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2017 के चुनावी समर में अपने सियासी अस्तित्व की लडाई में जुटे हैं ये बाहुबली

 Utkarsh Sinha |  2017-01-24 09:46:24.0

2017 के चुनावी समर में अपने सियासी अस्तित्व की लडाई में जुटे हैं ये बाहुबली

उत्कर्ष सिन्हा

लखनऊ. लम्बे समय से यूपी की सियासत को अपने हिसाब से चलने वाले पूर्वांचल के बाहुबलियों के"अच्छे दिन" कही दूर चले गए हैं. वक्त के हिसाब से पाला बदल कर सूबे की विधानसभा के गलियारे में घूमने वाले कई बाहुबली इस बार या तो निराश हैं या फिर किसी नयी रणनीति पर विचार करने में जुटे हुए हैं.

अपने इलाकों में जीत की गारंटी माने जाने वाले इन बाहुबलियों के लिए इस दफे करीब करीब हर प्रमुख राजनितिक दलों के दरवाजे बंद दिखाई दे रहे हैं. फैजाबाद के अभय सिंह हालाकि इसके अपवाद हैं और समाजवादी पार्टी के टिकट पर मैंदान में हैं.

मुख्तार अंसारी,अतीक अहमद, विजय मिश्र, और रमाकांत यादव के साथ मुन्ना बजरंगी और बृजेश सिंह के परिवार का जलवा भी कम हुआ है. अतीक अहमद ने तो हवा का रुख भांपते हुए खुद ही चुनावी मैदान से हटाने की घोषणा कर दी है. समाजवादी पार्टी और भाजपा ने भी फिलहाल बाहुबलियों से अपनी दूरी काफी हद तक बना कर रखी हुयी है.

70 के दशक से यूपी की राजनीति में बाहुबलियों ने अपनी दखल बनानी शुरू की थी और 90 के दशक में इनका जलवा अपने उफान पर चढ़ा. मगर उसके बाद सामाजिक संगठनो के बढ़ते दबाव के कारण चुनावो में बाहुबलियों का टिकट बड़ी चर्चा का मुद्दा बन गया. समाजवादी पार्टी इस मामले में काफी बदनाम रही मगर बसपा और भाजपा भी इसके प्रभाव से बच नहीं सके थे. धनञ्जय सिंह और मुख़्तार अंसारी बसपा में रहे तो ब्रजभूषण शरण सिंह और रमाकांत यादव जैसे लोग भाजपा का झंडा उठाये रहे.

मुख़्तार अंसारी ने अपनी पार्टी बनायीं और उसके बाद बीते साल वे समाजवादी पार्टी में अपनी पार्टी का विलय करवाने की जुगत में लग गए. अखिलेश यादव की नाराजगी के कारन समाजवादी पार्टी के भीतर भी यह बड़ा मुद्दा बना मगर बाद में मुख्तार की पार्टी का विलय तो सपा में हो गया मगर सपा पर अपने कब्जे के बाद अखिलेश ने मुख़्तार अंसारी को टिकट नहीं दिया है.

इसी तरह अतीक अहमद को शिवपाल यादव ने कानपूर से टिकट जरूर दिया मगर बदली परिस्थितियों में अतीक को एहसास हो गया था कि उनका टिकट जरूर कटेगा. इसके बाद अतीक अहमद ने प्रेस कांफ्रेंस कर खुद ही चुनाव लड़ने से मना कर दिया.

आजमगढ़ में बाहुबली सांसद रमाकांत यादव का भाजपा ने भरपूर उपयोग किया था. 2014 के लोकसभा चुनावो में मुलायम सिंह यादव के खिलाफ भी भाजपा ने रमाकांत यादव को उतरा था. रमाकांत ने मुलायम को कड़ी टक्कर दी मगर चुनाव हार गए. रमाकांत खुद और अपने परिजनों को विधानसभा का चुनाव लड़ना चाहते थे मगर ऐन वक्त पर पार्टी ने उनका टिकट काट दिया. इससे गुस्साए रमाकांत यादव अब बतौर निर्दल मैदान में कूदने वाले हैं.

कभी बसपा के प्रिय रहे जौनपुर के बाहुबली धनञ्जय सिंह के दिन वाकई ख़राब चल रहे हैं. बीते दिनों एक हत्या के मामले में उनका नाम उछला था , इसके बाद से ही धनञ्जय से बसपा ने दूरी बना ली , लोकसभा का चुनाव हार चुके धनञ्जय सिंह एक बार फिर विधानसभा के लिए बसपा की और आस लगाए बैठे थे मगर इस बार पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया . भाजपा से भी धनञ्जय को सहारा नहीं मिला. अब उनकी उम्मीद इस बात पर टिकी है कि शायद उन्हें भाजपा का कोई सहयोगी दल अपने टिकट पर उतारे और भाजपा उनकी सीट छोड़ दे.

ज्ञानपुर के विधायक विजय मिश्र भी इसी तरह झटका खा चुके हैं. कभी मुलायम और शिवपाल के ख़ास माने जाने वाले विजय मिश्र का टिकट भी अखिलेश यादव का शिकार बन गया. भदोही से ले कर इलाहाबाद तक विजय मिश्र की तूती बोलती है. बृजेश सिंह गैंग से विजय की लम्बी अदावत रही है. विजय जहाँ ब्राह्मणों के सहारे हैं वही इस इलाके में बृजेश सिंह को राजपूतो का समर्थन मिलता रहा है. सपा का टिकट काटने के बाद अब कयास लगाए जा रहे हैं कि विजय मिश्र अब निर्दल ही मैदान में उतरेंगे.

इस पूरे परिदृश्य एक खास संभावना भी उभर रही है. एक दूसरे के जानी दुश्मन रहे जरायम की दुनिया के ये सितारे एक दुसरे की राह आसान करने के लिए अंदरखाने समझौता भी कर सकते हैं. कई राजनेता भी इस गंठजोड़ को आकार देने में अन्दर ही अन्दर लगे हैं.

आखिर अस्तित्व की लडाई के लिए आपस में हाँथ मिलाने का इनका इतिहास भी पुराना है.

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Utkarsh Sinha ( 394 )

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