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सबके लिए अबूझ रहा है सुरक्षित सीटों का मिजाज

 Utkarsh Sinha |  2017-02-18 06:22:52.0

सबके  लिए अबूझ रहा  है सुरक्षित सीटों का मिजाज

तहलका न्यूज ब्यूरो

लखनऊ . यूपी के सात की कुर्सी के रास्ते में सुरक्षित सीटो का अपना महत्त्व है . इन सुरक्षित सीटों का मिजाज कभी एक सा नहीं रहा है और इस बार भी सियासी पार्टियों के लिए यह सीटें अभूझ बनी हुयी हैं. प्रदेश की कुल 403 विधानसभा सीटों में 1991 में 89 सुरक्षित सीट थीं जो बाद में 2012 के परिसीमन के बाद 85 हो गयीं. अगर पिछले चुनावों पर नजर डालें तो 1991 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने 89 सीटों में से 53 सीटों पर दर्ज करते हुए सरकार बनाने में कामयाब रही तो 2012 में इन सीटों पर भारतीय जनता पार्टी को केवल 3 सीटों पर ही सफलता मिली. भाजपा के लिए इन सीटों पर 1991 जैसी स्थिति दुबारा 2014 में रही जिसमें भाजपा को इन सुरक्षित सीटों पर कुल

65 सीटों पर बढ़त मिली थी. शायद इसी के चलते ही 2017 के विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा ने 2014 में केंद्र में सरकार बनाने के साथ ही इस दिशा में तैयारी शुरू कर दी थी. केंद्र में सरकार बनाने के साथ ही भाजपा दलित वोटों को अपने पाले में लाने और पार्टी की अल्पसंख्यक विरोधी छवि से बाहर लाने की कवायद में लगी है.

भाजपा के लिए दलित वोट कितनी अहमियत रखता है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि केंद्र में सरकार बनाने के बाद दलित वर्ग को सन्देश देने के लिए पार्टी और सरकार द्वारा कई काम किये जिनमें बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का दलित के घर पर भोजन करना

, बीजेपी द्वारा दलित चेतना यात्रा निकालना, प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी का लखनऊ की आंबेडकर यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में शामिल होने के बाद अम्बेडकर की अस्थियों पर पुष्प अर्पित करना और लन्दन स्थित बाबा भीमराव आंबेडकर के घर को नीलामी में खरीदना भी बीजेपी की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकती है. अब इसमें कितनी कामयाबी मिलेगी ये तो वक़्त बतायेगा परन्तु आज जब सूबे की सियासत गरम है बीजेपी अपने प्रचार में इस रणनीति को दर किनार कर चुकी है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि रोहित वेमुला काण्ड और उना दलित पिटाई काण्ड के बाद नाराज दलितों के चलते ही भाजपा इससे दूर है.

कमोबेश यही हाल बसपा का भी रहा है. सुरक्षित सीटों पर अपना एकाधिकार समझने वाली बीएसपी 1991 में एक भी सीट निकालने में कामयाब नहीं रही थी जबकि उस समय मंडल आयोग के चलते विधानसभा में आरक्षण एक प्रमुख मुद्दा था और दलित बनाम पिछड़ा मुद्दा काफी संघर्षशील रहा था. इसके बाद परिस्थितियाँ बदलीं और बसपा ने 2007 के चुनाव में इन सुरक्षित सीटों पर 62 पर जीत दर्ज किया था वहीं 2007 के बाद बसपा दुबारा इन सीटों पर कामयाबी पाने में नाकाम रही है. बहुजन समाज पार्टी 2012 के विधानसभा चुनाव में सिर्फ 15 सीट पर सिमट कर रह गयी थी. समाजवादी पार्टी भी 2012 के चुनाव में इन 85 सुरक्षित सीटों की

58 सीट पर विजयी हुयी थी. मगर लोकसभा चुनाव में इसी सपा को इन सीटों पर मात्र 10 पर ही बढ़त मिल पाई थी.

अगर इन सीटों के चुनाव इतिहास पर नजर डालें तो इन पर कभी किसी एक पार्टी की पकड़ बरकरार नहीं रही है. इन सुरक्षित सीटों पर 1991 में भाजपा, 2007 में बसपा तथा 2012 में सपा ने अपना परचम फहराया था. भाजपा शायद लोकसभा चुनाव के बाद से ही इन सीटों का महत्व विधानसभा चुनाव के लिए समझ चुकी थी और वह अपने 2017 के एजेंडे को शुरू से ही साधने में लगी दिखी.

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