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मायावती के लिये करो या मरो का चुनाव, क्योंकि अभी नहीं तो कभी नहीं

 shabahat |  2017-01-24 11:03:03.0

मायावती के लिये करो या मरो का चुनाव, क्योंकि अभी नहीं तो कभी नहीं



यूपी चुनाव : मायावती को पता है कि अभी नहीं तो कभी नहीं

तहलका न्यूज़ ब्यूरो

लखनऊ. मिशन- 2017 में सभी राजनीतिक दल जीजान से जुटे हुए हैं लेकिन इस तैयारी में सबसे ज्यादा तैयार बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ही नज़र आयी हैं. बसपा ने सबसे पहले अपने प्रत्याशी घोषित कर दिये और चुनावी तैयारियों में जुट गईं. मायावती ने वक्त की नब्ज़ को भी अच्छी तरह से पकड़ा है. इसी वजह से उन्होंने इस बार पहली बार सोशल मीडिया को भी अपना हथियार बनाया है.



समाजवादी पार्टी जिन दिनों परिवार के विवाद में उलझी थी उन दिनों मायावती यूपी विधानसभा के 403 टिकट फाइनल करने में लगी हुई थीं. बीजेपी चुनाव की तैयारी तो कर रही थी लेकिन उसने बिना दूल्हे की बारात सजा ली थी. बहुत तलाश के बावजूद भाजपा मुख्यमंत्री का प्रत्याशी घोषित नहीं कर पाई और मजबूरन वह अपने प्रत्याशियों की सूची घोषित करने में जुट गई. कांग्रेस की हालत यह रही कि समाजवादी पार्टी से गठबंधन के बगैर वह ऐसे प्रत्याशी कहाँ से लाये जो सम्मानजनक तरीके से चुनाव लड़ सकें. बाक़ी दलों की हालत तो ज़िक्र के भी लायक नहीं दिख रही है.

बसपा सुप्रीमो ने 2017 के चुनाव के लिये ऐसे विशेषज्ञों को तलाशा है जो उनकी ब्रांडिंग कर सकें. आईआईटी से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल करने वाले विशेषज्ञ मायावती के मीडिया का काम संभाल रहे हैं. वह सूबे के विभिन्न इलाकों से बसपा के बारे में फीडबैक ले रहे हैं. फीडबैक लेने के बाद वह इलाकों के मुद्दे तय कर रहे हैं. यह विशेषज्ञ दूसरे दलों के प्रचार के तरीके पर भी पर नज़र रख रहे हैं. मायावती ने इस चुनाव में फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्सऐप का भी खूब इस्तेमाल किया है. हर विधानसभा क्षेत्र से लोगों को सोशल मीडिया के ज़रिये जोड़ा गया है.


इस अभियान में सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि आधिकारिक तौर पर तो न तो मायावती न ही बीएसपी ट्विटर पर है, मिलते जुलते नामों से कई अकाउंट बनाये गये हैं. बीएसपी के महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा ट्विटर पर हैं. यही वजह है कि अब ट्विटर पर मायावती भी ट्रेंड करने लगी हैं. उत्तर प्रदेश चुनाव के लिये मायावती ने वक्त के साथ खुद को बदलने का फैसला किया है और इसका असर अब दिखने भी लगा है. मायावती को अपनी ब्रांडिंग करानी पड़ी क्योंकि यूपी में अखिलेश यादव एक बड़ा ब्रांड बन चुके हैं. अखिलेश ने काम बोलता है का नारा पेश किया तो मायावती की तरफ से भी नारा आया कि बहन जी को आने दो. 'बहनजी को आने दो' के नाम से दस पोस्टरों की एक सीरीज बनाई गई है. यह पोस्टर बदली हुई मायावती की तस्वीर स्पष्ट करेंगी.

मायावती की टीम ने 30 सेकेण्ड से लेकर पांच मिनट तक के 15 वीडियो तैयार किये हैं. इन वीडियो के ज़रिये समाजवादी घमासान और नरेन्द्र मोदी के जुमलों का जवाब देने की कोशिश की गई है. डेढ़ मिनट के एक वीडियो में मायावती को आयरन लेडी बताया गया है. बसपा के चुनाव प्रचार में इस बार मायावती बहुत मज़बूत तस्वीर में नज़र आयेंगी. इस बार के प्रचार में वोटर तक यह सन्देश जाएगा कि मायावती को किसी सहारे की ज़रुरत नहीं है.

