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ना- ना करते भी राहुल को करनी पड़ी हां इस जादुई फ़ॉर्मूले के लिए

 Anurag Tiwari |  2017-01-24 00:55:51.0

ना- ना करते भी राहुल को करनी पड़ी हां इस जादुई फ़ॉर्मूले के लिए

तहलका न्यूज ब्यूरो
लखनऊ. आखिरकार कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी यूपी में 27 साल पुराने वनवास से पार्टी को निजात दिलाने के लिए वही करना पड़ा जो फार्मूला पार्टी ने अब से 14 साल पहले आजमाया. राहुल को न चाहते हुए भी अपनी 14 साल पहले अपनी मां सोनिया गांधी द्वारा सुझाया फार्मूला पार्टी के अस्तित्व के लिए अपनाना पड़ा.

कांग्रेस को उसी गठबंधन के रास्ते पर लौटना पड़ा जो सोनिया गांधी ने आज से 14 साल पहले दिखाया था. उस समय भी पार्टी संकटों के दौरा से गुजर रही थी और 2003 शिमला में पार्टी की मीटिंग के दौरान सोनिया गांधी ने गठबंधन की राजनीती की जमकर वकालत की थी.

हालांकि राहुल गांधी अपनी मां की सोच के विपरीत कई मुक्कों पर गठबंधन की राजनीति से बचते दिखाई पड़े हैं. इसकी बानगी 2009 में देखने को मिली थी जब राहुल गांधी ने लोकसभा चुनावों के दौरान लालू यादव की राष्ट्रीय जनता दल से किसी तरह से गठबंधन करने से परहेज किया. लेकिन हाल ही में जब पार्टी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए रणनीति बनानी शुरू की तो उसेक रणनीतिकारों को एहसास हो गया कि बिना गठबंधन के पार्टी की हालत देश के सबसे बड़े सूबे में नहीं सुधरने वाले.


यह सन्देश पार्टी के रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचा दी थी. प्रशांत किशोर ने सोनिया के वाराणसी के रोड शो और राहुल गांधी की खाट सभाओं का आकलन किया और इस नतीजे पर पहुंचे की पार्टी की स्थिति में कोई बहुत जयादा सुधार नहीं हुआ है.

साल 2003 में पार्टी की स्थिति का आकलन करते हुए शिमला शिविर के दौरा न सोनिया गांधी ने पार्टी को बेहतर स्थिति में लाने के लिए गठबंधन की राजनीति का रास्ता सुझाया था. उस समय के हिसाब से लोकसभा में पार्टी के सांसदों की संख्या 114 पर पहुँच चुकी थी, जो कि न्यूनतम थी. पार्टी में लगातार फूट पड़ रही थी. श्स्र्द पवार, पीए संगमा , ममता बनर्जी, तारिक अनवर जैसे कद्दावर नेता पार्टी से बगावत कर अलग दल बना चुके थे. कई बड़े राज्यों में भी कांग्रेस विपक्ष में पहुँच चुकी थी.

सोनिया के गठबंधन की राजनीति के फार्मूले ने पार्टी ने ऐसी जान फूंकी कि साल 2004 में हुए आम चुनाव में गठबंधन की राजनीति के चलते पार्टी केंद्र की सता मे वापस लौटी. कांग्रेस गठबंधन वाले दलों के साथ मिलकर दस साल तक सता में रही. इन्ही सब वजहों से राहुल गांधी को भी समझ में आया कि सता में लौटना है तो गठबंधन की राजनीति का सहारा लेना पड़ेगा. इसीलिए यूपी में अकेले चुनाव लड़ने का दम भरने वाली कांग्रेस को समझ में आया कि सत्ता में लौटना है तो गठबंधन करना ही होगा.

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