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#UPElection2017 नहीं चला मैनेजमेंट गुरु का जादू , यूपी में PK मैजिक फेल

 Utkarsh Sinha |  2017-03-11 04:46:26.0

#UPElection2017  नहीं चला मैनेजमेंट गुरु का जादू , यूपी में PK मैजिक फेल

उत्कर्ष सिन्हा

लखनऊ. भारतीय राजनीति के फलक पर धूमकेतु बन कर उभरे चुनावी मैनेजमेंट गुरु प्रशांत किशोर के लिए 11 मार्च एक न भूलने वाली तारीख बन गयी है. लोकसभा चुनावो में मोदी की जीत का सेहरा और फिर बिहार में मोदी को हराने का सेहरा प्रशांत किशोर के सर बंधा था. इसके बाद कांग्रेस ने पीके की सेवाएँ इस उम्मीद में ली थी की यूपी में उसकी बदहाली दूर करेंगे मगर यूपी के मैदान में पिके का जादू हवा हो गया. इसके साथ ही उत्तराखंड में भी पीके की रणनीति फेल हो गयी.

प्रशांत किशोर जब यूपी में आये थे तो एक के बाद एक इवेंट कर मृतप्राय कांग्रेस में जान फूंकने की कोशिश में जुट गए. पहले राहुल गाँधी का कार्यकर्ताओं से संवाद और फिर परिवर्तन यात्रा के बाद खाट सभा का आयोजन टीम पीके ने किया. इन सबसे कांग्रेस चर्चा में तो आई मगर कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को टीम पीके के रवैये ने आहत करना भी शुरू कर दिया. पीके की बैठकों में भी कांग्रेस नेताओं ने उनके रवैये पर सवाल उठाये थे.

पीके ने पहला नारा दिया था "27 साल यूपी बेहाल" इसी नारे के साथ उन्होंने कांग्रेस के हमलावर मुद्रा की योजना बनायीं थी मगर अचानक जब कांग्रेस के लिए उन्होंने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन का फैसला किया तब यह नारा ही आलोचनाओं के केंद्र में आ गया और इसके बाद आया नारा "यूपी को ये साथ पसंद है" भी अपना असर नहीं बना सका.

पीके एक तरफ तो कांग्रेस नेताओं के साथ अपना तालमेल बना ही नहीं पाए तो वहीँ उनके फैसले भी लगातार गलत साबित होते गए. शीला दीक्षित को सीएम फेस बना कर लाना भी ब्राह्मण मतदाताओं को गले नहीं उतरा.

उत्तराखंड में भी कांग्रेस ने पीके की सेवाएँ ली लेकिन न तो कांग्रेस का असंतोष थमा न ही हरीश रावत मजबूत हो पाए. यहाँ भी पीके की राजनितिक समझ पर सवाल लगा.

कुल मिला कर पीके की नाकामयाबी कांग्रेस की उस समझ के लिए एक सबक है जो सिर्फ मैनेजमेंट के बूते चुनाव जीतने का फार्मूला खोज रही थी. जनता ने यह बता दिया है की चुनावी समर में बिना जनता के मन को समझे कोई मैनेजमेंट गुरु सफल नहीं हो सकता.

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