मायावती के प्रचार में अखिलेश राज में हुए दंगों पर भी फोकस किया गया है. समाजवादी पार्टी में कितने बाहुबली हैं उन पर भी रौशनी डाली गई है. कुछ पोस्टर भी दिखेंगे जिनमें अखिलेश यादव के साथ यह बाहुबली अभय सिंह, पवन पाण्डेय, गायत्री प्रजापति और अतीक अहमद को दिखाया गया है. इस प्रचार सामग्री को चुनाव आयोग से हरी झंडी मिलने का इंतज़ार किया जा रहा है. यह सब मायावती 2014 का लोकसभा चुनाव देखने के बाद कर रही हैं. उनके लिये करो या मरो वाली स्थिति है. उन्हें पता है कि अभी नहीं तो कभी नहीं.



मायावती इससे पहले के किसी भी चुनाव में मीडिया को अपना मानकर नहीं चलती थीं. उन्होंने कई बार कहा है कि मेरे कार्यकर्त्ता अखबार नहीं पढ़ते. वह मीडिया को मनुवादी बताती थीं. लेकिन इस बार मायावती का अंदाज़ बिलकुल बदला हुआ है. इस बार वह वह जल्दी-जल्दी प्रेस कांफ्रेंस करने लगी हैं. जल्दी-जल्दी उनके प्रेस नोट आने लगे हैं. प्रधानमंत्री की हर रैली के बाद मायावती ने प्रेस नोट के ज़रिये जवाब दिया है. मायावती बहुत अच्छी तरह से जानती हैं कि हाथी को किसी भी सूरत में बैठने नहीं देना है क्योंकि एक बार वह बैठ गया तो जल्दी उठने वाला नहीं है.

मायावती में इन दिनों गज़ब का कांफीडेंस नज़र आने लगा है. वह पत्रकारों के सवालों के जवाब देने लगी हैं. कैमरे के सामने मुस्कुराने लगी हैं. उनके कांफीडेंस का अंदाजा इसी बात से लगता है कि उन्होंने सबसे पहले अपने प्रत्याशियों की घोषणा कर दी. उन्होंने किसी के साथ भी गठबंधन नहीं किया. मायावती का सीधा मुकाबला यूपी के विकास के लिए लगातार चार साल तक काम करने वाले अखिलेश यादव से है. मायावती कभी अखिलेश पर निशाना भी नहीं साधती हैं. अखिलेश भी कभी उनके खिलाफ कुछ नहीं बोलते हैं बावजूद इसके उन्हें चुनाव में अखिलेश की परवाह नहीं है क्योंकि वह जानती हैं कि चुनाव विकास के मुद्दे पर नहीं सोशल इंजीनियरिंग के भरोसे लड़ा जाता है. चुनाव जाति के भरोसे लड़ा जाता है. अपने प्रत्याशियों की घोषणा करने के बाद मायावती दलित-मुस्लिम गठजोड़ में जुट गई हैं. दलित-मुस्लिम गठजोड़ के साथ-साथ मायावती सतीश चन्द्र मिश्र के ज़रिये ब्राह्मण वोटों में भी सेंध लगा ही रही हैं. मुस्लिम वोटों को बड़ी संख्या में हासिल करने के लिये मायावती ने 97 मुसलमानों को टिकट दिया है. 87 दलितों और 66 ब्राह्मणों को टिकट देकर मायावती ने सभी जातियों को चुनाव में साधने की कोशिश की है. टिकट बांटने में मायावती ने अगड़ी-पिछड़ी, कायस्थ और पंजाबी सभी जातियों में सामंजस्य बिठाने की कोशिश की है. मायावती की निगाह 2019 के लोकसभा चुनाव पर भी टिकी हुई है. मायावती विधानसभा चुनाव में आने वाले परिणाम से ज्यादा बसपा को मिलने वाले वोटों के प्रतिशत पर टिकी हैं. लोकसभा चुनाव के बाद बनने वाली केन्द्र सरकार में खुद को बारगेनिंग पावर में लाने की कोशिश में भी लगी हैं मायावती.

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