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मोदी पर हमला, और मायावती हाशिये पर, यही होगी "दो अच्छे लड़को" की रणनीति

 Utkarsh Sinha |  2017-01-29 10:09:21.0

मोदी पर हमला, और मायावती हाशिये पर, यही होगी दो अच्छे लड़को की रणनीति

उत्कर्ष सिन्हा


लखनऊ. राहुल गाँधी और अखिलेश यादव जब यूपी चुनावो के लिए गठबंधन करने के बाद पहली बार साझा प्रेस कन्फ्रेसं में एक साथ दिखे तो उसमे जवानी का जोश भी था और गठबंधन की गर्मजोशी भी. जैसा कि पहले भी अंदाजा लगाया जा रहा था ठीक वैसे ही राहुल गाँधी ने अपने निशाने पर नरेन्द्र मोदी को रखा और अखिलेश यादव ने अपने काम को.

बात की शुरुआत ही राहुल गाँधी ने मोदी की राजनीति को निशाने पर रखते हुए की. राहुल ने साफ़ कहा कि यह गठबंधन भाजपा आरएसएस और मोदी की नफरत और गुस्से के राजनीति के खिलाफ भाईचारे का है, युवाओं का है. सूबे की गंगा जमुनी तहजीब को ध्यान में रखते हुए राहुल ने इस प्रतीक का भरपूर इस्तेमाल किया. राहुल ने कहा कि गंगा और जमुना के इस मिलन से विकास और समृद्धि की सरस्वती निकलेगी.

राहुल अपने बाड़ी लैंग्वेज से ले कर अपने बातो तक में आक्रामक दिखे तो वही अखिलेश यादव अपने चिरपरिचित अंदाज में. इस जोड़ी की यूएसपी भी साफ़ दिखाई देने लगी. राहुल युवा विद्रोह का प्रतीक बनेगे तो अखिलेश विकासवादी सोच का और इसी कम्बीनेशन के साथ गठबंधन का चुनावी अभियान परवान चढाने की कोशिश होगी.

इस प्रेस कांफ्रेंस की स्क्रिप्ट बहुत करीने से लिखी गयी थी. जोर युवा सोच पर था, जोर गंगा जमुनी विरासत पर था इसीलिए ज्यादातर सवालो के जवाब में राहुल इन्ही दो शब्दों का इस्तेमाल करते रहे. गठबंधन के जरिये राहुल ने सियासत में नीयत के सवाल को उठाने की कोशिश की. उन्होंने कहा कि मोदी की बाते खोखली है और अखिलेश की नियत साफ़ और इसीलिए हमने अखिलेश का साथ देने का निश्चय किया है.

अखिलेश यादव ने भी इशारो इशारो में राष्ट्रीय राजनीति में न जाने के संकेत दिए तो राहुल ने भी यूपी में कांग्रेस को समाजवादी पार्टी का साथी बता दिया. दोनों ने हलाकि 2019 के लिए कोई सीधा जवाब नहीं दिया मगर इशारे इस बात के भी थे कि यह गठबंधन आगे तक जाने वाला है.

राहुल ने अखिलेश को अपना दोस्त बताया मगर मायावती पर सकारात्मक भी बोले . राहुल ने कहा कि मायावती की वे इज्जत करते हैं और उन्हें मायावती की नियत में खोट नहीं दिखाई देता. जाहिर है वे मायावती की आलोचना कर उन्हें इस लडाई में खुद के खिलाफ कुछ बोलने का मौका नहीं देना चाहते थे और साथ दलित वोटरों के एक समूह को नाराज नहीं करना चाहते थे.

राहुल और अखिलेश दोनों ही इस चुनाव को खुद बनाम मोदी बनाना चाहते हैं और आने वाले दिनों में इस गठबंधन के निशाने पर मोदी ज्यादा और मायावती कम ही रहने वाली है. गठबंधन के रणनीतिकारो को लगता है कि वे अगर चुनाव को मोदी बनाम गठबंधन का सीधा मुकाबला बना देंगे तो मुस्लिम वोटरों का रुझान इस तरफ आएगा और इसके साथ ही मायावती की संभावनाएं खुद ब खुद ही ख़त्म हो जाएँगी. भाजपा में टिकट बंटवारे के बाद मचे घमासान के बाद हुए विद्रोह से भाजपा वैसे भी लडखडाई हुयी है.

गठबंधन के इन "दो अच्छे लड़को" की रणनीति बहुत साफ़ है. राहुल मोदी की नियत और सोच को निशाने पर रखेंगे और अखिलेश अपने विकास बनाम मोदी के न पूरा हुए वादे को निशाने पर रखेंगे. जैसे जैसे अभियान परवान चढ़ेगा वैसे वैसे मायवती लडाई से बाहर होती दिखाई दे यही इनकी रणनीति होगी.

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