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कारपोरेट तरीके से बिक रहे हैं धर्म और ज्ञान

 shabahat |  2017-01-30 13:34:25.0

कारपोरेट तरीके से बिक रहे हैं धर्म और ज्ञान

साक्षात्कार :- स्वामी राम शंकर

शबाहत हुसैन विजेता

लखनऊ. वह गेरुआ वस्त्र नहीं पहनें तो कोई जल्दी समझ भी नहीं सकता कि इस नौजवान के भीतर एक सन्यासी की आत्मा बसती है. तमाम मुद्दों पर वह बहस करते हैं. उनका दिल चाह ले तो वह फिल्म देखने सिनेमाहाल भी चले जाते हैं. उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि फिल्म देखने आये लोग फिल्म छोड़कर उन्हें देखने लग जाते हैं. उनकी योग में रुचि है तो उसमें डिप्लोमा भी किया है. वह फिल्म देखने चले जाते हैं क्योंकि उनकी अभिनय में गहरी दिलचस्पी है. उन्होंने खुद काफी समय तक थियेटर में काम किया है. रंगमंच की बारीकियों से वह काफी गहराई से परिचित हैं. समाज के तमाम क्षेत्रों को काफी करीब से देख लेने की वजह से उनका दिमाग खुला हुआ है. यही वजह है कि वह एक झटके मे यह बात स्वीकार कर लेते हैं कि इस दौर में धर्म, अध्यात्म और ज्ञान तीनों बिक रहे हैं.

आइये आज आपको मिलवाते हैं उस युवा सन्यासी से जो कभी थियेटर में अभिनय करता था और अभी फ़िल्में देखने भी चला जाता है. नाम है राम शंकर मिश्र. जिन्हें लोग स्वामी राम शंकर दास के नाम से पहचानते हैं. वह तहलका न्यूज़ के आफिस आये तो उनसे लम्बी बातचीत हुई. उस बातचीत के ख़ास अंश हम आपको बताएँगे लेकिन साथ-साथ हम आपको यह भी बताएँगे कि आखिर यह सन्यासी एक मीडिया हाउस में क्यों चले आये. क्या प्रचार की भूख इन्हें यहाँ खींच लाई. सच्चाई जानेंगे तो आपका मुंह भी खुला का खुला रह जायेगा.



स्वामी राम शंकर दास युवा हैं. पढ़े-लिखे हैं. खुले दिमाग के हैं. बहुत से क्षेत्रों के बारे में विस्तृत जानकारी रखते हैं. वह लोगों की जिज्ञासाएं शांत करने का काम करते हैं लेकिन खुद भी तो इंसान ही हैं तो जिज्ञासु भी हैं. दूसरे नौजवानों की तरह वह भी शानदार स्मार्ट फोन रखते हैं. वह भी फेसबुक और व्हाट्सअप पर सक्रिय रहते हैं. उनके भी हजारों में दोस्त हैं. वह सन्यासी हैं लेकिन पारम्परिक लीक पर चलने वाले नहीं बल्कि खुद की परम्परा कायम करने वाले सन्यासी हैं.

उस दिन शाम को गेरुआ कपड़े पहने स्वामी राम शंकर कैमरा स्टैंड में अपना मोबाइल कसे हुए तहलका न्यूज़ के दफ्तर आये और आते ही उन्होंने संवाददाताओं से सवाल दागना शुरू कर दिया. उन्होंने कहा भी कि जो दूसरों की खबर लेने के लिये घूमते रहते हैं आज वह उनकी खबर लेने आये हैं. उनकी ढेर सारी जिज्ञासाएं थीं- मसलन जब कोई रैली कवर करने जाते हैं और उसमें लाठी चार्ज हो जाता है तो खुद को कैसे बचाते हैं क्योंकि लाठी को क्या पता कि आप पत्रकार हैं? जब लाठी पड़ जाती है तो रैली के लाठीचार्ज की रिपोर्ट कैसे लिखते हैं? यूनीवर्सिटी से हाल में ही मॉस कम्युनीकेशन से डिग्री लेकर पत्रकारिता में आने वाली लड़कियों से उन्होंने पूछा कि समाज में इतने क्षेत्र हैं लेकिन आपने पत्रकारिता को ही क्यों चुना? देर रात तक जागना पड़ेगा, देर रात तक काम करना पड़ेगा, इसे घर वाले कैसे लेंगे?

