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अब तक लड़ी भाजपा , अब लडेगा भाजपा गठबंधन

 Utkarsh Sinha |  2017-02-19 10:03:24.0

अब तक लड़ी भाजपा , अब लडेगा भाजपा गठबंधन


उत्कर्ष सिन्हा

लखनऊ. यूपी विधानसभा के तीसरे चरण का चुनाव ख़त्म होते ही भाजपा गठबंधन की परीक्षा शुरू हो जाएगी और इसके साथ ही अति पिछड़े वर्गों को जोड़ने की सियासी रनैती का तेज असर भी देखने को मिलेगा. यमुना पट्टी के बाद अब गंगा पट्टी में भाजपा- अपना दल और भासपा के गठबंधन से कितना फायदा मिलता है इस बात पर भी सबकी निगाहें रहेंगी.

2017 की विधानसभा के लिए प्रथम तीन चरणों में भारतीय जनता पार्टी जहां अकेले चुनाव लड़ रही थी वहीं अब बाकी के चरणों में वो एनडीए के रूप में मैदान में रहेगी. भाजपा इस बार यूपी विधान सभा का चुनाव अनुप्रिया पटेल वाली अपना दल (एस) और ओम प्रकाश राजभर के सुहैल देव भारतीय समाज पार्टी से गठबंधन कर मैदान में है. पूरब में एनडीए घटक की ये दोनों पार्टियां अपना दल कुर्मी बिरादरी का तो भासपा राजभर वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं. पूर्वी उत्तर प्रदेश की लगभग 50 सीटों पर इन दोनों दलों का काफी प्रभाव है. वैसे कुर्मी वोट पूरे उत्तर प्रदेश में है जो अलग-अलग नामों से जाना जाता है. जिनमें कटियार

, गंगवार, वर्मा, सचान व पटेल प्रमुख हैं और फतेहपुर व कानपुर से लेकर गोरखपुर, वाराणसी और बलिया तक इनकी संख्या काफी अधिक है. कुर्मी बिरादरी के कई चर्चित नेता ओमप्रकाश सिंह, संतोष गंगवार, प्रेम लता कटियार और विनय कटियार सरीखे नेता बीजेपी के साथ शामिल रहे हैं. पूर्वांचल में शायद इन्हीं पिछडे वर्ग के वोटों को साधने और बहुजन समाज पार्टी के परम्परागत वोटों में सेंध लगाने के लिए बीजेपी ने इन दलों से गठबंधन करते हुए पूरब की लगभग सवा सौ सीटों पर कुल चालीस से ज्यादा उम्मीदवार अति पिछड़े वर्ग से मैदान में उतारे हैं.

प्रदेश की आबादी में यह कुर्मी वर्ग लगभग 5 से 6 प्रतिशत है. पिछड़ी जातियों के वोट बैंक पर अगर नजर डालें तो यादव जाति के बाद इनका ही नम्बर आता है. जनसंघ के समय से ही यह बिरादरी भारतीय जनता पार्टी के साथ रही और साथ मिलकर चुनाव लड़ी. जनसंघ के समय से ही यह बिरादरी भारतीय जनता पार्टी के साथ रही और साथ मिलकर चुनाव लड़ी. 2007 में भाजपा और अपना दल का गठबंधन हुआ था जिसमें अपना दल को 39 सीटें मिली थीं. लेकिन इस गठबंधन से दोनों को कोई फायदा नहीं हुआ था अपना दल को इस चुनाव में एक भी सीट नहीं मिली थी और बीजेपी 88 सीट से घटकर 51 सीट पर रह गयी थी. बाद में 2012 के विधान सभा चुनाव में अपना दल ने पीस पार्टी के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा और केवल एक मात्र सीट निकालने में कामयाब रही जो कि अपना दल के संस्थापक सोनेलाल पटेल की पुत्री अनुप्रिया पटेल की थी.

2014 में अपना दल ने फिर एक बार भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ा और दो सीट हासिल करने में कामयाब रही और अनुप्रिया पटेल अनुप्रिया केंद्र सरकार में मंत्री बनीं. लेकिन समाजवादी पार्टी की तरह यह दल भी परिवार और पार्टी के झगड़ों में उलझ गया. जहां अनुप्रिया को अपनी माता और पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष कृष्णा पटेल तथा बहन पल्लवी के साथ सियासी युद्ध लड़ना पड़ा. फिलहाल अपना दल के दोनों धडों के रास्ते जुदा है जहां अनुप्रिया बीजेपी के साथ मिलकर कुल 15 सीटों पर चुनाव लड़ रही है और कृष्णा पटेल फिलहाल निर्दलीय.

भारतीय जनता पार्टी की दूसरी सहयोगी पार्टी भासपा का भी पूरब की करीब 50 सीटों पर अपना प्रभाव रखती है. भाजपा ने उसको इस चुनाव में कुल 9 सीटें दी हैं. अब इन दोनों पार्टियों पर अपने वोट बैंक को एक दूसरे के लिए ट्रांसफर कराने का दबाव होगा. और उनकी सफलता और असफलता ही उनकी भविष्य की राजनीति तय करेगा. गैर यादव पिछडो को समेटने की इस कवायद में बसपा छोड़ कर भाजपा का झंडा थामने वाले स्वामी प्रसाद मौर्या और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष केशव मौर्या की बिरादरी का प्रभाव भाजपा को कितना फायदा दिला सकता है यह भी आने वाले चरणों में दिखेगा.

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Utkarsh Sinha ( 394 )

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