "नावेल्टी फैक्टर" को विस्तार दे रहा है और इसी के सहारे वे हर चुनावो में इधर उधर जाने वाले 7-8 प्रतिशत फ्लोटिंग वोटो को अपनी झोली में लाने की कवायद में लगे हैं.

2017 के चुनाव नतीजों में वोटर अगर इस "नावेल्टी फैक्टर" को स्वीकार कर लेता है तो आने वाले दिनों में यूपी की सियासत का ग्रामर भी बदलने की संभावना बढ़ जाएगी.

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