ढेर सारे सवालों के तीर अपने तरकश में भरकर निकला यह सन्यासी पत्रकारों की गुफा में आ गया था तो फिर खुद सवालों की तोप से बचकर कैसे भाग सकता था. इस युवा सन्यासी ने अपना काम निबटाकर जाने की इजाज़त माँगी तब उन्हें बिठाकर हमने भी दागे ढेर सारे सवाल. अब मन होता है कि कह दूं कि शाबाश सन्यासी. आप जो ढूंढ रहे हैं वह कभी न कभी ज़रूर पा लेंगे.



@ स्वामी जी, आप धर्म, अध्यात्म और ज्ञान की बातें करते नहीं थकते लेकिन सच तो यह है कि यह तीनों ही बिक रहे हैं ?

- हाँ सही है, यह तीनों बिक रहे हैं. देखिये जब भी आप किसी चीज़ को कारपोरेट तरीके से बेचने की कोशिश करते हैं तो वह बिक ही जाता है. इन तीनों को भी कार्पोरेट तरीके से बेचा जा रहा है जबकि धर्म और आध्यात्म के मार्ग पर मिले ज्ञान की कोई कीमत नहीं है.

@ क्या आप मानते हैं की अब प्रतिकूलता से लड़ने वाला ज्ञान कहीं मिलता नहीं है ?

- इसकी वजह साफ़ है. धर्म जब डिमांड एंड सप्लाई के हिसाब से चलने लगेगा तो शुरुआती दौर में भले ही वह खुशी दे लेकिन उससे मन को एकाग्रता नहीं मिलेगी. मन एकाग्र नहीं हुआ तो आध्यात्मिक जीवन नहीं मिलेगा. आध्यात्मिक जीवन हासिल नहीं हुआ तो इससे प्राप्त ज्ञान में प्रतिकूलता से लड़ने की ताक़त कहाँ से आयेगी.

@ आपको लगता है कि समर्पण अभी है ?

- समर्पण तो है लेकिन वह व्यक्तिनिष्ठ हो गया है जबकि उसे तत्व निष्ठ होना चाहिए.

@ क्या इसकी वजह यह है कि अब संत भी वैसे संत नहीं रहे. उन्हें फाइव स्टार सुविधाओं की ज़रुरत पड़ने लगी है ?

- हाँ सही है. लेकिन आप यह भी तो सोचिये कि संतों को यहाँ तक पहुंचाने में एक पूरा तन्त्र लगा है. मैं प्रवचन के लिए ऑटो रिक्शा से पहुंचना चाहता हूँ लेकिन जिसने प्रवचन का प्रबंध किया है वह यह कैसे पसंद करेगा कि मैं उसके यहाँ ऑटो रिक्शा से जाऊं. उसने प्रवचन के लिए बड़े-बड़े प्रबंध किये हैं तो वह मेरे लाने ले जाने के लिये वाहन की व्यवस्था भी करेगा. मैं आयोजक को कैसे मना कर सकता हूँ.

@ कुल मिलाकर साधू भी मनी माइंडेड होता है ?

- नहीं साधू मनी माइंडेड नहीं होता. मैं साधू हूँ. मैं प्रेम से हटकर नहीं जी सकता. लेकिन जो बुला रहा है वह तो मनी माइंडेड है ही. वह इतनी बड़ी व्यवस्था करता है तो धन खर्च करता है. वह धन वापस नहीं निकलेगा तो बार-बार कैसे खर्च करेगा. फाउंडेशन में पैसा आता जाता है तो साधू भी उसमें धंसता जाता है.

@ बात तो वही हुई न कि साधू भी मनी माइंडेड होता है ?

