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बेजुबान जानवर भी बन गए चुनावी जुमलों का हिस्सा

 Anurag Tiwari |  2017-02-21 07:56:57.0

बेजुबान जानवर भी बन गए चुनावी जुमलों का हिस्सा

अनुराग तिवारी

लखनऊ.
साल 2014 के लोकसभा के चुनावों से शुरू हुआ जानवरों के नाम का इस्तेमाल आखिरकार बिहार चुनावों से होता हुआ यूपी विधान सभा चुनावों तक आ ही पहुंचा. सोमवार को जब यूपी सीएम अखिलेश यादव ने गुजराती गधों का का नाम लिया तो पिछले चुनावों के चुनावी जुमलों की यादें ताजा हो गईं. चुनावों में राजनेताओं का एक दूसरे जुबानी हमला बोलने के लिए जानवरों के नाम का इस्तेमाल प्रचालन में है. आइये देखते हैं कब किस नेता को कौन सा विरोधी किस जानवर के रूप में दिखा.

उत्तर प्रदेश में साल 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान नेता अपनी रैलियों और रोड शो में जानवरों के सहारे मजे लेते नजर आए थे. हालांकि, पहले भी राजनीतिक दल बसपा पर निशाना साधने के लिए हाथी का इस्तेमाल करते थे, पर शेर, सांड, लकड़बग्घा, चूहा, हाथी, गधे को पहली बार चुनावी मैदान में उतारा गया था. पूरे चुनाव प्रचार में जानवरों के नाम खूब जुमले बने. इसका मजा पक्ष-विपक्ष के दोनों नेताओं ने चटखारे लेकर लिए.



शेर
सियासी बयानबाजी में शेर के इस्तेमाल की शुरुआत सीएम अखिलेश द्वारा लॉयन सफारी बनाने के साथ ही शुरू हो गई. इटावा में लॉयन सफारी बनाने के लिए गुजरात से शेर मंगवाए थे. इसके बाद नरेंद्र मोदी ने लगभग हर रैली में अखिलेश पर शेर देने का एहसान याद दिलाते रहे. मोदी ने यूपी में अपनी रैली के दौरान शेर के नाम पर खूब मजे लिए.


लकड़बग्घा
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी मोदी के शेरों का एहसान उतारने के लिए लकड़बग्घे का सहारा लिया. उन्होंने जवाब देते हुए कहा कि यदि गुजरात ने यूपी को शेर दिए हैं, तो यूपी ने भी गुजरात को लकड़बग्घे दिए हैं. सूबे में चुनाव प्रचार के दौरान दोनों राज्यों के बीच शेर और लकड़बग्घे की जंग चर्चा का विषय बनी रही.

सांड
सपा मुखिया के 12 अप्रैल को लखीमपुर में रैली करने गए थे. उनका हेलिकॉप्टर रैलीस्थल पर उतर ही रहा था कि अचानक सांड आ गया. फिर क्या था, मोदी को शेर के बाद एक और जानवर मिल गया. बोले कि यूपी में सपा मुखिया को सांड भी नहीं पसंद करता है. जो एक सांड नहीं संभाल सकता, वह यूपी क्या संभालेंगे. मुलायम ने भी इसका जवाब देने के लिए सांड को हथियार बनाया. कहा, 'हम सांड की पीठ पर बैठ चुके हैं. लखीमपुर में सांड हमारे स्वागत के लिए आया था.'

कुत्ता
अपनी हर रैली में सपा पर हमले के लिए जानवरों को याद करने वाले मोदी भी इसका शिकार हो गए. सपा नेता आजम खान ने विवादित बयान देते हुए उन्हें कुत्ते के बच्चे का बड़ा भाई तक कह डाला. आजम का यह बयान मोदी के पुराने बयान के संदर्भ में दिया गया था. उसमें मोदी ने कहा था कि यदि एक कुत्ते का बच्चा भी उनकी गाड़ी के नीचे आ जाए तो दुख होता है.

बिल्ली
बेजुबानों के सहारे अपनी राजनीति में चमकाने में भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह भी पीछे नहीं रहे. उन्होंने सपा, बसपा और कांग्रेस की तुलना बिल्ली से कर दी. कहा कि जिस तरह बिल्ली दूध (देश) की रखवाली नहीं कर सकती, उसी प्रकार सपा, बसपा और कांग्रेस देश की रखवाली नहीं कर सकती है.

गधा
जब देश के बड़े-बड़े नेता एक-दूसरे पर जानवरों के सहारे निशाना साध रहे थे. ऐसे में कांग्रेस के बयानवीर नेता बेनी प्रसाद वर्मा कहां पीछे रहते. 28 मार्च को उन्होंने सपा पर निशाना साधते हुए बोले सपा में सब गधे हैं, पता नहीं लोहिया ने उन्हें क्या पढ़ाया है. अब यूपी सीएम अखिलेश यादव ने पीएम मोदी पर निशाना साधने के लिए गधों की गुजराती प्रजाति का सहारा लिया है.

चूहा
चुनावी जंग में नेताओं ने चूहे को भी नहीं बख्शा. प्रियंका वाड्रा ने पति राबर्ट वाड्रा पर जमीन सौदों पर मचे विवाद पर बीजेपी नेताओं को 'बौखलाए' चूहे बता दिया. रायबरेली में 27 अप्रैल, 2014 को उन्होंने कहा, 'बीजेपी के नेता बौखलाए चूहों की तरह भाग रहे हैं. ये जितना जो करना चाहें, कर लें. मैं नहीं डरती. इनकी विनाशक और नकारात्मक राजनीति के खिलाफ मैं बोलती रहूंगी.'

हाथी
चुनाव प्रचार में हर बार की तरह हाथी को भी काफी पुकारा गया. यूपी में सभी नेताओं ने बसपा पर निशाना साधने के लिए हाथी का उपयोग किया. किसी ने कहा, यूपी का सारा पैसा हाथी खा गया. किसी ने लखनऊ में हाथियों की मूर्तियां लगाने के लिए बसपा सुप्रीमो मायावती को आड़े हाथों लिया. इसके अलावा बसपा की हर रैली में हाथी खूब चमका.


लालू ने बताया था मोदी को कालिया नाग
लालू ने कहा, ''कलिया नरेंद्र मोदी का पुनर्जन्म नाग के रूप में कलियुग मे हुआ है. मोदी ने पहले गुजरात को डसा. अब पूरे देश को डसने चले हैं. लेकिन हम ऐसा नहीं होने देंगे. इस पहले पीएम नरेन्द्र मोदी मुजफ्फरपुर में आयोजित रैली में आरजेडी और लालू पर जमकर निशाना साधा था. मोदी ने आरजेडी को 'रोजाना जंगलराज का डर' पार्टी बताया था. यह भी कहा कि लालू के रेलमंत्री बनते ही बिहार में रेल प्रोजेक्ट्स रूक गए.


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