- देखिये साधू का पूरा काम नेट्वर्किंग की वजह से चलता है. बाबा लोग समय के साथ बदलते हैं. वह देखते हैं कि किस तरह की व्यवस्थाएं उनके लिये की जाती हैं. समय के साथ वह भी इस व्यवस्था को सपोर्ट करने लगते हैं.

@ बहुत से साधुओं के परिवार भी हैं ?

- साधू दो तरह के होते हैं एक वह जो शादी नहीं करते और दूसरे वह जिनके परिवार हैं. एक तरह के और भी साधू हैं जो दीखते तो साधू की तरह हैं लेकिन उन्होंने इसे बिजनेस की तरह से अपनाया है. अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं के लिये उन्होंने इसे चुना है. देखिये ईश्वर को पाने के लिये आपको साधू बनने की ज़रुरत नहीं है. गृहस्थ बनकर भी आप ईश्वर का अनुभव कर सकते हैं. अगर आपका लक्ष्य तय हो तो आपका सरोकार सार्थक रोल निभाता है.

@ आप काफी पढ़े-लिखे हैं. आप नौकरी कर भी अपना लक्ष्य हासिल कर सकते थे. आपको क्या ज़रूरत पड़ी गेरुआ पहनने की ?

- मेरे पिता नन्द किशोर मिश्र कर्मकांड के आचार्य हैं. मेरे घर में काफी धार्मिक माहौल है. मैं देवरिया के एक गाँव में 1987 में पैदा हुआ था. मेरे पिताजी मुझे पढ़ाने के लिये ही गोरखपुर लेकर आये थे. पढ़ाई के साथ-साथ मैं समाज से पूरी गहराई से जुड़ा हुआ था. मैंने थियेटर में अभिनय किया. मैं बालीवुड जाना चाहता था. मैं हीरो बनना चाहता था. मेरे घर में मुझ पर कोई बंदिश भी नहीं थी लेकिन बचपन से मेरे अन्दर जा रहे मेरे पिता के संस्कारों ने मुझे साधू बना दिया. मैं दसवीं में पढ़ता था तब साधू बनने के लिये घर से भाग गया था लेकिन जिन आचार्य की शरण में गया उन्होंने समझाया कि अगर शिक्षा पूरी कर लोगे तो भटके हुए लोगों को अच्छी तरह से ज्ञान दे सकोगे.
मैं वापस घर लौटा. खूब मन से पढ़ाई की. बीकाम करने के बाद अयोध्या चला गया और वहां जाकर विधिवत दीक्षा ले ली.


@ बालीवुड जाते तो अपने लिये किस तरह के रोल चुनते ?

- मैं वहां भी समाज को दिशा देने वाले रोल ही चुनता लेकिन मैं शायद इसी फ्रेम में डिज़ाइंड था जिस रोल को अभी प्ले कर रहा हूँ. मैं वहां जाता तो शायद बनावटी दुनिया में खो जाता.

@ खो तो आप अभी भी जायेंगे. अब गेरुआ डिजाइन में खो जायेंगे ?

- (मुस्कुराते हुए) हम मशीन से निकले हुए ऐसे इंस्ट्रूमेंट नहीं हैं जिसके भीतर इमोशन न हों. गेरुआ पहनने के बाद मैंने योग में डिप्लोमा किया. गेरुआ पहनकर हम सिनेमाहाल भी चले जाते हैं. हालांकि वहां आये लोग फिल्म के बजाय मुझे देखने लगते हैं.

@ मतलब आप इंस्ट्रूमेंट नहीं बनेंगे और गेरुआ पहनकर शादी भी करेंगे. ?

- गृहस्थ आश्रम मेरी प्राथमिकता नहीं है. हाँ जीवन के किसी मोड़ पर कभी यह लगा कि मेरे विचारों के अनुरूप कोई जीवन संगिनी मिल रही है जो मेरे लक्ष्य को पूर्ण करने में सहायक बनेगी तो यह भी संभव है. देखिये साधू की पोशाक मैंने किसी दबाव में नहीं पहनी है. संन्यास मैंने खुद के लिये लिया है. दिखावे के साथ मैं ज़िन्दगी का निर्वाह नहीं कर सकता हूँ. मैं इस क्षेत्र में उन लोगों की तरह नहीं रहूँगा जो समाज को दूषित कर रहे हैं.

@ आपके लिये धन की अहमियत क्या है ?

- जीवन के लिये धन तो चाहिये ही है लेकिन मेरे अन्दर इतनी स्किल है कि अपनी ज़रूरतों के लिये पर्याप्त धन हम कमा सकते हैं. हालांकि स्किल से पैसा कमाना मेरा उद्देश्य नहीं है. इसका इस्तेमाल हम समाज के उन्नयन के लिये करना चाहते हैं.

@ राजनीति में जायेंगे कभी, बहुत से सन्यासी पहले से हैं भी राजनीति में ?

- मैं भी गोरखपुर से सांसदी का चुनाव लड़ सकता हूँ लेकिन मुझे लगता है कि साधू को चुनाव लड़ने के बजाय राजनीति के लिये उत्तम चरित्र के व्यक्ति को निर्मित करना चाहिये. उसे ऐसा प्रत्याशी तैयार करना चाहिये जो समाज में बदलाव लाये. पालिटिक्स में जाने के बाद आस्था खत्म हो जाती है. राजनीति में गुरुत्व हल्का हो जाता है. एक पक्ष का अनुयाई और दूसरे का वैचारिक विरोधी हो जाता है. जबकि साधू सबका होता है.

@ आप धर्म को कैसे देखते हैं ?

- जो मानवता को मज़बूत करे मेरी नज़र में वही धर्म है. टीका, चन्दन धर्म का हिस्सा नहीं हैं. धर्म वह है जो सबको सबके साथ जोड़ दे. जिसमें प्रेम हो, सरोकार हो, सेवा हो.

@ फिर यह हिन्दू-मुसलमान क्या हैं ?

- यह तो जीवन जीने की शैलियाँ हैं.

@ तो फिर ज्ञान क्या है ?

- सांसारिक समर में जो अन्दर के मूल स्वरुप का दर्शन करा दे और प्रतिकूलताओं में हमें सामर्थ्यवान बना दे. वही सच्चा ज्ञान है. ज्ञान आख़िरी वक्त तक साथ निभाता है. जब सारे साथ छूट जाते हैं तब सिर्फ ज्ञान ही है जो साथ खड़ा रहता है.

@ घर आप छोड़ चुके, गेरुआ धारण कर चुके. अब कुछ ऐसा भी करने की चाह है आमतौर पर दूसरे लोग नहीं करते ?

- हाँ मैं कोठे पर रहने वाली महिलाओं के मन की वेदना को दूर करना चाहता हूँ. क्रास जेंडर को आम इंसान जैसी मान्यता दिलाना चाहते हैं. डर लगता है कि समाज कहीं इसका दूसरा मतलब न निकाल ले. कहीं फालतू में बदनामी न हो जाये. हाँ कभी कोई ऐसा संगठन मिला जो समाज के इन दोनों वर्गों के लिए कुछ इमानदारी से कुछ करना चाहता हो तो उसके साथ चल पड़ेंगे. मठ या मंदिर बनाने की मेरी तमन्ना नहीं है. कथा सुनाकर हासिल होने वाले धन को ज़रूरतमंदों में बाँट देना चाहता हूँ. जो बच्चे पढ़ना चाहते हैं उनकी मदद करना चाहता हूँ. बेरोजगारों के रोज़गार का इंतजाम करना चाहता हूँ और मैं परिंदे की तरह उड़ना चाहता हूँ. मैं बहुत अच्छी तरह से जानता हूँ कि बाबा लोग जिस धन पर ऐश कर रहे हैं वह पब्लिक का धन है और उसे पब्लिक पर ही खर्च होना चाहिये.

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shabahat ( 2177 )

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